Friday, October 26, 2012

मृत्युंजय - एक चरित्र, अनंत कहानी

कर्ण ! अब ये मेरे लिए एक नाम या महाभारत का एक चरित्र मात्र  नहीं रह गया है। 

आज मृत्युंजय  उपन्यास पूरा हुआ। किसी भी कार्य के शुरू होने से उसके पुरे होने की भी एक कहानी होती है। लेकिन आज वह नहीं। यूँ तो विचारों के कई बुलबुले जैसे  कई दिशाओं में फेल गए हैं , लेकिन मैं मात्र एक को लेकर चलूंगी। अब , आखिर, अब भटकना उचित नहीं। 

पांच पांडव या कर्ण  - इनमे से कौन श्रेष्ठ है? ये सवाल नहीं, ये विचारों का जाल है। श्रेष्ठता को सिद्ध करना इतना आसान नहीं और वो करने वाली मैं कुछ भी नहीं - - - लेकिन - - - कर्ण श्रेष्ठ है--- और अगर है तो उसकी श्रेष्ठता का कारण क्या है - - - 

कर्ण का जीवन भयंकर संघर्षमय रहा और यह उपन्यास शत-प्रतिशत उसके संघर्षों को प्रकट करने में सफल रहा है। कर्ण की श्रेष्ठता के कुछ बिंदु जग-जाहिर हैं -वह महा-पराक्रमी , महावीर, अर्जुन से भी कुशल योद्धा था, उसकी ख्याति दिग्विजय कर्ण की जगह दान-वीर कर्ण के कारन हुई, लेकिन इससे भी श्रेष्ठ गुणों से वह युक्त वीर था - वह था - स्थिर बुद्धि, वचन-बद्धता। इसे ही कृष्ण ने आदर्शवादिता कहा है और इसीलिए उन्होंने कर्ण की जगह पांच पांडव को चुनने का बहुत मुश्किल निर्णय लिया। लेकिन इन्ही दो गुणों के कारन कर्ण किसी भी  पांडवों से  सौ गुना श्रेष्ठ है और पांडवों का जयेष्ट भात्र  कहलाने योग्य है। 

संघर्ष -शील , पथ-भ्रष्ट , शापित, परन्तु सत्यान्वेषी, स्थिर-बुद्धि, और एक परम भक्त कर्ण। सुर्यपुत्र  कर्ण की विलक्षणता का परिचय प्रारंभ से उसके कवच्कुंदल के अतिरिक्त इस प्रश्न  से मिलता है  - "मैं कौन हूँ". स्वयम के सत्य को जानने की प्रबल इच्छा। कर्ण की विलाक्षन्त्ता का अद्भुत प्रमाण है - दान देने का प्राण। जिसके चलते उसने अपने कवच-कुंडल इंद्र को दे डाले और मृत्यु-शैय्या पर सोने के दो दांत भी दिए। यह अद्भुत नहीं तो और क्या है, क्या यह सबके बस की बात है? 

सबसे अधिक प्रशंसनीय है उसकी कृतज्ञता जो उसने दुर्योधन का साथ अंतिम क्षण तक निभा कर की। वह यह जानता था की वह पथ-भ्रष्ट हो चूका है, फिर भी उसी पथ पर टिका रहा, लेकिन ससम्मान। यही महत्वपूर्ण है। जो रास्ता आपने चुना है, फिर चाहे धरती ही क्यूँ न हिल जाये , कितनी ही बड़ी विपत्ति क्यूँ न आ जाये, उस पर टिके रहना लेकिन इस प्रकार की आपका सम्मान सुरक्षित रहे। क्यूंकि सम्मान के बिना व्यक्ति उतना ही ठूंठ  है जितना पत्तियों, फूलों के बिना पेड़। 

महाभारत महान पराक्रमी विलक्षण अद्वितीय महा पुरुषों की कहानी है , जिसमे स्वयम भगवन श्री कृष्णा भी एक पात्र हैं। रचनाकार ने जगह जगह एक ही बात दुहराई है, बड़े लोगों के दुःख भी बड़े होते हैं। साथ ही एक और बात जो इस उपन्यास की बहुत बहुत ख़ास है - की मानव रूप में ये देव रुपी महापुरुष भी परिस्थितियों के सामने उतने ही दीन-हीन देखते हैं , जितने की हम जैसे आम  इंसान। सत्य जानने  वाले पितामह भीष्म, यहाँ तक की श्री कृष्ण जिन्होंने स्वयम माया रची है, उनके सम्मुख भी एक क्षण आता है जब वे निर्णय न कर पाने की स्तिथि में होते हैं, वे भी संभ्रांत होते हैं।

