Tuesday, December 15, 2015

संघर्ष!

इस जीवन में
इस संसार में
जी रही हैं कितनी ज़िन्दगियाँ
मिट रही हैं कितनी बस्तियाँ

इस एक समय में
समानांतर
कितने इतिहास रहे बन
संघर्ष! संघर्ष! संघर्ष !
हर आदमी की अपनी एक लड़ाई

कितने विलग अलग-थलग
हो गए हैं हम
की नहीं नाता रहा एक के दर्द का
दूसरे के मर्ज़  से

मैं स्त्री हूँ
वह दलित
और
तीसरा आदिवासी
हम सिर्फ पाठ्यक्रम के अंश हैं
विमर्श के असंख्य प्रश्न हैं
और
बस विस्मित आँखें
पूछती एक ही प्रश्न,
"क्या अब भी कुछ शेष है घटने को
मानवता का क़त्ल बार बार होने को।  "

(आदिवासी विमर्श पढ़ते हुए)




Sunday, November 22, 2015

रैक्व और जबाला



रिक्व ऋषि के पुत्र महान तपस्वी रैक्व अपने जीवन में किसी स्त्री से  नहीं मिले थे।  उन्हें ज्ञान ही नहीं था की स्त्री पदार्थ कैसा दीखता है  और उससे कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए।  आंधी तूफ़ान की कृपास्वरूप उनकी भेंट होती है राजा  जानश्रुति की एकमात्र सुंदरी कन्या जबाला से।  जबाला को देखकर वे उसे देवपुरुष समझते हैं क्यूंकि देवपुरुष का ही चेहरा इतना दिव्य, चिकना, बाल रेशम की तरह मुलायम और आँखे मृग की तरह हो सकती हैं। किन्तु जबाला उन्हें बताती हैंकि वे स्त्री हैं और रिक्व को उनसे लोक- सम्मत व्यवहार करना चाहिए।
रैक्व जबाला से मोहित हो जाते हैं और जबाला के जाने के पश्चात हमेशा के लिए उनकी पीठ में सनसनाहट रह जाती है। यह कहानी है हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास "अनामदास का पोथा " की। जिसमें कि सिर्फ रैक्व ऋषि का प्रसंग ही उपनिषद में प्राप्त ही बाकी पूरी कथा लेखक की कल्पना का चमत्कार है।

दरअसल , कहानी में  रैक्व की पीठ में सनसनाहट एक अजीब रहस्य है।  जो मुझे तब समझ आया जब मैं पति से दूर मायके आई और २ दिन के बाद पति की गर्दन में मोच आ गयी।  पति कहने लगे आ रही हो घर ? मैंने कहा , नहीं।  तो वे झल्लाकर बोले , पता है कितनी परेशानी में हूँ मैं।  कुछ देर बाद मुझे समझ आया , कहीं रैक्व की भी कुछ ऐसी ही परेशानी तो नहीं थी।  जबाला को पाने की अभिलाषा ही उनके पीठ  की सनसनाहट का मूल था।  अक्सर शारीरिक पीड़ा के मूल में मनोवैज्ञानिक कारण छिपे होते हैं।


 ख़ैर , मैं तो ससुराल आ गयी हूँ।  रैक्व और मेरे पति की पीड़ा का रहस्य भी समझ आ गया।  किन्तु एक बात अभी भी मेरे मन में घूम रही है , वह यह कि ,हज़ारी प्रसाद द्विवेदी की विचारधारा तो पकड़ में आ जाती है किन्तु उनकी शैली गज़ब की है।  जिस प्रकार से कल्पना में वास्तविकता का पुट  डालते हैं , उनके सरिका लेखक पूरी दुनिया में मिलना मुश्किल है।  यह निश्चय ही एक शोध का विषय है। द्विवेदी जी के अन्य  उपन्यासों की तरह ही यह भी अत्यंत गूढ़ ,प्रेरणादायक और मनोरंजक है।  आखिर, रैक्व में द्विवेदी जी की ही झलक तो दिखती  है।

Tuesday, October 27, 2015

खामोशियाँ आवाज़ हैं , इन्हे सुनने तो आओ कभी

यहाँ मैं एस जे बन कर नहीं लिख रही , न ही ऐंजल या जेनी बन कर।  यहाँ मैं , मैं हूँ अपने असली नाम के पीछे भी छिपी असली मैं।  मैं जानती हूँ , यहाँ तुम मुझे नहीं पढोगे न ही वो।  मेरा उससे ज़िन्दगी भर का रिश्ता है।  पिछले जन्म में भी कुछ ऐसा ही करीबी रिश्ता रहा होगा।  पर अक्सर सोचती हूँ तुमसे पिछले जन्म का ऐसा क्या रिश्ता है की , इस जन्म है भी और नहीं भी।  होकर  भी नहीं है और नहीं होकर भी है।

