Thursday, December 30, 2010

साम्या

"नहीं ये नहीं हो सकता " ,"लेकिन क्यों नहीं ? क्या अब हम दोस्त नहीं हैं ? " "दोस्त ... हाँ... पता नहीं...मुझे नहीं पता ... प्लीज़ मुझे अकेला छोड़ दो." इतना कह कर साम्या रेस्टोरेंट से चली गयी और उसके बाद मैंने उसे कभी नहीं देखा... अगले कई  सालों तक  नहीं. जब में उससे पहली बार मिला तब मुस्किल से वह बीस-इक्कीस साल की होगी...ओह...बहुत ही मासूम सी लगती थी.. छोटा कद , घुंघराले बाल .. ज्यादा लम्बे नहीं .. शायद कंधे तक... और गहुआ रंग ... भीड़ में कम बोलना .. और अकेले में चिल्लाना ... जोर जोर से हँसना ... वेटर के सामने मुस्कुराना और उसके पलटते ही मुझे आँख मारना... जब मैं उसे बच्ची समझता तो बड़ो जैसी हरकते कर जाती ... और जब मैं कुछ करने जाता ... मासूम बन एक टक ऐसे  देखती जैसे मैंने कोई गुनाह कर दिया... बिलकुल पगली लड़की थी...

"पापा ये देखिये... आंटी...! साम्या आंटी को प्राइज़ मिला..." प्रशांत ने मुझे एक दम हिला ही दिया... मैंने प्रशांत को धीरे से मुस्कुरा कर कहा.. "हाँ ! लेकिन साम्या ने से इसे लेने से मना कर दिया..." अब प्रशांत के चोंकने की बारी थी..."लेकिन क्यों? ये तो बहुत बड़ा प्राइज़ है .. लगभग...शायद..." , "पांच करोड़ का ..." , " हाँ हाँ ... पांच करोड़... और आंटी ने इसे लेने से मना कर दिया? ... पर क्यों? " ... मैं प्रशांत के इस भोले प्रश्न पर मुस्कुराने के अलावा कुछ कह न सका सिवाय इसके की ..."बेटा वो ऐसी  ही हैं..." , गीता रसोई घर के अंदर से ही बोली "हाँ वो ऐसी ही है .. बहुत अजीब... उसे दुनिया की परवाह नहीं..." मैंने इस टिपण्णी पर  कोई जवाब नहीं दिया... और धीरे से बालकनी में आकार खड़ा हो गया .. सूरज अभी किनारे पर नहीं पहुंचा था... डूबने में  समय था... अभी भी गर्म तेज़ आग उगल रहा था... मैं साम्या के बारे में नहीं सोचना चाहता था फिर भी उसका चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता... उस दिन रेस्टोरेंट में हमारी आखरी मुलाक़ात थी ... जब वो मुझे अकेला छोड़ कर जा रही थी मैं समझ गया था वो मुझे प्यार नहीं करती  ... वो कभी किसी को प्यार नहीं कर सकती थी... या शायद कुछ और था जो मैं समझ नहीं पाया... उसका दर्द... उसका दर्द मेरे समझ से परे था... अचानक मुझे सब धुंधला दिखाई देने लगा... मेरी आँखों में आंसू थे... मैं खुद को रोक नहीं पाया... मैंने मन ही मन इश्वर से उसके सुख की कामना की... इश्वर से प्रार्थना करने के बाद मुझे बहुत अजीब शान्ति महसूस हुई ...ऐसा लगा  जैसे सच में कोई मुझे सुन था ...

मैंने अगले दिन का पेपर उठाया तो देखा  की साम्या अब इस दुनिया में नहीं रही...एक क्षण के लिए अचानक से  मन विचलित हो गया  था... पर पुरे दिन अजीब सी शान्ति ने मुझे आ घेरा... मुझे पूरा यकीन है...उस दिन सच में इश्वर ने मेरी प्रार्थना सुन ली थी...

आज भी अक्सर साम्या का हँसता हुआ चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता है... और फिर मुह से अनजाने में निकल जाता है...पगली लड़की !

सपने

दूर पहाड़ी से उगता हुआ सूरज
खिलती धूप
और उसकी चमक से
रौशन होता वो लकडियो वाला घर
आस-पास हरियाली
और नीचे बहती हुई वो सुरीली नदी...

सपने कितने रंगीन होते हैं न ,
और शायद अंधे भी
जिन्हें बीच में फैलती  खाई नहीं दिखती
पीले झड़ते पत्ते
और सूखती नदी नहीं दिखती...

Wednesday, December 29, 2010

याद

बहुत  दिनों  बाद
वे मुझे  फिर याद   आई
जिन्हें  मैंने  तीन  अप्रेल  कि शाम  को 
पहली  बार  उसी रेस्टोरेंट में देखा  था 
और  उसके  बाद  शायद  एक  या  दो  बार  और देखा हो  
एक  सुंदर  कांच  के  महल  में  कैद 
वो  एक  सुनहरी  और  एक  चमकीली  मछली .

एक  बक्से  में  बंद 
बिना  गुनाह  के  सजा  झेलती 
उपर  से  नीचे 
नीचे  से  उपर चक्कर काटती  
बक्से  से  निकलने  को  बैचेन  मन ...

मैं  बहुत  दूर  बैठी  उन्हें  ताकती  
और  कुछ   सोच  न  पाने  कि  स्तिथि  में  थी 
कोई  चीज़  थी  हमारे  बीच 
एक सी   
ज़िन्दगी  में  कैद  फिर   भी 
ज़िन्दगी  से  दूर 
ये  तड़प  थी  
बन्धनों  की  . 

उन मछलियों   की  याद  
अभी  भी   ज़ेहन  में  किसी  
जिंदा  तस्वीर  कि  तरह "कैद" है.

Text selection Lock by Hindi Blog Tips