Tuesday, March 22, 2016

कहानी के चरित्र


आज-कल कहानियाँ पढ़ने का चस्का-सा लग गया है , अक्सर रात को सोने से पहले हिंदी समय या अभिव्यक्ति ब्लॉग पर एक कहानी पढ़ कर ही सोती हूँ।  यूँ तो हम कई कहानियाँ पढ़ते हैं , पर चरित्र प्रधान आधुनिक कहानियाँ कभी-कभी दिल को इतना छू  लेती हैं की लगता है ये कुछ जाना-पहचाना-सा है। 

हाल ही में पढ़ी कुछ मन पसंद कहानियाँ हैं - रोज़ (अज्ञेय) , ठेस (फणीश्वरनाथ रेनू ) , मिस पॉल (मोहन राकेश)

कल मिस पॉल पढ़ी तो ऐसा लगा कि कभी कभी कहानी के भीतर का संसार कितना यथार्थ लगता है , मानो  आप कहानी के भीतर ही हों, किसी अदृश्य पात्र की तरह।  मेरे खयाल में हिंदी साहित्य को वर्तमान रूप देने वाली चुनिंदा कृतियाँ एवम रचनाएँ तो सभी साहित्य-प्रेमियों को पढ़नी  चाहिए।  ऐसा करते समय आप कविता का भी उतना ही आनंद लेंगे जितना की कहानी या उपन्यास का।  इस दृष्टि से, मैं कहूँगी की आप निराला की "राम की शक्तिपूजा" भी अवश्य पढ़िए।  

अगली कहानी की खासियत साझा करने फिर मिलूंगी , तब तक के लिए  ... होली की ढेरों शुभकामनाएँ।  :)

Monday, March 21, 2016

बोझ

किसी भी लड़की के लिए इससे अच्छी बात क्या हो सकती है की उसका एक घर हो, अच्छी गृहस्थी  हो, पति बहुत प्यार करने वाला हो और सास-ससुर बेटी की तरह रखते हों।  प्रीतम के भी ऐसा ही था।  लेकिन कभी कभी वह खुद से पूछ लिया करती की ," खुश रहने के लिए क्या यह काफी है ?" जवाब जो भी हो , उसका कोई मतलब नहीं था अब।  शादी को तीन साल होने आ गए थे।  कई दिन अच्छे - से, एक जैसे जाते , किन्तु बीच-बीच में  उसका मन उखड जाता।  तब वह बीते दिनों को याद करने लगती।  मनजीत  की याद तो उसे सबसे ज्यादा आती थी , आखिर वो एक अनसुलझी पहेली जो था।  कॉलेज के आखरी दिन उसने ग्राउंड के पीछे बुला कर प्रीतम से कहा था की , "तुम मुझे अच्छी लगती हो। " प्रीतम ने " हम्म " कह कर बात टाल दी थी।  तब उसे समझ ही नहीं आया , अच्छा लगने  का क्या मतलब है। 

आज सुबह प्रेस के कपड़ों की गठरी उठा कर वह चल दी थी।  जब प्रीतम का मन उखड जाता तो किसी भी बहाने घर से पैदल निकल लिया करती थी। आज सुबह से ही उसे जैसे उसे कांटे चुभ रहे थे कि , "कुछ अच्छा नहीं लग रहा।" वह मन ही मन सोचती की ,"अच्छा तो यह होता की मैं यहाँ  से कहीं दूर होती जहाँ रोज़ कई लोगों से मिलती , अपना मन पसंद काम करती , अपनी प्रतिभा को पहचानती, उसे निखारती  और मेरी तरह के दो-चार लोगों के साथ मिलकर दिल की बातें करती। कितने दिन हुए , किसी से दिल खोलकर बातें  भी तो नहीं की। " प्रीतम सोचते-सोचते गठरी का बोझ लिए न जाने कितना आगे निकल आई थी और धोबी की दूकान पीछे ही रह गयी।   

  