डायरी में पुरानी लिखी कुछ लघु कहानियाँ पढ़ रही थी।  जो दरअसल कहानियाँ न होकर हमारे बीच घटे भावनात्मक किस्से ही थे।  कहानी एक बहुत खूबसूरत कला है सच।  सच ! मैंने इस कला में अपनी बेहद दिली यादें संभाल राखी हैं, जिन्हे मेरे अलावा कोई अनकोड नहीं कर सकता।  मेरे और सिर्फ तुम्हारे सिवा।

एक बात कहूँ।  मेरे लिखने के इंस्पिरेशन भी तुम हो और यह चाहत कि  शायद कभी तुम मुझे पढ़ो , और.… बस ऐसे ही खामोश रहो।


Tuesday, August 25, 2015

बस यादें !

वक़्त नहीं है खुद के लिए भी
जाने , वो भी इसी हालत में होंगे
सोचते होंगे मेरी ही तरह
फिर कभी फुर्सत में मिलेंगे ,
फिर कभी फुर्सत में मिलेंगे।

चंद यादें भी अब याद आने से नहीं आती हैं
दिख जाए उनका नाम कहीं ,
तब  ज़िंदगी पुरानी  याद आती है।




Thursday, July 30, 2015

सच

प्यार से लिखे नामों को बारिशें मिटा देती हैं 
सपनों के नन्हें पौधों को तूफ़ान उड़ा देते हैं 
जो सच समझते हैं हम 
जिसे लेकर ओढ़े रहते हैं 
 वो महज़ एक कागज़ होता है 
पूरी किताब का -
सार नहीं !
हर दिन का ,
हर क्षण का अपना एक सच होता है
और ज़िंदगी भी 
एक पल , एक दिन में ही जी जाती है।   

Sunday, March 1, 2015

राष्ट्रीय संगोष्ठी - स्री विमर्श और मैत्रयी पुष्पा


हाल ही में मैंने अकादमिक जगत में प्रवेश किया है, एक पी. एच. डी. स्कॉलर के रूप में । पिछले एक साल में मैंने दो सेमिनार   में भाग लिया - जिनके अनुभव अविस्मरणीय रहे।  कल ही मैं मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी - स्री विमर्श : साहित्य , मीडिया और समाज में भाग लेकर लौटी हूँ।

एक साहित्य विद्यार्थी और साहित्य प्रेमी के लिए अत्यधिक आनंद, गर्व और सौभाग्य का विषय होता है एक अच्छे साहित्यकार को सुन पाना। हमारे लिए ये साहित्यकार किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं होते।  कल की इस संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में परम सम्मानीय मैत्रयी पुष्पा जी पधारी थीं।  साहित्य की इस महान हस्ती को पढ़ने का सुअवसर मुझे आज दिन तक प्राप्त नहीं हुआ किन्तु उन्हें सुनने के पश्चात मैं उनके बारे में लिखने से खुद को रोक नहीं पा रही। 
साभार - अमरउजाला


"30 नवंबर, 1944 को अलीगढ़ जिले के सिकुर्रा गांव में जन्मी मैत्रेयी के जीवन का आरंभिक भाग बुंदेलखण्ड में बीता। आरंभिक शिक्षा झांसी जिले के खिल्ली गांव में तथा एम.ए.(हिंदी साहित्य) बुंदेलखंड कालेज, झाँसी से किया। मैत्रेयी पुष्पा की प्रमुख साहित्यिक कृतियों में शामिल हैं स्मृति दंश, चाक, अल्माकबूतरी जैसे उपन्यास, कथा संग्रह चिन्हार और ललमनियाँ, कविता संग्रह- लकीरें। " ( "खुद को पत्नी मन ही नहीं कभी ", अमरीक सिंह दीप , www.nirantar.org)


" मैं लिख लेती हूँ लेकिन मुझे बोलना नहीं आता , बोलना लिखने से कहीं ज्यादा कठिन काम है।  " माइक पर आते ही सत्तर वर्ष की मध्यम कद काठी और गौर वर्ण की वह औरत कहती है कि मैं आप लोगों की तरह अकादमिक जगत से सम्बद्ध नहीं रखती मैं तो एक आम स्त्री हूँ।  यह औरत और कोई नहीं साहित्य की महान विभूति मैत्रयी पुष्पा जी हैं।  यह सच है कि पुष्पा जी भाषण नहीं देती,  सीधे साफ़ लफ़्ज़ों में अपने दिल की बात ही कहती हैं।

