Saturday, September 7, 2013

अपने अपने अजनबी - अज्ञेय

अज्ञेय निसंदेह पिछली सदी के महानतम रचनाकारों में से एक हैं।  उनके चिंतन की गहराई इतनी है कि कई बार प्रबुद्ध सुधि पाठक भी उस स्तर को छु नहीं पाता।  उनका रचना संसार इतना वृहद् है और सभी विधाओं में उनकी इतनी  पकड़ है कि  ये कहना मुश्किल है कि  वे श्रेष्ठ कवि थे या उपन्यासकार या निबन्ध लेखक या यात्रा - वृत्तान्त लेखक। उनके तीन उपन्यासों में से मैंने बहुत पहले शेखर एक जीवनी के दोनों भाग पढ लेने के बाद , हाल ही में  अपने अपने अजनबी को पढ़ा, जो कि निश्चित ही चिंतन की कसौटी पर रख कर आपको चुनौती देता  है. और आप  … चिंतन के ही मृग्जाल में खो जाते हैं  … 

यह छोटा सा दिखने वाला उपन्यास , जीवन के तीन सबसे बड़े पहलुओं को समेटे हुए है - मृत्यु  ( नहीं मृत्यु तो जीवन के बाद आनी चाहिए - - - इसका मतलब चार पहलु हुए? - - - लेकिन जीवन और मृत्यु दो  भिन्न पहलु कहाँ हैं ?) अतः - जीवन-मृत्यु , स्वतंत्रता-मुक्ति और काल. इन तीनो ही विषयों पर अज्ञेय जी ने बड़ी सूक्ष्मता से विचार किया है.

उपन्यास में दो ही मुख्य चरित्र हैं -  योके , एक जवान लड़की जो बर्फ में घुमने के  लिए जाती है और स्वयं को सेल्मा , एक बूढी औरत के काठघर में पाती है जो की  बर्फ़ गिरने से दब गया है. वह निरंतर इस परिस्तिथि की तुलना  कब्रघर  से करती है.  - 

"कब्रघर के दस दिन … सुना है दसवें दिन मुर्दे उठ बैठते हैं  … "

बर्फ़ के नीचे दबे हुए इस काठघर में समय रुक गया है  … लेकिन समय क्या घडी  की सुइयों का चलना है ? घडी बंद होने पर भी समय नहीं रुकता  …  योके काल / समय के बारे में चिंतन करती है - 

"समय मात्र अनुभव है , इतिहास है. इस सन्दर्भ में , क्षण वही है जिस में अनुभव तो है लेकिन जिसका इतिहास नहीं है. … "

उपन्यास योके की दृष्टि से लिखा गया है , वह शायद सोचती है की इंसान अपनी मर्ज़ी से चीजों का चुनाव कर सकता है , लेकिन बुढिया  सेल्मा सोचती है कुछ भी चुनने के लिए हम स्वतन्त्र नहीं हैं. उनकी  सोच का ये अंतर उनकी उम्र के फासले को भी रेखांकित करता है. जब योके कहती है कि क्रिसमस अभी कितना दूर है तो बूढी सेल्मा, जो केंसर से पीड़ित है कहती है   - 

" योके तुम्हारी अभी उम्र ही  ऐसी है न ! सब कुछ बड़ी दूर लगता है  "

योके उस अहंवादी मानव की प्रतिनिधि है - जो स्वयं को स्वतन्त्र मानता है - 

"तुम जो अपने को स्वतन्त्र मानती हो वही सब कठिनाइयों की जड़ है. न तो हम अकेले हैं, न हम स्वतन्त्र हैं."