 ये देव गुणों वाले ऐसे मानवो की कहानी है जिसमे  सत्यान्वेषी पुरुष सत्य के लिए लड़ते हैं, धर्म के लिए आवाज़ उठाते हैं, कर्म करने को तत्पर रहते हैं,  भ्रमित भी होते हैं, और संघर्षों के मध्य अपने - अपने रास्ते का चुनाव करके लक्ष्य निर्धारित कर उस तक पहुँचने की कोशिश करते है--- क्या हमारी भी कहानी कुछ ऐसी ही नहीं  है?  

Monday, October 15, 2012

अध्-पके विचार - मृत्युंजय (शिवाजी सावंत)

मेरा मन अभी कितने भावों का क्रीडा-स्थल बना हुआ है, मैं बता नहीं सकती। एक लम्बी यात्रा से जब घर पहुंची तो इस बात का अंदाजा भी नहीं था की मम्मी  ने मेरे लिए 'मृत्युंजय' लाकर रखी होगी . न जाने कबसे इस पुस्तक को पढने की हार्दिक इच्छा मन में थी।दो-तीन दिन ही हुए हैं किताब शुरू किये हुए, लेकिन मन में न जाने कितने विचार आ गए।  विचारों की तो छोडिये, न जाने कितने भाव जो किरदारों ने महसूस किये वो मेरे मनचले मन ने भी कर डाले।

मृत्युंजय , महशूर मराठी उपन्यासकार , शिवाजी सावंत द्वारा लिखित एक बेहद लोकप्रिय उपन्यास है। महाभारत की इस व्याख्या का मुख्या किरदार, वो भूला हुआ सूर्य-पुत्र , ज्येष्ठ पांडव कर्ण  है, जिसका जीवन स्वयम में जीवन की एक श्रेष्ठ पाठशाला है। महाभारत को साधारण दृष्टि से देखने पर यह मात्र एक अट्ठारह दिवसीय धर्म-युद्ध हो सकता है परन्तु अन्य महा-काव्यों की भाँती यह भी मानव और नियति सम्बन्धी कई गुत्थियों पर प्रकाश डालता है।

यूँ तो अब तक की कहानी पढ़ कर मन में कई विचार चक्कर लगाते  रहते हैं परन्तु एक विचार जो दिल मैं पैठ सा गया है वह यह की - जब सूर्य-पुत्र , पराक्रमी  योद्धा, दानवीर कर्ण ; अर्जुन जैसा धुनार्धर वरदान प्राप्त कुंती, यज्ञफल स्वरुप जन्मी साक्षात सुगंध की देवी द्रौपदी, धर्म-राज युधिष्ठिर, धीर-गंभीर भीष्म पितामह, और स्वयं भगवन स्वरुप श्री कृष्णा ही जब नियति की डोर से बंधे इस पृथ्वी पर  मात्र कठपुतली से हैं तो हम साधारण कलयुगी मनुष्य इस बात का दंभ कैसे भरने लगे की हम पृथ्वी की सर्वश्रेष्ठ कृति हैं, और इश्वर-नाम की वस्तु  भी शोध  का विषय है। क्या सचमुच ही मनुष्य अपनी मुर्खता की चरम-सीमा पर नहीं है?

महा-मानव होते हुए भी इनके मन में शंकाओं, आशाओं की लहरें उठती हैं, इनका भी संयम डांवाडोल होता है, इनसे भी भूलें होती हैं, पाप होत्ता है, - और अगर ये सब नियति की एक महा-लीला के उद्देश्य से होता है तो हमारे जीवन में भी ये सब किसी योजना के तहत नहीं होता  होगा? पर अगर ऐसा होता भी है तो प्रश्न ये है की - कैकयी ही क्यूँ? कुंती ही क्यूँ? क्यूँ कर्ण ही  ऐसे भाग्य का स्वामी बना? क्यूँ पांडू को ही उस भयंकर श्राप का ग्राही बनना पड़ा ?

खैर! प्रश्नों का अंत नहीं है  ... अब जब उगते सूरज का प्रचंड वैभव देखती हूँ तो, पूरा के पूरा महाभारत आँखों के सामने ऐसा खड़ा हो जाता है मानो ये कल की ही बात हो ... सत्य को पहचानने  के लिए श्रद्धा और आँगन की तरह खुला मन चाहिए, कोई प्रमाण नहीं ...


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