एक भीगा हुआ-सा स्वप्न

कल रात की तो नहीं ... शायद कई दिन पहले की बात है।  फिर से एक ऐसा सपना देखा मैंने, मानो कोई रहस्यमयी कहानी पढ़ी हो।  एक हरा-भरा मैदान जिस पर आगे चलते हुए एक झरना पड़ता है।  बहुत दिव्य, मनमोहक झरना।  झरने के पीछे एक गुफा जिसमे एक दिव्य गन्धर्व रुपी जोड़ा अभिसार कर रहा है।  उनकी क्रीड़ाएँ मन में गुदगुदी करने वाली थीं।  वे हँसते दौड़ते छेड़ते खेलते रंग उड़ाते कभी पानी में नहाते  ... ऐसी दिव्यता थी उनकी हर क्रिया में मानो वो ज़मी स्वर्ग का कोई टुकड़ा हो।  मैं अभिभूत होती हुई आगे बढ़ती जा रही थी की अचानक ठिठक गयी उन्होंने मुझे एक पल आश्चर्य से देखा , वह स्त्री दूजे ही पल निर्जन वन में गायब हो गयी।  मैं देखती रह गयी।  मैं भी भागने को हुई किन्तु उस  ... उस मनुष्य रुपी देवता ने मेरा हाथ पकड़ लिया।  वह न जाने कब तक मुझे देखता ही रहा - कई भाव उसके चेहरे पर आये और गए , मैं कुछ समझ नहीं पायी, जैसे किसी ने मुझे वश में कर लिया हो।  धीरे-धीरे स्वप्न के उस धुंधले प्रकाश में मैंने देखा , वह मेरे पैरों में झुका था  ... स्वप्न में मैंने बहुत देर बाद जाना , मैं पत्थर की मूर्ति हूँ , भीतर बहुत-से प्रश्न उबल रहे हैं ,बहुत कुछ महसूस कर रही हूँ , पर सब कुछ वहीँ ठहर गया था।  

हर बार की तरह

ये शरारत 
अच्छी नहीं तुम्हारी 

हर बार की तरह 
इस बार कहना न,
"तुम्हारा दिल रखने के लिए ,
बस यूँ ही  ... "

Sunday, March 20, 2016

वो एक आशिक था



वो अचानक से कहने लगा।  रूहानी थोड़ा सुनती, थोड़ा समझने की कोशिश करती , उसकी वो अजीब बातें ।  वो कहता, तुम्हारी याद आती है।  तुमसे जुडी हर चीज़ मुझे यहाँ - तहाँ दिखाई देने लगती है।  वो तुम्हारा पसंदीदा शब्द "विश्वास" तो न जाने क्यों मेरे पीछे सा पड़ गया है। कहते हैं न, जिससे प्यार हो उससे जुडी हर चीज़ से प्यार हो जाता है।  रुहानी को सुन कर अचम्भा - सा होता है। वो फिर भी कहता जाता , पागलों की तरह जैसे मानो जहाँ हो वहाँ आकाश में चिल्ला रहा हो , की आज मैं भरा-भरा सा हूँ, खुला-खुला सा हूँ , जी करता है ये सब प्यार लूटा दूँ किसी पर। रूहानी आँखे बंद कर के महसूस करना चाहती है।  वो फिर अचानक से पूछता है  , तुम्हे नहीं पता था ये? रूहानी धीरे से कहती है, "नहीं।"  "सच ! नहीं पता था?" " नहीं ! बिल्कुल भी नहीं। " "मुझे लगता था तुम मुझे जानती हो। " रुहानीअपने मन से पूछती है , "क्या मैं उसे जानती हूँ ?" मन उसी की तरह भोला , भुला , भटका हुआ -सा कहता है , "मुझे तो इतना ही पता था, की वो एक आशिक था। " रूहानी खोयी - सी सोच में पड़ जाती है , सच क्या ! और जो  मैंने अभी-अभी एक लौ-सी उसमे जो देखी है वो क्या है ?

Saturday, March 19, 2016

गोदान - एक विचार

आज फिर से गोदान पढ़ा।  पढ़ना था परीक्षा की तैयारी के लिए।  मतलब , जो ख़ास तथ्य ,चरित्र इत्यादि हैं उन्हें रट  लो , किन्तु मन जो कथा में उलझता गया , परीक्षा का ख्याल ही भूल गयी।  और अंत.... एक घुटी रुलायी ... आख़िर यह उपन्यास है या  निचोड़ , और वह भी ऐसा कि जिसमे जीवन का हर वो रस घुला है जो कम से कम भारत का हर व्यक्ति महसूस कर सकता है।

आज गोदान पढ़ कर लगा, इसके  हर भाग , हर संवाद , हर सूक्ति पर कई-कई  शोध लेख लिखे जा सकते हैं। शोध लेख तो फिर कभी , पर इस उपन्यास  का एक कथन  मैं आज आपके सामने रखना चाहती हूँ।