उपन्यास का अंत भयावह है. वह अहम् के विस्फोट में होता है, पागलपन की हद में होता है , योके मृत्यु को स्वयं चुन कर अपनी स्वतंत्रता पर मोहर लगाती है  … लेकिन ये वो रास्ता नहीं जहां लेखक हमें ले जाना चाहता है. सच्ची मुक्ति का रास्ता सेल्मा  का रास्ता है , उसका जीवन का निचोड़ , तत्व इन पंक्तियों में है - 

" जीवन सर्वदा ही वह अंतिम कलेवा है जो जीवन देकर ख़रीदा गया है, और जीवन   जलाकर पकाया गया है और जिसका साझा करना ही होगा क्यूंकि वह अकेले गले से उतार नहीं जा सकता - अकेले वह भोगे भुगता ही नहीं। जीवन छोड़ ही देना होता है की वह बना  रहे और भर भर कर मिलता रहे ' सब आश्वासन छोड़ देने होते हैं की ध्रुवता और निश्चय मिले   … यही एक प्रत्यय है जो नए सिरे से जिया जाता है और जब जिया जाता है तब फिर मरा  नहीं जाता , जो प्रकाश पर टिका है और जिसमे अकेलापन नहीं है  … "

संभवतः उपन्यास का ऐसा अंत , अकेलेपन की भयावहता , अहम् की जड़ता , जीवन को पकडे रहने की मुर्खता को दर्शाना के लिए किया गया है. किन्तु यहाँ भी लेखक पाठक को  अपनी राय चुनने की सवतंत्रता देता है - कि जीवन क्या है और उसे कैसे जिया जाए  … अहम् और विरोध की ध्रुवता है या साझा किया हुआ एक कलेवा जिसमे देना और लेना दोनों ही महत्वपूर्ण हैं.  

Thursday, May 2, 2013

आधे - अधूरे : क्या पूर्णता की तलाश वाजिब है?



बी ए में किसी वर्ष मोहन राकेश का "आधे-अधूरे" नाटक पढ़ा था। लेकिन तब मन में क्या विचार थे, कितना नाटक के मर्म को समझ पायी थी याद नहीं। इस साल फिर पढने का मौका मिला। जीवन में उस मोड़ पर खड़ी  हूँ की इसके मर्म को सिर्फ समझ ही नहीं सकती , समझ कर ज़िन्दगी बदलने वाला निर्णय भी ले सकती हूँ। इसीलिए इस पर विचार करना जरुरी है ... शायद आप भी समझ पाएं, मैं किस दिशा में सोच रही हूँ।

1969 में मोहन राकेश ने ये नाटक लिख कर , आने वाले युगों युगों की व्यक्तिक और वैवाहिक जीवन की समस्या को शब्दबद्ध कर दिया है। इसका नायक , "अनिश्चित" है , क्यूंकि वह कोई एक व्यक्ति नहीं , आधुनिक व्यक्ति का प्रतिनिधि है। इसकी नायिका भी आधुनिक चेतना से युक्त एक "स्त्री" है। दोनों अपनी अपनी जगह पर , अपने नामों के पीछे , साधारण पुरुष  और स्त्री हैं ... क्यूंकि वे अधूरे हैं , अपने अधूरेपन में पूर्णता की तलाश लिए हुए ...

लेकिन, नाटक में समस्या का केंद्र बिंदु स्त्री है। स्त्री के माध्यम से ही  नाटककार ने अपना भाव प्रकट किया है। निर्देशक ओम पूरी के शब्दों में , " चुनाव के एक क्षण में सावत्री ने  महेन्द्रनाथ के साथ गाँठ बाँध ली और आगे चल कर अपने को भरा पूरा महसूस नहीं किया। "

"जो ज़िन्दगी में  बहुत कुछ चाहते हैं, उनकी तृप्ति अधूरी ही रहती है। "

हमेशा खुद को एक से झटक कर दुसरे से जोड़ लेने की कोशिश , ज़िन्दगी में सिर्फ खाली खानों या रिक्त स्थान को देखने की आदत , ज़िन्दगी में पूर्णता की तलाश - जबकि पूर्णता कहीं नहीं, किसी में भी नहीं ... 

