शब्द साथ छोड़ देते हैं...भावनाए रिसती हैं... टप टप दो आँखों  से बहती है ... एक रात ये है ... एक वो रात थी ... अँधेरा दोनों में गहरा बराबर सा था ... पर उस रात तुम्हारी  आवाज़ मेरे साथ थी ... आज की रात बस उसकी गूंज शेष है ...


उस रात को बारह बजे चाँद खिला था ... तुम्हारी आवाज़ सुनकर उसे पलकों से छाना था मैंने  ... मेरी पूजा फिर भी पूरी कहाँ हुई थी? ... तुमने दिल खोला अपना ... मुझे राजदार बनाया... कुछ सपने बांटे ... थोडा ठिठककर .... रुक कर ... अपनी कमजोरियां बताई ... मैंने सुना तुम्हे ... तुम्हारे विचारों की अर्धांगिनी बनी ....पूजा की आखरी रस्म अभी भी बाकी थी ...


आवाज़ ने तुम्हारी चादर बन ढक लिया मुझे ... रात का अँधेरा और भी गहरा गया... प्यार की रस्म पूरी हुई... तुम खुश हुए .. थोडा संतुष्ट हुए... मेरी पूजा पूरी हुई... अब तुम्हारी पलके भारी होने लगी थी ... तुम सो गए थे .. भोर का सूर्य-चन्द्र मिलन मेरी झोली में खुशियाँ भर गया था...


क्या पता था इस झोली भर खुशियों से ही हर रात गुजारनी पड़ेगी....

Comments

  1. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

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