स्त्री-विमर्श स्त्रियों के छोटे कपडे पहनने , मेक-अप करने, लिव - इन में रहने आदि की चर्चा नहीं है , वास्तव में स्त्री- विमर्श सामाजिक और राजनैतिक हस्तक्षेप है , स्त्री के हक़ और अधिकारों की चर्चा है।  बीच - बीच में अपनी निजी अनुभूति और रहस्यों की चर्चा करते हुए मैत्रयी पुष्पा जी स्त्री- विमर्श के कई  महत्वपूर्ण मुद्दों को उठती हैं।

अगर मुझसे पुछा जाए की मुझे उनका वक्तव्य क्यों अच्छा लगा तो मैं कहूँगी कि स्त्री-विमर्श के मुद्दों की बात तो हर कोई कर सकता है उसमे कोई बड़ी बात नहीं लेकिन स्त्री के दिल की परतों को खोलने का काम बड़ा साहस का काम है । मैत्रयी जी के 3 कथनों ने इस सन्दर्भ में मुझे बेहद झकझोरा और एक चेतना प्रदान की -
पहला , प्रेमी को कभी पति नहीं बनाना चाहिए।  दूसरा , जो यह कहते हैं कि - हर पत्नी अपने पति की लम्बी उम्र की दुआ मांगती है - ग़लत कहते हैं।  जो पत्नियाँ  पति द्वारा प्रताड़ित हैं वो सोचती हैं कि - मर जाए तो खबर पड़े , इससे तो मैं विधवा भली।  और तीसरा ,   लोग कहते हैं स्त्री का चरित्र त्रिया चरित्र  होता है - यह गाली नहीं यह तो उसके चरित्र की विशेषता है - रणनीति है कि दो चाल चलकर एक चाल पीछे हो जाना ताकि ईगो वाले का ईगो संतुष्ट हो जाये , वह सोचे कि यह मान गयी लेकिन हम तो मानते ही नहीं जो करना है वह कर कर ही  रहते हैं।  यह बुरी बात नहीं है।

अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने सभी पुरुषों से एक आग्रह भी किया कि - वे माँ - बहिन की गालियाँ देना बंद कर दें क्योंकि ये भी एक स्त्री के साथ एक तरह का बलात्कार है - भाषा द्वारा बलात्कार , जिससे समाज दूषित होता है ।  मैं भी उनकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ और आशा करती हूँ पुरुष वर्ग इस बात को गंभीरता से लेगा।

बेबाकी , साफ़गोई और स्त्री के मनोविज्ञान को पकड़ लेना मैत्रेयी जी का ख़ास अंदाज़ था।  उन्हें सुनने के बाद मैं उनकी कायल हो गयी हूँ।  उन्होंने न केवल गाँव की स्त्रियों की परेशानी से रूबरू कराया बल्कि स्त्री - विमर्श के सच्चे मायने भी समझाए।

सेमीनार में एक तथ्य बेहद निराशाजनक था कि पुरुष भले ही स्त्री-विमर्श की संगोष्ठी में आयोजक, संयोजक , संरक्षक , अतिथि या अध्यक्ष के पद पर बैठा हो वह  अहम , पितृसत्ता के मूल्य , प्रतिरोध की भावना और स्त्री - विमर्श में खुद की जाति पर हो रहे हमलों से आत्मरक्षक रुख इख्तियार करना नहीं भूलता।  कई विद्वत्जन चर्चा में उटपटांग कथन कहने में भी नहीं झिझकते। विजय कुलश्रेष्ठ अपने वक्तव्य में कहते हैं कि " निर्भया काण्ड के वजह  भी स्त्री का यही सवाल है कि मैं कैसी दिखती हूँ?"     अगर यही कथन किसी राजनेता द्वारा कहा  जाता  तो मीडिया उसकी  धज्जियां उड़ाने में देर न करती , लेकिन ऐसी बड़ी अकादमिक चर्चाओं में सभी प्रबुद्ध जन समझकर भी खामोश रहते हैं आखिर क्यों ?


Thursday, January 8, 2015

अन्या से अनन्या


प्रभा जी का सिर्फ एक उपन्यास पढ़ा था और लगा की इनकी आवाज़ मेरी आवाज़ से मिलती  है।  वो भी मारवाड़ी समाज , रीति -रिवाज़ों , और महिलाओं की स्थिति के बारे में लिखतीं हैं और मैं भी संस्कृति और महिलाओं के बारे में विचार करती हूँ। इन पर पी.एच डी करने में तो मज़ा आएगा। लेकिन प्रभा खेतान जी की आत्मकथा (अन्या से अनन्या ) पढ़कर  बेहद झटका लगा।  एक ऐसी छवि के साथ मेरा नाम हमेशा  लिए जुड़ जायेगा मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।


 ऐसा सुना था कि  प्रभा खेतान की आत्मकथा बहुत बोल्ड है।  लेकिन उनकी आत्मकथा पढ़ कर मुझे कहीं भी ये नहीं लगा कि 'कुछ ज्यादा' कहा  गया है बल्कि यही लगा कि 'ज्यादा को सीमित  ' करके कहा गया है।