महेन्द्रनाथ (नायक) का दोस्त , जुनेजा,  उसकी पत्नी सावत्री (नायिका) को कहता है , 

"असल बात इतनी ही की महेन्द्र की जगह इनमे से कोई भी होता तुम्हारी ज़िन्दगी में, तो साल-दो-साल बाद तुम यही महसूस करती की तुमने गलत आदमी से शादी कर ली है .... क्यूंकि तुम्हारे लिए जीने का मतलब है , कितना कुछ एक साथ हो कर , कितना  कुछ एक साथ पा कर , कितनी कुछ एक साथ ओढ कर जीना। "

एक आलोचक के शब्दों में , नाटक की समस्या है पूर्णता की चाह , क्यूंकि शायद, पूर्णता की चाह ही वाजिब नहीं है। "

हम एक साथ इतनी चीजों को पा लेना चाहते हैं , की अक्सर जो हाथ में होता है उसे भी गँवा देते हैं। सावत्री की तरह। आधुनिक (अब्सर्ड) नाटकों की भाँती , यह नाटक ये नहीं कहता की पूर्णता की चाह में भटकना , अपने अपूर्णता के स्तर से उपर न उठ पाना ही मानव की नियति है। इंसान सिर्क एक बार ये समझ ले की वह खुद अपूर्ण है, और पूर्णता की चाह अलग बात है, उस चाह में अंधे हो जाना अलग बात, तो सबसे पहले वह पूर्णता के लिए बाहर भटकना छोड़ कर उसे  भीतर तलाशेगा। 

विवाह तो ऐसा बंधन है जहां दो अपूर्ण व्यक्ति मिल कर, एक दुसरे का हाथ पकड़ कर,  पूर्णता के शिखर पर चढ़ते हैं। लेकिन ये बात ही तो समझ लेना एक चुनौती है। 

  

Saturday, April 27, 2013

गदल - रांगेय राघव

गदल कहानी पढ़ी। रांगेय राघव की कहानी। एक ऐसे चरित्र की कहानी जिसका चरित्र चित्रण उतना ही मुश्किल है, जितना खुद का। उसे, जैसी वो है, वैसे देखने पर लगता है मानो, खुद ही को किसी और की नज़रों से देख रहे हों। इसीलिए, उसे जैसी वो है, वैसे देखना मुश्किल है , बेहद मुश्किल। 

45 वर्ष की गदल , पति के मर जाने पर अपना पूरा कुनबा छोड़ , 32 साल के मौनी की घर जा बैठती है। मन में है , देवर को नीचा दिखाना है। वही देवर जिसमें इतना गुर्दा नहीं की , भाई के चले जाने के बाद भाभी को अपना ले ... जिसके नाम की रोटी तोड़ता है उसे दुनिया के सामने अपना लेने में भला क्या बुराई ... लेकिन देवर दौढी ढीठ है , डरपोक है , लोग  क्या कहेंगे यही सोच सोच कर मरता रहता है।  गदल औरत है लेकिन किसी की फ़िक्र नहीं करती। वही करती है जो अपने दिल में जानती है की सही है। वही करती है जो उसे करना होता है।

औरत क्या चाहती है , तुम यही पूछते हो न। गर औरत तुम्हे अपना मानती है , तो चाहती है की तुम हक़ जताओ , फिर चाहे दो थप्पड़ ही मार कर क्यूँ न जताना पड़े। मौनी गुस्से में पूछता है , "मेरे रहते तू पराये मर्द के घर जा बैठेगी ?" गदल बोलती है, हाँ। वो उसे मारने के लिए आगे बढ़ता है , गदल बोलती है , बढ़। मौनी हठात रुक जाता है , पीछे चला जाता है। गदल निराश होती है। वो मौनी को धिक्कारती है , कहती है , तू मरद है ? "अरे कोई बैय्यर से घिघियाता है। बढ़कर जो तू मुझे मारता , तो मैं समझती , तू अपनापा मानता है।"