गोदान उपन्यास में प्रेमचंद ने शहरी जीवन के इतने रंग-बिरंगी और प्रामाणिक चित्र  उकेरे हैं कि हमें लगता है ये पात्र हमारे ही जीवन के अभिन्न अंग हैं।  ऐसे ही पात्रों में हैं - मि. मेहता , मिस मालती और गोविंदी देवी।  ये तीन ही  क्यों ? क्यूंकि असल में ये तीन ही पात्र हैं जो अपने जीवन में सच्चाई , सरलता और प्रकृति के निकट हैं या जाना चाहते हैं।  मि मेहता बहुत आदर्शवादी हैं , उनके विचार स्पष्ट और उच्च कोटि के हैं।  मिस मालती शुरू में चहकती फुदकती तितली - सी लगती है किन्तु धीरे धीरे मि मेहता के संपर्क से उसका चरित्र उज्जवल होता जाता है और अंत में वह मि मेहता के लिए एक प्रेरणा बन जाती है।  गोविंदी देवी के रूप में प्रेमचंद ने मि मेहता या यूँ कहना चाहिए की स्वयं के विचार अनुरूप  एक आदर्श नारी , स्त्री, पत्नी का चित्रांकन किया है।  और वह सिर्फ मूक या टाइप चित्रांकन नहीं है।  वह बहुत सजीव है।  उसका मनोविज्ञान रोचक है और उसके विचार उत्कृष्ट।  गोविंदी देवी प्रेमचंद के गोदान उपन्यास का ऐसा चरित्र है जो प्रेमचंद की सृष्टि होते हुए भी अपने में स्वतन्त्र हो गया है।  जिसके विचारों की व्याख्या प्रेमचंद भी नहीं कर सके हैं।


विमेंस लीग के एक कार्यक्रम में मि मेहता भाषण देते हुए स्त्रियों को पुरुषों से अति श्रेष्ठ बताते हैं। मि मेहता कहते हैं की , "मैं प्राणियों के विकास में स्त्री के पद को पुरुषों के पद से श्रेष्ठ समझता हूँ उसी तरह जैसी प्रेम और त्याग और श्रद्धा को हिंसा और संग्राम और कलह से श्रेष्ठ समझता हूँ।  अगर हमारी देवियाँ सृष्टि और पालन के देव-मंदिर से हिंसा और कलह के दानव - मंदिर में आना चाहती हैं तो उससे समाज का कल्याण न होगा। " आगे मेहता सेवा, समर्पण और त्याग के महत्त्व को उजागर करते हुए कहते हैं कि , "जहाँ सेवा का अभाव है, वही विवाह-विच्छेद है, परित्याग है, अविश्वास है। और आपके ऊपर,  पुरुष-जीवन की नौका की कर्णधार होने के कारण जिम्मेदारी ज्यादा है। आप चाहिए तो नौका को आंधी और तूफानों में पार लगा सकती हैं।  और आपने असावधानी की , तो नौका डूब जाएगी और उसके साथ आप भी डूब जाएँगी।  "

यह प्रेमचंद का आदर्शवाद है जो मि मेहता के मुख से बोल रहा है लेकिन इसके साथ ही एक गहन पारिवारिक यथार्थ भी गोविंदी देवी द्वारा रखा गया है। मि मेहता मिसेज गोविंदी देवी खन्ना से अपने भाषण के बारे में राय लेना चाहते हैं तब गोविंदी देवी कहती हैं , "पहली बात यह की भूल जाइये कि नारी श्रेष्ठ है और सारी जिम्मेदारी उसी पर है, श्रेष्ठ पुरुष है और उसी पर गृहस्थी का भार है. नारी में सेवा और संयम और कर्तव्य सबकुछ वही पैदा कर सकता है; अगर उसमे इन बातों का अभाव है तो नारी में भी अभाव रहेगा। नारियों में आज जो यह विद्रोह है, इसका कारण पुरुष का इन गुणों से शून्य हो जाना है।  " शायद ये अंतिम पंक्ति विमेन्स लीग का मूल-वाक्य (मूल प्रेरणा) कही जा सकती हैं।  लेकिन प्रेमचंद गोविंदी देवी के इस अति-यथार्थ विचार को विमर्श का विषय न बना पाये।  शायद मि मेहता के चरित्र या उनके आदर्शवाद को वे ठेस न पहुँचाना चाहते थे।

मेरे विचार में गोदान मात्र हिंदी-साहित्य की अमूल्य निधि नहीं है बल्कि हर भारतवासी के संघर्ष और संस्कृति की  गौरव गाथा है।  और सच कहूँ तो , यह उपन्यास सभी को जीवन में एक बार अवश्य पढ़ना चाहिए।  बार - बार पढ़ने का मोह आप वैसे भी न त्याग पाएंगे !

