Saturday, March 13, 2010

निज भाषा का प्रेम

मन में कई विचार दौड़ रहे हैं ... पढ़ रही हूँ इंग्लिश पर विचार हिंदी भाषा को लेकर हैं. 


क्या हिंदी केवल भाषा है? यही सवाल में इंग्लिश के लिए भी पूछ सकती थी , पर जवाब में तभी दे पाती जब इंग्लिश बोलने वाले देश में रहती. भाषा हमारी संस्कृति से सीधा सम्बन्ध रखती है. किसी भी देश की आत्मा को समझना हो तो उस देश के साहित्य को पढना चाहिए. हिंदी हमारी केवल भाषा नहीं है. कई देशो में हो सकता है की उस देश की भाषा , भाषा से अधिक कोई महत्व न रखती हो , पर हमारे लिए निश्चित रूप से हिंदी का अनूठा स्थान है. मुझे कभी कभी ऐसा लगता है की , ये हमारी गलत धारणा है की हम चीजों को चुनते हैं , सही मायने में चीज़े हमें चुनती है. कहा जाता है , भगवान् जब तक न बुलाये , हम उस मंदिर जा ही नहीं पाते. ठीक उसी तरह , हम चीजों को जितना प्यार देंगे वो हमारी बनकर रहेंगे. हिंदी को हमने बहुत प्यार दिया है , इसे राष्ट्र भाषा बनाने में क्या कसार नहीं छोड़ी , ओर आज तक भी अंग्रेजी के प्रकोप से इसे बचाने के लिए हम इसे अपने गले से लगाए हुए हैं. ये हमारा प्यार है हमारी भाषा के प्रति. ओर देखिये ये हिंदी हमारा प्यार हमें कैसे लौटाती है. किसी से आप दूसरी भाषा में बात करे ओर फिर उससे अच्छी हिंदी में बात करे , आप खुद महसूस करेंगे की हिंदी भाषा से प्रेम की अनोखी धारा बहती है. जाने क्या जादू है इसमें? पर इसके सही प्रयोग करने पर हमे इसमें से संस्कृत जैसा सम्मान ओर उर्दू जैसे मिठास का अनुभव होता है. 


हिंदी के पश्चात अगर कानो को कुछ लुभाता है तो वो है क्षेत्रीय भाषाए . पंजाबी का खुलापन , लड़कपन देखिये , बंगाली का माधुर्य , ब्रज भाषा की तुलना किस्से की जा सकती है . बिहारी बोलना तो लालू की वजह से नया फैशन बन गया था. हाँ मराठी थोड़ी कड़क भाषा लगती है. राजस्थानी जब प्यार से - पधारो महरे देश कहते हैं तो फोरेनेर भी भाव विहल हो जाते हैं. इस देश की एक एक बोली में भी जादो है. लिटररी फेस्ट के दौरान शोभा दे जी ने सही कहा था की - भारत की गली गली में जादू है , हमें जादू - ओर परियो के किस्सों की क्या जरुरत है? 


एक बात इन दिनों मैंने ब्लॉग की दुनिया में गौर की - वह यह की आप इंग्लिश के ब्लॉग पर जाये , किसी की प्रशंसा करे , उसके भावो को सराहे , पर बदले में सिर्फ एक - थैंक्स के कुछ नहीं मिलेगा. ओर यही आप किसी हिंदी ब्लॉगर के साथ करे तो बदले में - धन्यवाद् के साथ - प्रेम मिलेगा, स्नेह मिलेगा, आशीष मिलेगा . हिंदी दिल से दिल को जोड़ने का कार्य करती है. एक हिन्दुस्तानी जब हिंदी में बोलता है तो वह निश्चित ही अपने दिल से बोलता है . हिंदी भाषा से जितना प्रेम आप लुटा सकते हैं , मुझे नहीं लगता अंग्रेजी उसका एक - चौथाई प्रेम भी दे सकती ; कम से कम अन्य भाशिये देश में नहीं दे सकती , उनके देश में हालांकि वह ही भाषा सभी भावो को प्रकट करने का माध्यम है - क्यूंकि वो उनकी निज भाषा है , जैसे हिंदी हमारी है. 
"निज" शब्द से भारतेंदु जी की पंक्तियाँ याद आ गयी - 


निज  भाषा  उन्नति  अहै  , सब  उन्नति  काउ  मूल  
बिन  निज  भाषा  ज्ञान  के  , मिटे  न  हिय  काउ  सूल .