आज कल औरत के प्यार की भूख नहीं मिटती, शायद सदियों के संस्कार हैं उसके भीतर , जो मर्द के प्यार को उसकी मार से अलग नहीं देख पाते। मार है तो प्यार हो जरुरी नहीं , लेकिन प्यार है तो मार भी होगी। औरत के अंदर छिपी औरत मर्द चाहती है, जो उससे दबे न, उसे दबा कर रखे। और उसके प्यार की पहचान भी यही है , वह उसी से ,दबेगी  जिसे वो चाहती है। 

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(to be continued)

चूँकि गदल को को कितने भी शब्दों में बाँधने की कोशिश करो, कम ही पड़ेगी। 

Saturday, April 20, 2013

खुद को समझने के क्रम में

खुद को जानने , समझने , पहचानने का भी कैसा मोह है। परम सुख भी। परम आवश्यकता भी। लेकिन समझने के क्रम में जितने भी विचार बुलबुले की भाँती उठते हैं मानो सिर्फ खंड-सत्य है लेकिन खंड सत्य तो हैं ...
मुझे लगने लगा है , मैं इस दुनिया की हूँ ही नहीं। और अगर हूँ भी तो वह साधू जो माया और विरक्ति की देहलीज़ पर खड़ा कभी इस ओर  कभी उस ओर सुनी आँखों से ताकता है और जब माया से मुह फेर उसकी बोझिल पलकें विरक्ति के घने वटवृक्ष के नीचे हमेशा के लिए आँखे मूँद लेना चाहती हैं। लेकिन ये खेल विकट है। इतनी जल्दी रुक जाता तो बात क्या थी।

आत्मा को बोझ असहनीय है। फिर वो चाहे पत्थर का हो या फूल का। और फिर कहा था न , " दान को भी समर्पण कर देना ..." मैं नहीं जानती इन शब्दों का सही अर्थ क्या है। लेकिन एक बात मन में उठ रही है। कुछ भी लेकर रखना नहीं है सब दे देना है । कुछ भी साथ लेकर नहीं चलना - सुन्दर असुंदर , प्रिय - अप्रिय सब यहीं छोड़ चल देना है। क्यूंकि जीवन की यात्रा मन, बुद्धि, शरीर की यात्रा नहीं है। जीवन की यात्रा आत्मा की यात्रा है। और आत्मा को कोई भी बोझ असहनीय है।    

Thursday, April 18, 2013

मेरे देवता !



मेरे देवता ! 

दिनभर की खिट -पिट , झगडा जंजाल 
एक ही ले पर चलती रेलगाड़ी सी ज़िन्दगी 
बिसरने पर और बिसरता  जा रहा समय 
घडी की टिक-टिक, एक काम दूसरा काम 
हज़ारों विचार, लाखों प्रश्न, करोड़ों ख्वाब 
और ख्वार होती ज़िन्दगी 
सुनी बालकनी से सड़कों पर चलती जिंदगियों को 
ताकती आँखे 
कभी तो खत्म होना है ये , या 
कभी नहीं ? सपनो में कोई सार नहीं !
पर जब तब आँखों में तैर आता है एक द्रश्य - 
लाल चुनर और सिंदूरी मांग 
और तभी जाग उठते हैं वो संस्कार , वो सपने - 
की मेरा सर झुके जिन चरणों में , 
वो पूज्य हों !
वो ... मेरे देवता हों !

Friday, March 29, 2013

समर्पण की कसौटी

एक ही बात रह रह कर मन में आती है , तू उनकी होने वाली है। मनसा होना एक बात है, कर्म से, रीती से बंधन में बंध  जाना दूसरी। क्या उनको पति रूप में पाने के लिए तैयार हूँ? सारे भाव उनको समर्पित करने को तैयार हूँ? क्या ये बड़ी बात है ? नहीं तो , क्या ये इतनी छोटी सी  बात है? क्या यह सच में होना है ? नहीं भी होना , तो मन अभी से इतने भावों से घिरा क्यूँ है? क्यूँ लगता है की , वो यहीं हैं , मेरी इस बचकानी सी बैचैनी पर मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं। सच कहूँ तो लगता है ये समर्पण की कसौटी है। मैंने बंधन-मुक्त होने का भरसक प्रयास किया। रिश्तों को नाम देने से कतराती रही। तो शायद ये गुस्साए होंगे, बोले होंगे , थोडा बंधन का रस उन्हें भी दिया जाये। तभी से मुझे बंधन में बांधना शुरू किया। खुद ही कभी भैय्या बन कर आते , कभी बहन , कभी सहेली , कभी माँ की ममता के बंधन से बाँध लेते ... मैं बंधन से छूटने को छटपटाती भी , और बंधन से मुग्ध भी हो जाती ... ऐसा  बंधन भी कितना काम्य है ...

