Wednesday, December 30, 2009

औरत


घर की कई मुर्दा मशीनों के बीच ,

एक मशीन जीवित सी है,

दुनिया की नज़रों में,

औरत एक मशीन सी है।

... आज की एक त्रिवेणी....

आज भी वह पुरानी बुरी आदत नहीं बदली,
आज भी में उसके कारन बदनाम हूँ,

न जाने कितने वादे भुलाये , न जाने कितने दिल तोड़े।

कुछ पंक्तियाँ ....

अब उसे समझाने की कोशिश नहीं करती ,
खुद को समझा लेती हूँ,
आज कल में सभी आरोप सह लेती हूँ
पहले भी सह लेती थी पर आंसुओ के साथ
आज कल तो ज़हर भी मुस्कुरा के पी लेती हूँ

अब उसे समझाने की कोशिश नहीं करती
खुद को समझा लेती हूँ .....

......

वो कभी कभी मुझे कॉल करती थी,
सुनाने के लिए अपनी खामोशी,
ऐसा नहीं है की वह कुछ नहीं कहती थी,
बल्कि बहुत कुछ कह जाती थी
बिना शब्दों के भी ,
काल करती थी की रो सके
अपना दिल हल्का कर सके,
सोच सके की में उसके करीब ही हूँ,
और वह सच में रोती थी,
मुझे बिना बताये,
फ़ोन को कहीं ,
अपने आँचल में छिपाए,
फिर कहती थी बस इतना ही -
"अपना ख्याल रखना"
और झट से फ़ोन रख देती ।
में पूछ भी नहीं पाटा था -
"तुम ठीक तो हो न"

Saturday, December 12, 2009

रात गहरा रही है....

रात गहरा रही है ...
दिल डूब रहा है फिर से,
आज इस गहराई में ।

आओ फिर से मोती तलाशें
मिलकर करें उस तारे से बातें
आज न कहना जल्दी जाना होगा
मिलन की कई रस्मे हैं बाकी।

रात गहरा रही है...
दिल डूब रहा है फिर से,
आज इस गहराई में।

वो चांदी की थाली सा दिखा
आज चाँद भी रूठा मुझसे रुसवा हुआ
तुम न रूठना बस गले लग जाना
रात अँधेरी अभी और है बाकी।


धुन संगीत और ताल की कमी है... मुझे मालुम है कविता थोड़ी कमज़ोर है...पर दिल की गहरायी से बनी है ... !!! ज़्यादा ख़ास तो नही पर मेरे दिल के बहुत पास है... :)

एक त्रिवेणी

मेरी आत्मा पर दाग कुछ बन रहे हैं
कुछ समय पहले ही धोया था इसे

अब सोचती हूँ उठा कर फ़ेंक ही दूँ।

मुखोटा

Man is least himself when he writes in his own person,
Give him a mask and he will speak the truth.
-Oscar wilde

मुखोटे मैंने भी लगाये
में किरदार बनी कई रोल निभाए

ऐसा जमा मेकप भी की उतरता नही चेहरे से मेरे अब ।

Thursday, December 10, 2009

कविता

कविता क्या सिर्फ़ शब्दों का जमावड़ा है
मन के जज्बात कुछ नही?
भारी भारी शब्दों का अखाड़ा है
दिल की भावना कुछ नही?

जो सोचते हैं की
खड़ा करेंगे कविता का महल
एक एक ईंट सोने की चुनकर
आभा बढ़ाने के लिए
ग़लत सोचते हैं।

कविता तो एक कुटिया है
मन दिल और मस्तिष्क के
कोने कोने से तिनकों को चुनकर
बनाया गया घोंसला है।

कविता कोई मजदूरी नही
वह तो सबुरी ह
शांत सुंदर अभिव्यक्ति
अशांत मन की!



Tuesday, December 8, 2009

बेनाम कविता !

