Friday, March 29, 2013

समर्पण की कसौटी

एक ही बात रह रह कर मन में आती है , तू उनकी होने वाली है। मनसा होना एक बात है, कर्म से, रीती से बंधन में बंध  जाना दूसरी। क्या उनको पति रूप में पाने के लिए तैयार हूँ? सारे भाव उनको समर्पित करने को तैयार हूँ? क्या ये बड़ी बात है ? नहीं तो , क्या ये इतनी छोटी सी  बात है? क्या यह सच में होना है ? नहीं भी होना , तो मन अभी से इतने भावों से घिरा क्यूँ है? क्यूँ लगता है की , वो यहीं हैं , मेरी इस बचकानी सी बैचैनी पर मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं। सच कहूँ तो लगता है ये समर्पण की कसौटी है। मैंने बंधन-मुक्त होने का भरसक प्रयास किया। रिश्तों को नाम देने से कतराती रही। तो शायद ये गुस्साए होंगे, बोले होंगे , थोडा बंधन का रस उन्हें भी दिया जाये। तभी से मुझे बंधन में बांधना शुरू किया। खुद ही कभी भैय्या बन कर आते , कभी बहन , कभी सहेली , कभी माँ की ममता के बंधन से बाँध लेते ... मैं बंधन से छूटने को छटपटाती भी , और बंधन से मुग्ध भी हो जाती ... ऐसा  बंधन भी कितना काम्य है ...

लेकिन समर्पण ! समर्पण आसान नहीं ...  विद्यानिवास मिश्र जी कहते हैं ,

" ज्ञान , प्रकाश , अच्छाई तो हर एक दे सकता है और बड़े सच्चे भाव से दे सकता है , पर अपना मोह, अपना अन्धकार और अपनी भीतर की बुराई देने का साहस नहीं होता , प्रिय से भी कुछ चीजों का दुराव रह ही जाता है।  .... पर अपने को बिलकुल पराया मानकर और उनको अपना मानकर जब दिया जाएगा तो फिर उससे दुराव नहीं रह पायेगा , दुराव तो उससे होता है जिसके लिए एकदम अपनी होने का अभिमान हो , जिसके लिए पराई हैं उससे क्या छिपाना , वह हमारा भीतर बाहर सब देख सकता है ; क्यूंकि भीतर तो वही वही है , बाहर कोई भी हो तो उसी के रंग में सराबोर होकर है। "

अपना सब उनको दे देना , सुख भी उन्ही का, दुःख भी उन्हें समर्पित , पाप हुआ तब भी , पूण्य  भी उन्हें समर्पित, क्षमा मांगनी हो तो उनसे, क्षमा करना हो तो उनको समर्पित, जीवन से जुड़े अनसुलझे प्रश्न और उनसे मिले उत्तर भी उन्हें ही समर्पित ... जीवन का कोई भी पक्ष मन का कोई भी भाव उनसे अछूता न रह जाए ... सब कहीं वो ही वो हो ... गर तुम्हे लगता है ये सपना है , हकीकत नहीं , तो मैं कहूँगी हकीकत का बनना तुमने अब तक नहीं जाना , उन  सपनो , और खुली आँखों से देखे हुए सपनो ; जिनमे हृदय की गहन अनुभूति का प्रकाश हो , से ही हकीकत बनती है।


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राधा भेली मधाई

"... अनुखन माधव - माधव रटते रटते राधा माधव हो गयी और माधव के रूप में अपने को स्थापित करते ही बैचैनी कम होने के बजाये और बढ़ गयी , बैचैनी राधा के लिए , जो अब वह नहीं रही और फिर माधव बनी राधा  राधा बनकर माधव को सांत्वना का सन्देश भेजती है , सन्देश पहुंचा नहीं की विह्वल होकर पुनः माधव बन जाती है और एक ही विजड़ित चित्त के दो पात चिर जाते हैं : एक राधा दूसरा माधव , दोनों और आग पकड़ चुकी है, बीच में प्राण एक कीड़े की तरह फंसा हुआ अकुला रहा है .... " ( राधा माधव हो गयी ; विद्यानिवास मिश्र  )

एक बात बताओ , रुकमनी को तो पत्नी होने का गौरव मिला था, फिर भी युगों युगों से माधव  के साथ राधा ही क्यूँ प्रतिष्ठित है ? क्या विरह का स्थान इतना श्रेष्ठ है? राधा माधव कौन हैं? इश्वर? आद्यशक्ति और नारायण ? प्रेमी प्रेमिका ? या भारतीय गूढ़ चिंतन के कोई प्रतीक ?