Sunday, January 10, 2016

तीन : हाइकु

झरती पीली धूप
हरे पत्ते से
रंग संगीत  मन का

चाल  मौसम की 
सर्दी धुप या बारिश 
है नहीं पता कुछ भी 


रुआँसी सर्द हवा 
नमी है, तेरी याद 
कि आँख का पानी है 


 

Thursday, January 7, 2016

कृष्णं शरणम् ममः - 2015 ने जो सिखाया


       ज़िन्दगी में हर पल सीखने का पल होता है।  कभी आप मुस्कुराना सीख रहे होते हैं कभी खिलखिलाना , कभी चलना तो कभी आसमां में उड़ान भरना , कभी जीने की कला तो कभी जीवन को और सुंदर बनाने की कला।  मेरे अनुसार व्यक्ति को सबसे पहले जीवन जीने की कला सीखनी चाहिए, और इसे हर पल सीखते रहना चाहिए, क्यूंकि जीवन के हर मोड़ पर नयी समस्या , नयी चुनौतियाँ हमें और तराशने के लिए हमारा इंतज़ार कर रही होती हैं।

       2014 फरवरी में शादी के बाद मेरे सामने नए लोग , नया माहौल था जिसमे एडजस्ट करने का सफर  बहुत मुश्किल भरा था।  2015 का भी पूरा  साल अपने बाहर और भीतर कई परिवर्तन करने में , कई बातें सीखने में  गुज़र गया किन्तु 2015 में मैंने पाया की मैं पहले से अधिक स्थिर , समझदार , शान्त , आशावादी और अपने लक्ष्य के लिए अधिक प्रयत्नशील हुई हूँ। 

तो पांच बातें जो मैंने वर्ष 2015 में सीखीं और जीवन में अपनाईं वे हैं  -


१. दिमाग को क्लीन रखना -

      लोगों की कही हुई बातों को दिल से लगा कर दिमाग में स्टोर करने से दिमाग डस्ट बीन बन जाता है। और ये मेरा दिमाग है कोई डस्ट बीन तो नहीं। आगे चल कर दिमाग की यह गन्दगी कई रोगों को जन्म देती है। इसीलिए मैंने कई तरीके अपनाये , मन को समझाना सीखा जिससे मैं फ़ालतू बातें भूल कर अच्छी बातों को दिल और दिमाग में जगह दे सकूँ।

२. हरी करे सो खरी - 


        अर्थात ईश्वर जो करता है हमारे अच्छे के लिए ही करता है।  मैं पहले से यह मानती थी किन्तु २ साल संयुक्त परिवार में रहने के बाद मुझे और अच्छा अनुभव हो गया की भगवान जो करता है  वो हमारे लिए बेस्ट है।

३. कृष्णं शरणम् ममः -


      जीवन में कई समस्याएं ऐसी आती हैं की हम कितना हाथ पैर मार लें , हमारे पास उसका कोई समाधान नहीं होता।  ऐसे में कई लोग  डिप्रेशन या अन्य बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।  जब लगता है की समय ही इस परिस्थिति से निकाल  सकता है , हमारे हाथ में कुछ नहीं है तब इष्ट देव की शरण में जाना, खुद को इष्ट देव को सौंप देना सबसे बड़ा कारगर उपाय है।  मैंने भी मुश्किल परिस्थितियों में यही उपाय अपनाया और  "हे कृष्ण मैं आपकी शरण में हूँ , आप जैसा ठीक समझें वैसा करें " इसी प्रार्थना को दोहराया है।

४. कर्म के बंधन को समझना -

     ध्यान से सोचने पर लगता  है की पति-पत्नी से लेकर सारे रिश्ते कर्म के बंधनों से जुड़े हैं।  रिश्तों के माध्यम से हम कर्मों का हिसाब चूका रहे हैं।  ब्रह्माकुमारीज़ की सिस्टर शिवानी कहती हैं कि , कोई आपके साथ बुरा करता है तो यह कह कर छोड़ दो की - इट्स ओके।  पिछले जन्म का हिसाब चुकता हुआ।  किन्तु आपके रिएक्ट करने से कर्म का बंधन बनता जाता है।  इसे  खत्म करने के प्रयास करने चाहिए न की बढ़ाने के ।

५. लक्ष्य को विज़ुवलाइज़ करना -

     जब आपको लगता है की आप अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़िन्दगी में कुछ परिवर्तन नहीं कर सकते , तब अपनाइये विज़ुअलाइज़ेशन की थेरेपी।  आप जो ज़िन्दगी में चाहते हैं , जैसा चाहते हैं , बस उसी के बारे में सोचिये, डे-ड्रीम करिये, उस तस्वीर को अपनी और खिंचीये , अट्रेक्ट कीजिये , एक दिन वो तस्वीर आपकी असल ज़िन्दगी बन जाएगी।  हाँ मैं यही करती हूँ।  हर दिन हर पल मैं उन चीज़ो के बारे में सोचती हूँ जो मुझे अपनी ज़िन्दगी में चाहिए और मैं जानती हूँ की इतना चाहने पर एक दिन वे मुझे जरूर मिलेंगी।



वर्ष 2015 को विदाई 


नोट - yah post Indi Spire ke topic-  What are the 5 Lessons 2015 has taught you?  ke reply me likhi gayi hai. 