Friday, March 12, 2010

भाषा का द्वंद्व

 परीक्षा शुरू होने में मात्र अट्ठारह दिन शेष हैं. चिंता स्वाभाविक है. पर बैचैनी ओर भी बहुत चीजों की वजह से है . में अंग्रेजी साहित्य की विद्यार्थी हूँ. यह मेरा हमेशा से प्रिय विषय है. पर साथ ही हिंदी साहित्य भी मुझे बेहद पसंद है शायद इसका श्रेय मेरी मम्मी को जाता है जो की हिंदी साहित्य की लेक्चरार है या फिर मेरी रूचि को जिसकी वजह से मैंने दोनों साहित्य  ब. ए तक पढ़े. 


परन्तु अब लगता है बहुत बड़ी गलती की दोनों साथ पढ़कर . एक द्वंद्व सा छा गया है जीवन में. जब कॉलेज में थी तब इंग्लिश की क्लास के बाद इंग्लिश ही बोलती थी , इंग्लिश में ही सोचती थी , ब्रिटेन की दुनिया में खोयी रहती थी , ओर जब हिंदी की क्लास से निकलती , मन में पन्त की , तुलसी दास की पंक्तियाँ घुमती थी .  


दोनों साहित्य पढने से एक अच्छी बात यह हुई की मुझे यह समझ में आया की चाहे वह भारत हो या विदेश ,  मानव मूल्य , उनकी भावनाए सब जगह लगभग एक सी हैं. दोनों साहित्य को  साथ में पढने से एक दुसरे से अच्छे से सम्बंधित कर पायी. एक ओर बात जो मैंने गौर की वह ये की दोनों साहित्य की धारयिएन साथ ही बही या एक का प्रभाव दुसरे पर पढ़ा. जैसे की अमेरिका एवं ब्रिटेन में जब existentialism की लहर आई तो उसका प्रभाव भारत पर पड़ा ओर यहाँ के साहित्य में अस्तित्ववाद छा गया. दोनों साहित्य की एक धारा को पढ़ कर उसे ओर गहराई से समझने का मौका मिलता है. 


लेकिन इसका एक बुरा प्रभाव जो मुझ पर पड़ा है वह यह है की में अपने आपको दो संसार में खोया हुआ पाती हूँ . एक अजीब से द्वंद्व में हूँ. एक ही समय दो विचार आते हैं - दोनों अलग - एक इंग्लिश में तो दूसरा हिंदी में :) अजीब सा मिलन है. हिंदी वाले अंग्रेजी से खफा , अंग्रेजी वाले हिंदी को तवज्जो नहीं देते... ओर में? में बीच में त्रिशंकु बनी हुई लटक रही हूँ. में गलती से लेखीका हूँ दोनों ही भाषाओं की . एक कविता हिंदी में तो उसी समय दूसरी इंग्लिश में बन जाती है. पर में दोनों से ही बराबर प्यार करती हूँ इसीलिए दुविधा ओर भी बढ़ जाती है. कभी एक विचार आता है तो मन सोचता  है - हिंदी में लिखू ? या इंग्लिश में? फिर मना की इंग्लिश में लिखा तो मन करता है इसी को काश हिंदी में लिखती . फिर एक दिल कहता है चलो कोई बात नहीं अब इसे अनुवाद कर लेना.... पर में ओर मेरा आलस ! 


इच्छा है की अंग्रेजी ओर हिंदी की सभी विधाओं में कुछ न कच लिखू. ओर साथ में कभी अनुवाद भी करू - अगर अपनी ही कोई रचना कर सकी तोह बहुत ख़ुशी होगी. ओर अंत में आशा है की मेरा द्वंद्व समाप्त हो , ओर दो  साहित्य की इन दो राहो से अपनी एक नयी राह खोज सकू. 



Thursday, March 11, 2010

ढलते सूरज की यादे ओर नए सूरज का इंतज़ार

ढलता सूरज                                                                         
बुझते  दीपक की लौ के समान
चमका दो पल के लिए
आँखों को चकाचौंध कर 
दिल में उमंग जगाकर
जोश को सिंहासन पर बैठा कर
सपनो में सिरहन पैदा कर
बुझ गया
नहीं! वो सूरज  था
ढल गया.


ये रात क्यूँ आती है?
पर उससे पहले
ये शाम भी तो कुछ गाती  है; 
कुछ उदासी के गीत,
जो बुझे दीपक की लौ पर
उठते धुए के समान 
मन पर काला साया बिखेर देती है...


ये शाम वक़्त से पहले बूढ़े हुए
किसी बच्चे सी गुमसुम रहती है
रात तो फिर भी 
बहुत तो नहीं पर कुछ
आराम सा  देती है...


सूरज ढलने से लेकर 
में उस वक़्त का इंतज़ार करती हूँ
जो इस शरीर के सभी दरवाज़े
हौले से बंद कर
मेरे सपनो में खो जाएगा 
जब तक नया सूरज फिर से आएगा
जब तक कोई उस ढलते सूरज की यादो को मिटाएगा.

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