मेरा मन कहता है मिश्र जी आधुनिक युग के प्रकांड पंडित एवम सांस्कृतिक चिन्तक हैं, भावों से ओत-प्रोत भाषा में इन्होने भी लिखा है, लेकिन जब राधा-माधव को "जैसे वो हैं " वैसे  समझने की बात आती है, तब  शायद सूर से अधिक सफल कोई न हो सका। सूर जन्मांध हैं , लेकिन कृष्ण की जो मूरत वो देख सके हैं, राधा का जो विरह उन्होंने महसूस किया है, गोपियों का अनन्य प्रेम जो सूर ने चित्रित किया है, अन्य  कहीं दुर्लभ है।

"राधा माधव, भेंट भई।
राधा माधव , माधव राधा, कीट भ्रंग गति ह्वये जू गयी।।
माधव राधा के रंग रांचे, राधा माधव रंग रइ।
माधव राधा प्रीती निरंतर , रसना करी सो कही न गयी।।
बिहँसी कह्वो हम तुम नहीं अंतर , यह कहिंके उन ब्रिज पठई।
सूरदास प्रभु राधा माधव, ब्रिज बिहार नित नयी नयी ।। "

सूरदास जी कहते हैं की, भृंगी नाम का एक कीड़ा होता है , जो किसी कीड़े पर गुंजार करके उसे अपने ही रूप में परिवर्तित कर देता है। राधा माधव की भी ऐसी ही गति हुई है. माधव राधा के रंग में रंग गए और राधा माधव के रंग में। माधव राधा की प्रीती इतनी प्रकृष्ट और दिव्य है की कोई कवि  उसको वाणी के द्वारा व्यक्त नहीं कर सकता। राधिका कृष्ण की लीलाएं नित्य है. उनमे नित्य नवीनता आती रहती है।


कुछ समय पहले जब कृष्ण का आलोक जीवन में आया तभी, उसी क्षण दुनिया झूठी लगने लगी, लोगों की बाते झूठी लगने लगी ... जितना कृष्ण की और मन झुकता , माया उतना ही मन को बाहर की और खींच के ले आती ... एक पागलपन सवार होने को होता, मीरा की तरह सब भूल के कृष्णमय हो जाने का  मन होता ... लेकिन फिर दुनियादारी ... बैचैनी पैदा होती की लोगों की नज़रे ठन्डे छींटे डाल  देती ... बहुत समय पहले एक अजीब-सी उदासी छा  गयी थी , विरक्ति का भाव , सब कुछ होते हुए भी कुछ न होने का भाव    ... हमेशा मन खोया सा रहता ...  अब इसी उदासी पर एक नया रंग चढ़ा है ... प्रेम का उत्साह भी है विरह की व्यथा भी ... जिसने कभी रंच मात्र भी ये विरह , ये अनूठा प्रेम महसूस नहीं किया उसकी शुष्क बुद्धिवादी चेतना पर तरस आता है , ज्ञान की पोथी, विज्ञान के आविष्कार, सभ्यता की उन्नति सब कुछ कितना फीका है उस परमानन्द के सामने ... लोग जब बड़ी बड़ी बाते करते हैं तो हंसी आती है , कोई चोर मन में कहता है , ये सब तेरे ही माधव की तो लीला है , जो भटके हुए हैं उन्हें कौन समझाए ...

फिर मिश्र जी की बात याद आती है , "मन कितना बंटा  हुआ है , मनचाही और अनचाही चीजों  में" .

"माधव तुम्हारे कब से हुए, बता सखी ?"
"जब से मैं उनकी हो गयी, राधा ।"

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