        

Tuesday, December 15, 2015

संघर्ष!

इस जीवन में
इस संसार में
जी रही हैं कितनी ज़िन्दगियाँ
मिट रही हैं कितनी बस्तियाँ

इस एक समय में
समानांतर
कितने इतिहास रहे बन
संघर्ष! संघर्ष! संघर्ष !
हर आदमी की अपनी एक लड़ाई

कितने विलग अलग-थलग
हो गए हैं हम
की नहीं नाता रहा एक के दर्द का
दूसरे के मर्ज़  से

मैं स्त्री हूँ
वह दलित
और
तीसरा आदिवासी
हम सिर्फ पाठ्यक्रम के अंश हैं
विमर्श के असंख्य प्रश्न हैं
और
बस विस्मित आँखें
पूछती एक ही प्रश्न,
"क्या अब भी कुछ शेष है घटने को
मानवता का क़त्ल बार बार होने को।  "

(आदिवासी विमर्श पढ़ते हुए)




Sunday, November 22, 2015

रैक्व और जबाला



रिक्व ऋषि के पुत्र महान तपस्वी रैक्व अपने जीवन में किसी स्त्री से  नहीं मिले थे।  उन्हें ज्ञान ही नहीं था की स्त्री पदार्थ कैसा दीखता है  और उससे कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए।  आंधी तूफ़ान की कृपास्वरूप उनकी भेंट होती है राजा  जानश्रुति की एकमात्र सुंदरी कन्या जबाला से।  जबाला को देखकर वे उसे देवपुरुष समझते हैं क्यूंकि देवपुरुष का ही चेहरा इतना दिव्य, चिकना, बाल रेशम की तरह मुलायम और आँखे मृग की तरह हो सकती हैं। किन्तु जबाला उन्हें बताती हैंकि वे स्त्री हैं और रिक्व को उनसे लोक- सम्मत व्यवहार करना चाहिए।
रैक्व जबाला से मोहित हो जाते हैं और जबाला के जाने के पश्चात हमेशा के लिए उनकी पीठ में सनसनाहट रह जाती है। यह कहानी है हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास "अनामदास का पोथा " की। जिसमें कि सिर्फ रैक्व ऋषि का प्रसंग ही उपनिषद में प्राप्त ही बाकी पूरी कथा लेखक की कल्पना का चमत्कार है।

दरअसल , कहानी में  रैक्व की पीठ में सनसनाहट एक अजीब रहस्य है।  जो मुझे तब समझ आया जब मैं पति से दूर मायके आई और २ दिन के बाद पति की गर्दन में मोच आ गयी।  पति कहने लगे आ रही हो घर ? मैंने कहा , नहीं।  तो वे झल्लाकर बोले , पता है कितनी परेशानी में हूँ मैं।  कुछ देर बाद मुझे समझ आया , कहीं रैक्व की भी कुछ ऐसी ही परेशानी तो नहीं थी।  जबाला को पाने की अभिलाषा ही उनके पीठ  की सनसनाहट का मूल था।  अक्सर शारीरिक पीड़ा के मूल में मनोवैज्ञानिक कारण छिपे होते हैं।


 ख़ैर , मैं तो ससुराल आ गयी हूँ।  रैक्व और मेरे पति की पीड़ा का रहस्य भी समझ आ गया।  किन्तु एक बात अभी भी मेरे मन में घूम रही है , वह यह कि ,हज़ारी प्रसाद द्विवेदी की विचारधारा तो पकड़ में आ जाती है किन्तु उनकी शैली गज़ब की है।  जिस प्रकार से कल्पना में वास्तविकता का पुट  डालते हैं , उनके सरिका लेखक पूरी दुनिया में मिलना मुश्किल है।  यह निश्चय ही एक शोध का विषय है। द्विवेदी जी के अन्य  उपन्यासों की तरह ही यह भी अत्यंत गूढ़ ,प्रेरणादायक और मनोरंजक है।  आखिर, रैक्व में द्विवेदी जी की ही झलक तो दिखती  है।