लेकिन समर्पण ! समर्पण आसान नहीं ...  विद्यानिवास मिश्र जी कहते हैं ,

" ज्ञान , प्रकाश , अच्छाई तो हर एक दे सकता है और बड़े सच्चे भाव से दे सकता है , पर अपना मोह, अपना अन्धकार और अपनी भीतर की बुराई देने का साहस नहीं होता , प्रिय से भी कुछ चीजों का दुराव रह ही जाता है।  .... पर अपने को बिलकुल पराया मानकर और उनको अपना मानकर जब दिया जाएगा तो फिर उससे दुराव नहीं रह पायेगा , दुराव तो उससे होता है जिसके लिए एकदम अपनी होने का अभिमान हो , जिसके लिए पराई हैं उससे क्या छिपाना , वह हमारा भीतर बाहर सब देख सकता है ; क्यूंकि भीतर तो वही वही है , बाहर कोई भी हो तो उसी के रंग में सराबोर होकर है। "

अपना सब उनको दे देना , सुख भी उन्ही का, दुःख भी उन्हें समर्पित , पाप हुआ तब भी , पूण्य  भी उन्हें समर्पित, क्षमा मांगनी हो तो उनसे, क्षमा करना हो तो उनको समर्पित, जीवन से जुड़े अनसुलझे प्रश्न और उनसे मिले उत्तर भी उन्हें ही समर्पित ... जीवन का कोई भी पक्ष मन का कोई भी भाव उनसे अछूता न रह जाए ... सब कहीं वो ही वो हो ... गर तुम्हे लगता है ये सपना है , हकीकत नहीं , तो मैं कहूँगी हकीकत का बनना तुमने अब तक नहीं जाना , उन  सपनो , और खुली आँखों से देखे हुए सपनो ; जिनमे हृदय की गहन अनुभूति का प्रकाश हो , से ही हकीकत बनती है।


...



राधा भेली मधाई

"... अनुखन माधव - माधव रटते रटते राधा माधव हो गयी और माधव के रूप में अपने को स्थापित करते ही बैचैनी कम होने के बजाये और बढ़ गयी , बैचैनी राधा के लिए , जो अब वह नहीं रही और फिर माधव बनी राधा  राधा बनकर माधव को सांत्वना का सन्देश भेजती है , सन्देश पहुंचा नहीं की विह्वल होकर पुनः माधव बन जाती है और एक ही विजड़ित चित्त के दो पात चिर जाते हैं : एक राधा दूसरा माधव , दोनों और आग पकड़ चुकी है, बीच में प्राण एक कीड़े की तरह फंसा हुआ अकुला रहा है .... " ( राधा माधव हो गयी ; विद्यानिवास मिश्र  )

एक बात बताओ , रुकमनी को तो पत्नी होने का गौरव मिला था, फिर भी युगों युगों से माधव  के साथ राधा ही क्यूँ प्रतिष्ठित है ? क्या विरह का स्थान इतना श्रेष्ठ है? राधा माधव कौन हैं? इश्वर? आद्यशक्ति और नारायण ? प्रेमी प्रेमिका ? या भारतीय गूढ़ चिंतन के कोई प्रतीक ?