मैं जिन पर शोध करने जा रही हूँ वह एक ऐसी महिला हैं जिनका व्यक्तिगत जीवन उहापोह और लीक से हटकर रहा है।  मारवाड़ी समाज की यह महिला बंगाल में न केवल उच्च शिक्षा प्राप्त करती हैं बल्कि विवाह संस्था को ठुकरा कर अपने से 18 वर्ष बड़े विवाहित और पांच बच्चों के पिता से प्रेम कर बैठती हैं।   ज़िन्दगी उन्हें समर्पित कर  देती हैं।  चूँकि वह उस व्यक्ति पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं रहना चाहती इसीलिए वह पहले एक हेल्थ क्लब खोलती हैं तथा फिर चमड़े की वस्तुओं के निर्यात का व्यवसाय करती हैं।  आजीवन ' दूसरी औरत ' का ठप्पा न केवल इन्हे घोर मानसिक कष्ट देता है बल्कि इनके आत्मविश्वास को भी झकझोरता रहता है।

आत्मकथा लिखना हर किसी के लिए अलग मायने रखता है।  मेरे ख्याल में इनके लिए आत्मकथा लिखना एक कथार्सिस था।  बेहद जरुरी क्यूंकि दुनिया ने इन्हे जो कुछ भी समझा लेकिन  ठीक नहीं समझा, और  आत्मकथा तो खुद ही को समझने की और स्वयं का विश्लेषण करने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।  प्रभा जी की आत्मकथा में कहीं भी कुछ भी गैरजरूरी नहीं है। 

आत्मकथा की पृष्ठभूमि में मारवाड़ी संस्कृति के साथ साथ बंगाल का बदलता राजनैतिक परिवेश, आर्थिक संकट , आपातकालीन भारत , विश्वयुद्ध , शीतयुद्ध ,नक्सलबाड़ी काण्ड आदि सभी कुछ है।  पढ़कर लगता है इससे पहले कलकत्ता और बंगाल को कभी नज़दीक से देखा ही नहीं।



 मेरे यह कहने का मतलब कि  ,"एक ऐसी छवि के साथ मेरा नाम हमेशा  लिए जुड़ जायेगा मैंने सपने में भी नहीं सोचा था" यह है कि मैंने अपनी ज़िन्दगी में सोचा था कि मैं एक बोल्ड जीवन जियुंगी , पारम्परिक समाज को ठुकरा कर अपने मूल्यों पर ज़िन्दगी जीयूँगी। लेकिन मैं तो उसी पितृसत्तात्मक समाज का एक अंग बनकर रह गयी हूँ। प्रभा जी एक आत्मनिर्भर महिला थी और मैं ? मेरा नाम इनके साथ जुड़ जायेगा लेकिन क्या मैं प्रभा की आत्मशक्ति को जी पाऊँगी - आत्मविश्वासी , आत्मनिर्भर , हर चुनौती को स्वीकार करने वाली , हर समस्या से जूझने वाली और अंत में स्वयं को जैसे भी हो स्वीकार करने वाली।

 मुझे बेहद ख़ुशी और रोमांच है कि मेरा नाम इनसे जुड़ेगा।  

Monday, January 5, 2015

इल्ज़ाम

इल्ज़ाम 

"तू गन्दी है, गन्दी है, बहुत गन्दी है। " बड़ी चिल्ला रही थी।
"मैं ? मैंने क्या किया ? " छोटी ने सहम कर पुछा।
"तूने मुझे धोखा दिया है धोखा। "बड़ी ने गुस्से में तमतमा कर कहा।
छोटी ने आश्चर्य में पुछा , "कैसा धोखा ?"
"तूने मेरी बात अपनी सहेली को बता दी।  "
"पर  .... इसमें धोखे वाली क्या बात है वो बात तो  … "
"मेरी बात क्यों बताई ? तुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था।  "
 …
कुछ गलतियां बार बार हो जाती हैं और कुछ इल्ज़ाम ज़िन्दगी भर के लिए माथे पर छप जाते हैं।  छोटी के साथ ऐसा ही हुआ।  बड़ी ने एक न सुनी।  उसने बस इतना भर कहना चाहा था कि  - दुनिया  में कोई बात किसी से नहीं छिपती और  इतना ही था तो तुम मुझे भी नहीं बताती।  छिपाने का इतना आग्रह क्यों ? जो तुम हो उसे स्वीकार कर लो।  तुम स्वीकार क्यों नहीं करती ?

लेकिन बड़ी जा चुकी थी अपनी दुनिया में जहाँ हर सवाल हर जवाब से दूर वह अपनी ही सोच में सुरक्षित रह सके।

via: Google images
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