Tuesday, October 27, 2015

खामोशियाँ आवाज़ हैं , इन्हे सुनने तो आओ कभी

यहाँ मैं एस जे बन कर नहीं लिख रही , न ही ऐंजल या जेनी बन कर।  यहाँ मैं , मैं हूँ अपने असली नाम के पीछे भी छिपी असली मैं।  मैं जानती हूँ , यहाँ तुम मुझे नहीं पढोगे न ही वो।  मेरा उससे ज़िन्दगी भर का रिश्ता है।  पिछले जन्म में भी कुछ ऐसा ही करीबी रिश्ता रहा होगा।  पर अक्सर सोचती हूँ तुमसे पिछले जन्म का ऐसा क्या रिश्ता है की , इस जन्म है भी और नहीं भी।  होकर  भी नहीं है और नहीं होकर भी है।

डायरी में पुरानी लिखी कुछ लघु कहानियाँ पढ़ रही थी।  जो दरअसल कहानियाँ न होकर हमारे बीच घटे भावनात्मक किस्से ही थे।  कहानी एक बहुत खूबसूरत कला है सच।  सच ! मैंने इस कला में अपनी बेहद दिली यादें संभाल राखी हैं, जिन्हे मेरे अलावा कोई अनकोड नहीं कर सकता।  मेरे और सिर्फ तुम्हारे सिवा।

एक बात कहूँ।  मेरे लिखने के इंस्पिरेशन भी तुम हो और यह चाहत कि  शायद कभी तुम मुझे पढ़ो , और.… बस ऐसे ही खामोश रहो।


Tuesday, August 25, 2015

बस यादें !

वक़्त नहीं है खुद के लिए भी
जाने , वो भी इसी हालत में होंगे
सोचते होंगे मेरी ही तरह
फिर कभी फुर्सत में मिलेंगे ,
फिर कभी फुर्सत में मिलेंगे।

चंद यादें भी अब याद आने से नहीं आती हैं
दिख जाए उनका नाम कहीं ,
तब  ज़िंदगी पुरानी  याद आती है।




Thursday, July 30, 2015

सच

प्यार से लिखे नामों को बारिशें मिटा देती हैं 
सपनों के नन्हें पौधों को तूफ़ान उड़ा देते हैं 
जो सच समझते हैं हम 
जिसे लेकर ओढ़े रहते हैं 
 वो महज़ एक कागज़ होता है 
पूरी किताब का -
सार नहीं !
हर दिन का ,
हर क्षण का अपना एक सच होता है
और ज़िंदगी भी 
एक पल , एक दिन में ही जी जाती है।   

Sunday, March 1, 2015

राष्ट्रीय संगोष्ठी - स्री विमर्श और मैत्रयी पुष्पा


हाल ही में मैंने अकादमिक जगत में प्रवेश किया है, एक पी. एच. डी. स्कॉलर के रूप में । पिछले एक साल में मैंने दो सेमिनार   में भाग लिया - जिनके अनुभव अविस्मरणीय रहे।  कल ही मैं मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी - स्री विमर्श : साहित्य , मीडिया और समाज में भाग लेकर लौटी हूँ।

एक साहित्य विद्यार्थी और साहित्य प्रेमी के लिए अत्यधिक आनंद, गर्व और सौभाग्य का विषय होता है एक अच्छे साहित्यकार को सुन पाना। हमारे लिए ये साहित्यकार किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं होते।  कल की इस संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में परम सम्मानीय मैत्रयी पुष्पा जी पधारी थीं।  साहित्य की इस महान हस्ती को पढ़ने का सुअवसर मुझे आज दिन तक प्राप्त नहीं हुआ किन्तु उन्हें सुनने के पश्चात मैं उनके बारे में लिखने से खुद को रोक नहीं पा रही। 
साभार - अमरउजाला


"30 नवंबर, 1944 को अलीगढ़ जिले के सिकुर्रा गांव में जन्मी मैत्रेयी के जीवन का आरंभिक भाग बुंदेलखण्ड में बीता। आरंभिक शिक्षा झांसी जिले के खिल्ली गांव में तथा एम.ए.(हिंदी साहित्य) बुंदेलखंड कालेज, झाँसी से किया। मैत्रेयी पुष्पा की प्रमुख साहित्यिक कृतियों में शामिल हैं स्मृति दंश, चाक, अल्माकबूतरी जैसे उपन्यास, कथा संग्रह चिन्हार और ललमनियाँ, कविता संग्रह- लकीरें। " ( "खुद को पत्नी मन ही नहीं कभी ", अमरीक सिंह दीप , www.nirantar.org)