मेरा मन कहता है मिश्र जी आधुनिक युग के प्रकांड पंडित एवम सांस्कृतिक चिन्तक हैं, भावों से ओत-प्रोत भाषा में इन्होने भी लिखा है, लेकिन जब राधा-माधव को "जैसे वो हैं " वैसे  समझने की बात आती है, तब  शायद सूर से अधिक सफल कोई न हो सका। सूर जन्मांध हैं , लेकिन कृष्ण की जो मूरत वो देख सके हैं, राधा का जो विरह उन्होंने महसूस किया है, गोपियों का अनन्य प्रेम जो सूर ने चित्रित किया है, अन्य  कहीं दुर्लभ है।

"राधा माधव, भेंट भई।
राधा माधव , माधव राधा, कीट भ्रंग गति ह्वये जू गयी।।
माधव राधा के रंग रांचे, राधा माधव रंग रइ।
माधव राधा प्रीती निरंतर , रसना करी सो कही न गयी।।
बिहँसी कह्वो हम तुम नहीं अंतर , यह कहिंके उन ब्रिज पठई।
सूरदास प्रभु राधा माधव, ब्रिज बिहार नित नयी नयी ।। "

सूरदास जी कहते हैं की, भृंगी नाम का एक कीड़ा होता है , जो किसी कीड़े पर गुंजार करके उसे अपने ही रूप में परिवर्तित कर देता है। राधा माधव की भी ऐसी ही गति हुई है. माधव राधा के रंग में रंग गए और राधा माधव के रंग में। माधव राधा की प्रीती इतनी प्रकृष्ट और दिव्य है की कोई कवि  उसको वाणी के द्वारा व्यक्त नहीं कर सकता। राधिका कृष्ण की लीलाएं नित्य है. उनमे नित्य नवीनता आती रहती है।


कुछ समय पहले जब कृष्ण का आलोक जीवन में आया तभी, उसी क्षण दुनिया झूठी लगने लगी, लोगों की बाते झूठी लगने लगी ... जितना कृष्ण की और मन झुकता , माया उतना ही मन को बाहर की और खींच के ले आती ... एक पागलपन सवार होने को होता, मीरा की तरह सब भूल के कृष्णमय हो जाने का  मन होता ... लेकिन फिर दुनियादारी ... बैचैनी पैदा होती की लोगों की नज़रे ठन्डे छींटे डाल  देती ... बहुत समय पहले एक अजीब-सी उदासी छा  गयी थी , विरक्ति का भाव , सब कुछ होते हुए भी कुछ न होने का भाव    ... हमेशा मन खोया सा रहता ...  अब इसी उदासी पर एक नया रंग चढ़ा है ... प्रेम का उत्साह भी है विरह की व्यथा भी ... जिसने कभी रंच मात्र भी ये विरह , ये अनूठा प्रेम महसूस नहीं किया उसकी शुष्क बुद्धिवादी चेतना पर तरस आता है , ज्ञान की पोथी, विज्ञान के आविष्कार, सभ्यता की उन्नति सब कुछ कितना फीका है उस परमानन्द के सामने ... लोग जब बड़ी बड़ी बाते करते हैं तो हंसी आती है , कोई चोर मन में कहता है , ये सब तेरे ही माधव की तो लीला है , जो भटके हुए हैं उन्हें कौन समझाए ...

फिर मिश्र जी की बात याद आती है , "मन कितना बंटा  हुआ है , मनचाही और अनचाही चीजों  में" .

"माधव तुम्हारे कब से हुए, बता सखी ?"
"जब से मैं उनकी हो गयी, राधा ।"

