Friday, February 25, 2011

बहरूपिया

कभी कभी 
एक अजीब सा ख्याल 
मेरे सामने आ खड़ा होता है,
कि
मोहब्बत मुझे तुमसे है
या
उस बहरूपिये से
जो गैरहाजरी में तुम्हारी
तुमसे भी अच्छी भूमिका निभाता है...  

Thursday, February 24, 2011

सुनो!

रुखा सुखा जीवन
हुआ मरणासन्न मन.
सुनो! मुझे अपने शब्दों से एक बार फिर सींचो,
प्रेम का पानी ,
डांट की खाद,
और धुप का मार्गदर्शन दो ,
मुझे अपनी कल कल बहती हंसी से 
एक बार फिर सींचो.
सुनो! मुझे अपने शब्दों से एक बार फिर सींचो. 

Wednesday, February 23, 2011

सुगंध का संसार

दो फूल खिले 
भिन्न भिन्न क्यारियों में
भिन्न रूप , भिन्न रंग , और
भिन्न जीवन जीने की तैयारियों में.

एक मंजिल 
और एक सोच
दोनों यूँ 
बन गए दोस्त.

पर था भिन्न पथ 
और भिन्न जीवन की शाखा
छा गयी ऐसे  
जीवन में निराशा.

फिर भी दोनों ने न खोया 
अपना होश,
संग सौ गुने विश्वास  के 
लगाया दुगुना जोश

एक दिन आया ऐसा,
उनकी महक हुई एकाकार,
रचाया फिर उन्होंने
भिन्न एक सुगंध  का संसार. 

Monday, February 21, 2011

एक प्रेम

एक प्रेम
जी रही हूँ मन ही  मन मैं 
उनके संग

एक प्रेम
जीना नहीं चाहती
जीवन भर
बस पल और अनगिनत पल
जी रही हूँ उसके संग

एक प्रेम
झूठ  है
प्रेम नहीं
बस कमी पूर्ति है
जीना पड़ रहा है
कुछ के संग...

एक प्रेम 
बचा लिया था
स्वयं के लिए
उसी के टुकड़े 
बाँट रही हूँ सभी को
जो बचा नहीं पाए
एक टुकड़ा स्वयं  के लिए...

Sunday, February 20, 2011

छोड़ कर गए हो तुम

छोड़ कर गए हो तुम , 
तुम ही , आओगे?
या फिर सोचूंगी  की 
बहा दिया दरिया में, 
राख , जो कुछ हुआ -
तन और  मन...

कोशिश करुँगी 
जी सकूँ पुनर्जन्म ,
क्यूंकि मरने के लिए
अब बचा नहीं है मुझमे कुछ. 


Friday, February 18, 2011

रसीदी टिकिट

खुशवंत सिंह जी ने एक बार अमृता से कहा , तुम्हारा प्रेम प्रसंग बस इतना ही है , यह तो एक स्टाम्प पर भी लिखा जा सकता है... बस अमृता जी को बात जम गयी और अपनी आत्मकथा का नाम उन्होंने रसीदी टिकिट ही रख दिया. ये बात हमें हमारे प्रोफेसर ने एक दिन पढ़ते वक़्त किसी प्रसंग के सन्दर्भ में बतायी थी. मैं सोचती रही की इसे बिना कन्फर्म किये यहाँ कैसे लिखूं और आज इत्तेफाक ऐसा हुआ की दैनिक भास्कर में खुशवंत जी का रसीदी टिकिट के उपर एक छोटा सा लेख आया जिससे  मुझे रसीदी टिकिट के नाम का रहस्य बताने का मौका  मिल गया. 