" मैं लिख लेती हूँ लेकिन मुझे बोलना नहीं आता , बोलना लिखने से कहीं ज्यादा कठिन काम है।  " माइक पर आते ही सत्तर वर्ष की मध्यम कद काठी और गौर वर्ण की वह औरत कहती है कि मैं आप लोगों की तरह अकादमिक जगत से सम्बद्ध नहीं रखती मैं तो एक आम स्त्री हूँ।  यह औरत और कोई नहीं साहित्य की महान विभूति मैत्रयी पुष्पा जी हैं।  यह सच है कि पुष्पा जी भाषण नहीं देती,  सीधे साफ़ लफ़्ज़ों में अपने दिल की बात ही कहती हैं।

स्त्री-विमर्श स्त्रियों के छोटे कपडे पहनने , मेक-अप करने, लिव - इन में रहने आदि की चर्चा नहीं है , वास्तव में स्त्री- विमर्श सामाजिक और राजनैतिक हस्तक्षेप है , स्त्री के हक़ और अधिकारों की चर्चा है।  बीच - बीच में अपनी निजी अनुभूति और रहस्यों की चर्चा करते हुए मैत्रयी पुष्पा जी स्त्री- विमर्श के कई  महत्वपूर्ण मुद्दों को उठती हैं।

अगर मुझसे पुछा जाए की मुझे उनका वक्तव्य क्यों अच्छा लगा तो मैं कहूँगी कि स्त्री-विमर्श के मुद्दों की बात तो हर कोई कर सकता है उसमे कोई बड़ी बात नहीं लेकिन स्त्री के दिल की परतों को खोलने का काम बड़ा साहस का काम है । मैत्रयी जी के 3 कथनों ने इस सन्दर्भ में मुझे बेहद झकझोरा और एक चेतना प्रदान की -
पहला , प्रेमी को कभी पति नहीं बनाना चाहिए।  दूसरा , जो यह कहते हैं कि - हर पत्नी अपने पति की लम्बी उम्र की दुआ मांगती है - ग़लत कहते हैं।  जो पत्नियाँ  पति द्वारा प्रताड़ित हैं वो सोचती हैं कि - मर जाए तो खबर पड़े , इससे तो मैं विधवा भली।  और तीसरा ,   लोग कहते हैं स्त्री का चरित्र त्रिया चरित्र  होता है - यह गाली नहीं यह तो उसके चरित्र की विशेषता है - रणनीति है कि दो चाल चलकर एक चाल पीछे हो जाना ताकि ईगो वाले का ईगो संतुष्ट हो जाये , वह सोचे कि यह मान गयी लेकिन हम तो मानते ही नहीं जो करना है वह कर कर ही  रहते हैं।  यह बुरी बात नहीं है।

अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने सभी पुरुषों से एक आग्रह भी किया कि - वे माँ - बहिन की गालियाँ देना बंद कर दें क्योंकि ये भी एक स्त्री के साथ एक तरह का बलात्कार है - भाषा द्वारा बलात्कार , जिससे समाज दूषित होता है ।  मैं भी उनकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ और आशा करती हूँ पुरुष वर्ग इस बात को गंभीरता से लेगा।

बेबाकी , साफ़गोई और स्त्री के मनोविज्ञान को पकड़ लेना मैत्रेयी जी का ख़ास अंदाज़ था।  उन्हें सुनने के बाद मैं उनकी कायल हो गयी हूँ।  उन्होंने न केवल गाँव की स्त्रियों की परेशानी से रूबरू कराया बल्कि स्त्री - विमर्श के सच्चे मायने भी समझाए।

सेमीनार में एक तथ्य बेहद निराशाजनक था कि पुरुष भले ही स्त्री-विमर्श की संगोष्ठी में आयोजक, संयोजक , संरक्षक , अतिथि या अध्यक्ष के पद पर बैठा हो वह  अहम , पितृसत्ता के मूल्य , प्रतिरोध की भावना और स्त्री - विमर्श में खुद की जाति पर हो रहे हमलों से आत्मरक्षक रुख इख्तियार करना नहीं भूलता।  कई विद्वत्जन चर्चा में उटपटांग कथन कहने में भी नहीं झिझकते। विजय कुलश्रेष्ठ अपने वक्तव्य में कहते हैं कि " निर्भया काण्ड के वजह  भी स्त्री का यही सवाल है कि मैं कैसी दिखती हूँ?"     अगर यही कथन किसी राजनेता द्वारा कहा  जाता  तो मीडिया उसकी  धज्जियां उड़ाने में देर न करती , लेकिन ऐसी बड़ी अकादमिक चर्चाओं में सभी प्रबुद्ध जन समझकर भी खामोश रहते हैं आखिर क्यों ?