Sunday, February 10, 2013

गोदान, पुनर्नवा, और स्त्री

बहुत समय हुआ जब मन में पहली बार ये सवाल उपजा था की- मुझे क्या करना है, जॉब या कुछ नहीं। मैंने कुछ नहीं को चुना - फिर भी बहुत कुछ कर लिया - एम् ऐ हिंदी में, और दादाजी की सेवा, घर के काम भी सिख लिए, और स्वाध्याय का आनंद भी पा लिया। फिर मन में एक सवाल खड़ा हुआ है - अबकी बार शादी का , पति , परिवार, और भविष्य का है। लेकिन जवाब इस बार भी उन्ही विचारों के इर्द-गिर्द मंडरा रहा है। जॉब नहीं करना - ऐसा तो बिलकुल भी नहीं जिसमे दम घूंटे , जीने के मायने जाते रहे, और इंसान एक पहिया बनकर रह जाए। जब गाडी ही उसने बनायी है तो वो मात्र पहिया क्यूँ बना रहे? और फिर ये भी तो उसके हाथ में है की उसे पैदल चलना है या गाडी चाहिए। मुझे इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता . सिर्फ ये जरुरी है की रास्ता इतना सुहावना हो की रास्ता ही मंजिल लगने लगे, मंजिल और रास्ते का फर्क मिट जाए।

लेकिन बात कुछ और है। बात है स्त्री की, स्त्री-पुरुष कर्तव्य की, विवाह की। जबसे प्रेमचंद का गोदान पढ़ा है, मन में मिस्टर मेहता के स्त्री समानता के सम्बन्ध में कहे विचार घूमते रहते हैं। स्त्री और पुरुष सामान हो ही नहीं सकते। स्त्री का दर्जा  पुरुष से कहीं ऊँचा है। स्त्री पुनर्नवा है, बासी को ताजा करने वाली। वो पुरुष की प्रेरणा है। मुझे दुःख होता है देख कर की, स्त्री अपने स्व-भाव को भूल गयी है। ममता, वात्सल्य, त्याग, तितिक्षा, सर्वस्व लुटा देने की शक्ति स्त्री खोती  जा रही है। उसमे अहम् और महत्वकांक्षा घर करती जा रही है। और ये सब क्या पुरुषों की बराबरी करने का नतीजा नहीं है? मैंने ऐसे भी परिवार और पुरुष देखे हैं, जिनकी विवाह के सम्बन्ध  में पहली ही शर्त होती है- कामकाजी स्त्री, अच्छी नौकरी वाली। हंसी आती है। इतनी की क्या बताऊँ। तरस भी आता है। सोचती हूँ, यही परिवार , यही पुरुष तब क्या कहेंगे जब उनकी बहु, उसकी पत्नी - काम के चक्कर में घर ढंग से न चला पाए बूढ़े माँ-बाप की सेवा न कर पाए। पैसों से ही क्या एक सुखी-संस्कारी घर बन जायेगा? मैं किसी का दोष नहीं देख रही सिर्फ सोच रही हूँ की क्या हम जीवन का मर्म और जीने कला सिख गए हैं, या अभी बहुत कुछ ऐसा है जिसका एहसास होना बाकी है?

पुनर्नवा में द्विवेदी जी लिखते हैं, जो अपने स्व-भाव को नहीं पहचान पता वह भटक जाता है। स्त्री ऐसे ही भटक गयी है, सामूहिक रूप में भी और व्यक्तिक रूप में भी। अपनी बात करूँ तो कहूँगी, संसार में यही मुख्य बात भी है और सबसे मुश्किल भी - अपने स्व-भाव को पहचानना और उसी के अनुरूप जीवन में अपने उद्देश्य की पूर्ति करना।  

" ...'स्व-भाव' अपने आपको प्रयत्नपूर्वक पहचानने में समझ में आता है। अपने वास्तविक भाव को जानना कठिन साधना का विषय है। ... जो भाव उन्हें दिया नहीं जा सकता वह व्यर्थ है, निष्फल है, बंध्य है। वह अपना भाव भी नहीं हो सकता। उसे आगंतुक विकार ही समझो। ..." 

