Monday, November 19, 2012

वे दिन ...

तुम यकीन कर सकते हो- मैं फिर से निर्मल वर्मा को पढ़ रही हूँ। मुझे लगने लगा है की जो लोग अकेले रहना जानते हैं (सिर्फ शारीरिक तौर पर नहीं, मानसिक तौर पर भी) उन्हें कोई न कोई अच्छा साथी ज़रूर मिल जाता है। अब देखो ये कितना बड़ा संयोग है (या कुछ और ही - अजीब सा ) की मैं इतने दिन यह किताब पढना टालती रही और आज - आज बहुत रो चुकने के बाद मैंने यह किताब उठायी। मुझे अजीब सा विश्वास है- निर्मल वर्मा पर की बहुत दुःख होने पर अगर उन्हें पढ़ा जाए तो इनका साहित्य दवा  का काम करेगा। ' एक चिथड़ा सुख' में मैं इनके दुःख की परिभाषा अब तक नहीं भूली हूँ। बहुत ही द्र्श्यात्मक, काव्यात्मक, और कल्पनात्मक परिभाषा थी। ऐसी की इंसान पढ़े भी, समझे भी, महसूस भी करे और कभी यूँ ही एक दिन धोखे में उसे जी भी ले .

खैर मैं दुसरे उपन्यास के बारे में बता रही थी। 'वे दिन' पर इन्हें ज्ञानपीठ पुरूस्कार मिला है। और यह पढने का सुअवसर मुझे अपने ही निर्णय के कारन प्राप्त हुआ है। एम् . ऐ (फ़ाइनल) के आखरी पेपर में मुझे कई विकल्प में से एक रचनाकार को चुनना था, सो ये पहले से ही मेरे मन में था की मैं निर्मल वर्मा को चुनुंगी। 

वैसे, मैं अभी तक हर बात बता चुकी हूँ, मुख्य  बात को छोड़कर हा हा ... बात यह है की मुझे नहीं पता था की आज जिस बात को लेकर मैंने इतने आंसू बहाए हैं, यह किताब कहीं न कहीं उसी बात से जुडी है। हाँ, आज एक दोस्त ने बातों ही बातों में मुझसे कह दिया की - मैं खाली बैठी हूँ, और अपना समय नष्ट कर रही हूँ स्वाभाविक था, मुझे बुरा लगा। मैं बहुत रोई, उसने जो कहा उस बात पर नहीं- उससे जुडी कई बातों पर। और फिर ये किताब उठाई एक दो पन्ने पलटे  और - 

"क्या कर रहे हो आजकल?"
"कुछ नहीं, मैं खाली हूँ।" 

... मुझे उससे सहानुभूति हुई। कितना अच्छा है की वह मुझे नहीं जानता। न ही मैं उससे कोई अपेक्षा कर सकती हूँ। बस कहानी के चलते मैं उससे प्यार कर सकती हूँ। और कहानी ख़त्म होने के बाद हमेशा की तरह मेरे भीतर कुछ वहीँ ठहर जायेगा ... उसी समय , उसी जगह , उन्ही लोगों के बीच ... कहानी के अंत को सभी पात्रों की तरह मैं भी स्वीकार करुँगी ... एक मूक असहाय स्वीकृति के साथ ... मैं एक ज़िन्दगी जी चुकी होंगी ... एक दर्द का नया एहसास मेरे भीतर जन्म लेगा  - और समय के साथ वही याद बन जायेगा . हममें से कोई 'जीना सीख  कर नहीं आता ... हम सब यहीं इसी ज़मी पर टुकड़ों टुकड़ों में जीना सीखते हैं ..
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