आपके लिए,

समय से परे हट कर देखो
भूत , भविष्य वर्त्तमान से दूर
एक अलग सा समय है
वो समय महसूस होता है
उन दो मस्तिष्क को उन दो दिलों को
जो मिल जाते हैं
बावजूद दूरियों के
बावजूद खामोशियों के
बावजूद पहरों के
वो फिर अलग संसार बनाते हैं
पीले झाडे पत्तों से सपनो का आशियाँ बनाते हैं
सच को वे मापते नहीं उसकी परवाह नहीं करते
सच भी अधुरा होता है वे ये जानते हैं
झूट को ही सही कल्पना का नाम देकर
बड़ी प्यारी सी नाजुकता से दिल बहलाते हैं
पर आखिर वे अपने बनाये संसार में खुश रहते हैं
किसी का दिल नहीं तोड़ते
किसी की हंसी नहीं छीनते
झूठे धर्म या प्रेम के नाम पर
लड़ाई नहीं करते किसी को लुटते नहीं
इस समय से दूर इस समय से परे
कुछ खोजते हैं
कुछ तलाशते हैं
वो क्या है ये तो भला
वो दो दिल ही जानते हैं.

आपकी,
..........

Saturday, December 5, 2009

ज़िन्दगी किसी के जाने से रूकती नही

५.1२.2009

कोई आया था और कोई चला गया
ज़िन्दगी किसी के जाने से रूकती नही

वो नदी सदा बहती ही रहती है
कभी किसी मोड़ पर थकती नही

उसने एक दिन थामा था हाथ मेरा
बोंला " तुम कुछ क्यूँ कहती नही"

पर मैंने तोह कहा तुमने सुना नही...
सुन कर भी शायद मुद कर देखा नही ...

हर बार जब कोई गया
दिल का एक टुकड़ा कहीं बिखर गया

और तुम जिस दिन से गए...
दिल को समझाया यही ...


कोई आया था और कोई चला गया
ज़िन्दगी किसी के जाने से रूकती नही...

ज़िन्दगी किसी के जाने से रूकती नही।





Friday, December 4, 2009

बासी - पुरानी

रंगों में डूबी जिंदगानी है
खुशियाँ आनी खुशियाँ जानी हैं
सोचती हूँ ठहर ही जाऊ
जब रुकी मेरी कहानी है
जाने फिर कब अवकाश मिलेगा
वो मुझे मेरे पास मिलेगा
.......

शाम ढलती जाती है
अकेली नही ढलती
मेरी परछाइयों को भी ले जाती है
और दे जाती है घुटन भरी तन्हाई
जिसे में अपने साथ लिए घुमती हूँ ....

Tuesday, December 1, 2009

ठूंठ !

हिम्मत करके कॉलेज के सेकेण्ड इयर में मैंने हिन्दी की एक मैगजीन में अपनी एक कविता छपने के लिए दी। परन्तु शायद वो पेनल को पसंद नही आई और वो नही छपी । थोड़ा दुःख तोह हुआ और शुरुवाती कोंफिड़ेंस भी लूज़ हो गया पर फिर मुझे याद आया की निराली जी की भी तोह पहली कविता "जूही की कलि" महवीर द्विवेदी जी ने "सरस्वती " पत्रिका में नही छपी। आप यकीन नही मानेंगे आज तक मुझे वो किस्सा याद है और तस्सली बंधी हुई है की शायद जिस तरह निराली जी ने ऊँचाई प्राप्त की में भी कर सकू। :)
खैर में अपनी वो कविता ब्लॉग पर लिखना चाहती हूँ की आप लोग मुझे सही आकलन करके बता सके । मेरी ये पसंदीदा रचना है।

ठूंठ

एक ठूंठ खड़ा है शायद बरसो से
जिसकी जडें बहुत गहरी हैं
शायद किसी मौसम में वो हरा होता है
पर जब भी में देखती हूँ
तोह वह ठूंठ ही दीखता है
जाने क्यूँ पर में ही उसे देखना चाहती हूँ

इसीलिए क्यूंकि शायद
मेरे अंदर भी कहीं कोई ठूंठ है
जिसकी जडें बहुत गहरी हैं
जो किसी मौसम में तोह हरा होता है
पर जब भी में अंदर झांकती हूँ
जाने क्यूँ मुझे वो ठूंठ ही दीखता है।
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