Saturday, February 9, 2013

पुनर्नवा - हजारी प्रसाद द्विवेदी



बात बस इतनी सी है, मैं खुद को रोक नहीं पा रही। नहीं, इतनी सी बात नहीं हो सकती। मुझे हजारी प्रसाद जी के उपन्यास पढ़ कर न जाने क्या हो जाता है। होता तो निर्मल वर्मा के उपन्यास पढ़कर भी है, लेकिन वो मन को अस्त-व्यस्त कर बुरी तरह से हिल देते हैं, अँधेरे का चरम दिखा देते हैं। लेकिन हजारी प्रसाद जी के लेखन में कोई अलौकिक शक्ति है। ऐसा लगता है जैसे सत्य सौ परदे चीर कर आँखे चौंधिया देता है। वर्मा का लिखा हुआ आत्मानुभाव सत्य-यथार्थ है, हजारी जी का अलौकिक सत्य, जिसका कोई विकल्प नहीं, कोई भी नहीं ।

एक मित्र के सहयोग से पुनर्नवा उपन्यास हाथ लग गया । , सच में ये उपन्यास , पुनर्नवा ही है। इसके बारे में कुछ भी कहना मेरे लिए संभव नहीं। हाँ इतना जरुर कहूँगी की, जिसने हजारी जी के उपन्यास नहीं पढ़े, उसने हिंदी साहित्य में कुछ नहीं पढ़ा, क्यूंकि इनके उपन्यास हिन्दू संस्कृति का निचोड़ तत्व हैं। और हजारी जी सिर्फ संस्कृति के ही मर्मग्य नहीं बल्कि उत्तम कथाकार भी हैं। उनके उपन्यास में जितनी श्रेष्ठ कोटि का भाव तत्व है, उतने ही श्रेष्ठ कोटि का कलात्मक गुण है। कथा को वे जिस क्रम में पेश करते हैं वह  पूर्ण रहस्यात्मकता, उत्सुकता, कला-आनंद बढाने वाला है। उनकी चरित्र रचना इतनी विविध- प्राक्रतिक और अपने में पूर्ण है की ये एहसास ही नहीं होता की हम कथा पढ़ रहे हैं, बल्कि ऐसा ही लगता है की, जिन्हें हम जानते आये हैं उन्ही पात्रो के बारे में पढ़ रहे हैं। सचमुच ये एक बड़ी  उपलब्धि है।

हजारी जी की सबसे श्रेष्ठ बात है की वे उनके मुख्य पात्रों को अच्छा या -बुरा नहीं बताते , उन्हें वे जैसे हैं, अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ हमारे सामने रख देते हैं। उनके चरित्र वास्तव में "ग्रे" हैं, ऐसे ही जैसे उन्हें होना चाहिए, अपने अस्तित्व को टटोलते हुए, द्वंद्व में पड़े, कुंठा ग्रस्त, आत्म-ग्लानि और आत्म-भर्त्सना के शिकार परन्तु हमेशा कुछ ऊँचा, पवित्र, श्रेष्ठ, ईश्वरीय भाव की खोज में लगे हुए हैं। उनके चरित्र आध्यात्मिक यात्रा में भटके हुए राहगीर हैं जो अपने को सही जगह पर देखना चाहते हैं और  इस संसार में अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रेरित हैं।

इसीलिए उनके उपन्यास हर भटके राहगीर के लिए प्रकाश-स्तम्भ है, एक प्रेरणा का स्त्रोत है। कभी कभी ये इतने रहस्यमयी से लगते हैं की मानो इस संसार में ये उपन्यास इश्वर की ही प्रेरणा से उसी व्यक्ति के हाथ में लगना हो, जिसे इश्वर कुछ इंगित करना चाहते हों। कम से कम, मैंने इन्हें एक क्षण में ऐसा ही पाया है। सब कुछ एक गुत्थी जैसा है, जो किसी एक क्षण अचानक सुलझ जाती है, फिर दुसरे ही क्षण उलझी सी लगती है । जैसे सच्चे भक्त को, इस संसार में पत्थर की मूर्ति में भी भगवान् दर्शन देकर फिर अद्रश्य हो गए हो। कहीं न  कहीं कोई रहस्य सम्पूर्ण जगत में स्पंदित है, जो ऐसे शब्दों के माध्यम से कुछ क्षण के लिए प्रकट हो जाता है और फिर लुप्त । काश की ऐसी ज्योति आत्मा में चिर - प्रज्वलित  रखने का कोई उपाय  मिल पता।
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