Thursday, January 8, 2015

अन्या से अनन्या


प्रभा जी का सिर्फ एक उपन्यास पढ़ा था और लगा की इनकी आवाज़ मेरी आवाज़ से मिलती  है।  वो भी मारवाड़ी समाज , रीति -रिवाज़ों , और महिलाओं की स्थिति के बारे में लिखतीं हैं और मैं भी संस्कृति और महिलाओं के बारे में विचार करती हूँ। इन पर पी.एच डी करने में तो मज़ा आएगा। लेकिन प्रभा खेतान जी की आत्मकथा (अन्या से अनन्या ) पढ़कर  बेहद झटका लगा।  एक ऐसी छवि के साथ मेरा नाम हमेशा  लिए जुड़ जायेगा मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।


 ऐसा सुना था कि  प्रभा खेतान की आत्मकथा बहुत बोल्ड है।  लेकिन उनकी आत्मकथा पढ़ कर मुझे कहीं भी ये नहीं लगा कि 'कुछ ज्यादा' कहा  गया है बल्कि यही लगा कि 'ज्यादा को सीमित  ' करके कहा गया है।

मैं जिन पर शोध करने जा रही हूँ वह एक ऐसी महिला हैं जिनका व्यक्तिगत जीवन उहापोह और लीक से हटकर रहा है।  मारवाड़ी समाज की यह महिला बंगाल में न केवल उच्च शिक्षा प्राप्त करती हैं बल्कि विवाह संस्था को ठुकरा कर अपने से 18 वर्ष बड़े विवाहित और पांच बच्चों के पिता से प्रेम कर बैठती हैं।   ज़िन्दगी उन्हें समर्पित कर  देती हैं।  चूँकि वह उस व्यक्ति पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं रहना चाहती इसीलिए वह पहले एक हेल्थ क्लब खोलती हैं तथा फिर चमड़े की वस्तुओं के निर्यात का व्यवसाय करती हैं।  आजीवन ' दूसरी औरत ' का ठप्पा न केवल इन्हे घोर मानसिक कष्ट देता है बल्कि इनके आत्मविश्वास को भी झकझोरता रहता है।

आत्मकथा लिखना हर किसी के लिए अलग मायने रखता है।  मेरे ख्याल में इनके लिए आत्मकथा लिखना एक कथार्सिस था।  बेहद जरुरी क्यूंकि दुनिया ने इन्हे जो कुछ भी समझा लेकिन  ठीक नहीं समझा, और  आत्मकथा तो खुद ही को समझने की और स्वयं का विश्लेषण करने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।  प्रभा जी की आत्मकथा में कहीं भी कुछ भी गैरजरूरी नहीं है। 

आत्मकथा की पृष्ठभूमि में मारवाड़ी संस्कृति के साथ साथ बंगाल का बदलता राजनैतिक परिवेश, आर्थिक संकट , आपातकालीन भारत , विश्वयुद्ध , शीतयुद्ध ,नक्सलबाड़ी काण्ड आदि सभी कुछ है।  पढ़कर लगता है इससे पहले कलकत्ता और बंगाल को कभी नज़दीक से देखा ही नहीं।



 मेरे यह कहने का मतलब कि  ,"एक ऐसी छवि के साथ मेरा नाम हमेशा  लिए जुड़ जायेगा मैंने सपने में भी नहीं सोचा था" यह है कि मैंने अपनी ज़िन्दगी में सोचा था कि मैं एक बोल्ड जीवन जियुंगी , पारम्परिक समाज को ठुकरा कर अपने मूल्यों पर ज़िन्दगी जीयूँगी। लेकिन मैं तो उसी पितृसत्तात्मक समाज का एक अंग बनकर रह गयी हूँ। प्रभा जी एक आत्मनिर्भर महिला थी और मैं ? मेरा नाम इनके साथ जुड़ जायेगा लेकिन क्या मैं प्रभा की आत्मशक्ति को जी पाऊँगी - आत्मविश्वासी , आत्मनिर्भर , हर चुनौती को स्वीकार करने वाली , हर समस्या से जूझने वाली और अंत में स्वयं को जैसे भी हो स्वीकार करने वाली।

 मुझे बेहद ख़ुशी और रोमांच है कि मेरा नाम इनसे जुड़ेगा।  
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