Sunday, March 1, 2015

राष्ट्रीय संगोष्ठी - स्री विमर्श और मैत्रयी पुष्पा


हाल ही में मैंने अकादमिक जगत में प्रवेश किया है, एक पी. एच. डी. स्कॉलर के रूप में । पिछले एक साल में मैंने दो सेमिनार   में भाग लिया - जिनके अनुभव अविस्मरणीय रहे।  कल ही मैं मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी - स्री विमर्श : साहित्य , मीडिया और समाज में भाग लेकर लौटी हूँ।

एक साहित्य विद्यार्थी और साहित्य प्रेमी के लिए अत्यधिक आनंद, गर्व और सौभाग्य का विषय होता है एक अच्छे साहित्यकार को सुन पाना। हमारे लिए ये साहित्यकार किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं होते।  कल की इस संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में परम सम्मानीय मैत्रयी पुष्पा जी पधारी थीं।  साहित्य की इस महान हस्ती को पढ़ने का सुअवसर मुझे आज दिन तक प्राप्त नहीं हुआ किन्तु उन्हें सुनने के पश्चात मैं उनके बारे में लिखने से खुद को रोक नहीं पा रही। 
साभार - अमरउजाला


"30 नवंबर, 1944 को अलीगढ़ जिले के सिकुर्रा गांव में जन्मी मैत्रेयी के जीवन का आरंभिक भाग बुंदेलखण्ड में बीता। आरंभिक शिक्षा झांसी जिले के खिल्ली गांव में तथा एम.ए.(हिंदी साहित्य) बुंदेलखंड कालेज, झाँसी से किया। मैत्रेयी पुष्पा की प्रमुख साहित्यिक कृतियों में शामिल हैं स्मृति दंश, चाक, अल्माकबूतरी जैसे उपन्यास, कथा संग्रह चिन्हार और ललमनियाँ, कविता संग्रह- लकीरें। " ( "खुद को पत्नी मन ही नहीं कभी ", अमरीक सिंह दीप , www.nirantar.org)


" मैं लिख लेती हूँ लेकिन मुझे बोलना नहीं आता , बोलना लिखने से कहीं ज्यादा कठिन काम है।  " माइक पर आते ही सत्तर वर्ष की मध्यम कद काठी और गौर वर्ण की वह औरत कहती है कि मैं आप लोगों की तरह अकादमिक जगत से सम्बद्ध नहीं रखती मैं तो एक आम स्त्री हूँ।  यह औरत और कोई नहीं साहित्य की महान विभूति मैत्रयी पुष्पा जी हैं।  यह सच है कि पुष्पा जी भाषण नहीं देती,  सीधे साफ़ लफ़्ज़ों में अपने दिल की बात ही कहती हैं।

स्त्री-विमर्श स्त्रियों के छोटे कपडे पहनने , मेक-अप करने, लिव - इन में रहने आदि की चर्चा नहीं है , वास्तव में स्त्री- विमर्श सामाजिक और राजनैतिक हस्तक्षेप है , स्त्री के हक़ और अधिकारों की चर्चा है।  बीच - बीच में अपनी निजी अनुभूति और रहस्यों की चर्चा करते हुए मैत्रयी पुष्पा जी स्त्री- विमर्श के कई  महत्वपूर्ण मुद्दों को उठती हैं।

अगर मुझसे पुछा जाए की मुझे उनका वक्तव्य क्यों अच्छा लगा तो मैं कहूँगी कि स्त्री-विमर्श के मुद्दों की बात तो हर कोई कर सकता है उसमे कोई बड़ी बात नहीं लेकिन स्त्री के दिल की परतों को खोलने का काम बड़ा साहस का काम है । मैत्रयी जी के 3 कथनों ने इस सन्दर्भ में मुझे बेहद झकझोरा और एक चेतना प्रदान की -
पहला , प्रेमी को कभी पति नहीं बनाना चाहिए।  दूसरा , जो यह कहते हैं कि - हर पत्नी अपने पति की लम्बी उम्र की दुआ मांगती है - ग़लत कहते हैं।  जो पत्नियाँ  पति द्वारा प्रताड़ित हैं वो सोचती हैं कि - मर जाए तो खबर पड़े , इससे तो मैं विधवा भली।  और तीसरा ,   लोग कहते हैं स्त्री का चरित्र त्रिया चरित्र  होता है - यह गाली नहीं यह तो उसके चरित्र की विशेषता है - रणनीति है कि दो चाल चलकर एक चाल पीछे हो जाना ताकि ईगो वाले का ईगो संतुष्ट हो जाये , वह सोचे कि यह मान गयी लेकिन हम तो मानते ही नहीं जो करना है वह कर कर ही  रहते हैं।  यह बुरी बात नहीं है।

अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने सभी पुरुषों से एक आग्रह भी किया कि - वे माँ - बहिन की गालियाँ देना बंद कर दें क्योंकि ये भी एक स्त्री के साथ एक तरह का बलात्कार है - भाषा द्वारा बलात्कार , जिससे समाज दूषित होता है ।  मैं भी उनकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ और आशा करती हूँ पुरुष वर्ग इस बात को गंभीरता से लेगा।

बेबाकी , साफ़गोई और स्त्री के मनोविज्ञान को पकड़ लेना मैत्रेयी जी का ख़ास अंदाज़ था।  उन्हें सुनने के बाद मैं उनकी कायल हो गयी हूँ।  उन्होंने न केवल गाँव की स्त्रियों की परेशानी से रूबरू कराया बल्कि स्त्री - विमर्श के सच्चे मायने भी समझाए।

सेमीनार में एक तथ्य बेहद निराशाजनक था कि पुरुष भले ही स्त्री-विमर्श की संगोष्ठी में आयोजक, संयोजक , संरक्षक , अतिथि या अध्यक्ष के पद पर बैठा हो वह  अहम , पितृसत्ता के मूल्य , प्रतिरोध की भावना और स्त्री - विमर्श में खुद की जाति पर हो रहे हमलों से आत्मरक्षक रुख इख्तियार करना नहीं भूलता।  कई विद्वत्जन चर्चा में उटपटांग कथन कहने में भी नहीं झिझकते। विजय कुलश्रेष्ठ अपने वक्तव्य में कहते हैं कि " निर्भया काण्ड के वजह  भी स्त्री का यही सवाल है कि मैं कैसी दिखती हूँ?"     अगर यही कथन किसी राजनेता द्वारा कहा  जाता  तो मीडिया उसकी  धज्जियां उड़ाने में देर न करती , लेकिन ऐसी बड़ी अकादमिक चर्चाओं में सभी प्रबुद्ध जन समझकर भी खामोश रहते हैं आखिर क्यों ?


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