अमृता प्रीतम को आज से पहले कभी नहीं पढ़ा था. हाँ कई बार नाम जरुर सुना था , तब सोचती थी की पता नहीं कैसा लिखती होंगी.  एक इंग्लिश के प्रोफेसर ने कभी पढ़ाते पढ़ाते आदतन इसे (रसीदी टिकेट) अच्छी पुस्तक जान कर हमें सुझाया की हम भी पढ़ें. एक पुस्क्तक मेले में ये हाथ आई तो खरीद ही ली. आज जब इसका एक एक पृष्ठ  पलट रही हूँ तो लग रहा है की सच में यह एक आत्म-कथा है. या की अमृता के शब्दों में आत्मा की कथा. अमृता ने इसी विचार को मन में रख कर पुस्तक का काया-कल्प किया होगा. आत्मा पर जब गैर जरुरी नाम , घटनाएं, शक्लों का बोझ  नहीं तो फिर आत्मा की कथा पर भला  क्यूँ? ...सामान्य  आत्मकथाओं से बिलकुल अलग इसका रूप और रूह है...

रसीदी टिकेट अमृता के सपने , हकीकत , दुःख-सुख की परछाई , प्रेम के फूल , और एहसासों की झील है . भुला-भटका यात्री इसमें झाँक कर देखे तो शायद उसे अपने एहसासों का अक्स भी इसमें नज़र आ जाये. 

मैं तो इस झील में अपना बहुत कुछ छोड़ आई हूँ और बदले में  कोई मुझसे पूछे की मैंने क्या पाया है , तो मैं कहूँगी , एक नाम -  "इमरोज़". इमरोज़ फारसी शब्द है , जिसका अर्थ है , "आज" , बीते कल और आने वाले कल से मुक्त. अमृता के जीवनसाथी इन्द्रजीत ने अपना नाम बदल कर इमरोज़ रख लिया था. खैर! अमृता को धन्यवाद देना चाहूंगी , उन्होंने मुझे विश्वास की डोर से बाँध दिया - विश्वास जो मैं खो चुकी थी की साहिर और इमरोज़ जैसे प्यार करने वाले लोग भी  इस दुनिया में होते हैं. अमृता आपको भी विश्वास की डोर से बाँध सकती है अगर आप सपनो के सच होने में या चमत्कारों में विश्वास नहीं रखते. और अगर आप काँटों के रास्ते से गुज़र रहे हैं तो अमृता आपसे कहेंगी - फूलों के बाग़ दूर नहीं , सफ़र अभी ख़त्म नहीं हुआ है.

बहुत छोटी सी पुस्तक है और ज्यादा महंगी भी नहीं है. थोड़ी आत्म-कथा जैसी है थोड़ी पारी कथा जैसी. 
अमृता को पढने का सफ़र बहुत अच्छी  पुस्तक से शुरू हुआ... आशा करती हूँ ये खूबसूरत वादियों से होकर चलता ही  रहे... 

Sunday, February 13, 2011

...

बहुत दिनों बाद हिंदी की कोई बेहतरीन पुस्तक हाथ आई. पर इसे मैंने एक बार में नहीं पढ़ लिया ... धीरे-धीरे एक-एक अक्षर पि कर और घटनाएं जी कर लगभग  दो -तीन दिन में समाप्त की. पुस्तक थी - रसीदी टिकिट , अमृता प्रीतम की आत्मकथा. मैंने कई बार यह दुविधा व्यक्त की है की जब मैं अंग्रेजी पढ़ती हूँ तो मन और जिबान अंग्रेजी हो जाते हैं और जब हिंदी पढ़ती हूँ तो हिंदी. पर यह पुस्तक इस सबसे  से ऊपर थी. अमृता जी के ही भावों में - दर्द का कोई नाम या शक्ल नहीं होती. चाहे उसकी व्याख्या अंग्रेजी में हो या हिंदी में , वो सच्चा हो तो आत्मा के भीतर उतर जाता है...

यूँ ही मन को बहला रही हूँ की , कभी कुछ बन पायी की आत्मकथा लिख सकूँ तो इस बात का ज़िक्र जरुर करुँगी की रसीदी टिकिट का मेरे मन के उपर क्या प्रभाव पड़ा. और अगर नहीं तो , खैर ! उसकी कल्पना में वक्त जाया नहीं करना चाहती. 
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