Wednesday, December 30, 2009

औरत


घर की कई मुर्दा मशीनों के बीच ,

एक मशीन जीवित सी है,

दुनिया की नज़रों में,

औरत एक मशीन सी है।

... आज की एक त्रिवेणी....

आज भी वह पुरानी बुरी आदत नहीं बदली,
आज भी में उसके कारन बदनाम हूँ,

न जाने कितने वादे भुलाये , न जाने कितने दिल तोड़े।

कुछ पंक्तियाँ ....

अब उसे समझाने की कोशिश नहीं करती ,
खुद को समझा लेती हूँ,
आज कल में सभी आरोप सह लेती हूँ
पहले भी सह लेती थी पर आंसुओ के साथ
आज कल तो ज़हर भी मुस्कुरा के पी लेती हूँ

अब उसे समझाने की कोशिश नहीं करती
खुद को समझा लेती हूँ .....

......

वो कभी कभी मुझे कॉल करती थी,
सुनाने के लिए अपनी खामोशी,
ऐसा नहीं है की वह कुछ नहीं कहती थी,
बल्कि बहुत कुछ कह जाती थी
बिना शब्दों के भी ,
काल करती थी की रो सके
अपना दिल हल्का कर सके,
सोच सके की में उसके करीब ही हूँ,
और वह सच में रोती थी,
मुझे बिना बताये,
फ़ोन को कहीं ,
अपने आँचल में छिपाए,
फिर कहती थी बस इतना ही -
"अपना ख्याल रखना"
और झट से फ़ोन रख देती ।
में पूछ भी नहीं पाटा था -
"तुम ठीक तो हो न"

Saturday, December 12, 2009

रात गहरा रही है....

रात गहरा रही है ...
दिल डूब रहा है फिर से,
आज इस गहराई में ।

आओ फिर से मोती तलाशें
मिलकर करें उस तारे से बातें
आज न कहना जल्दी जाना होगा
मिलन की कई रस्मे हैं बाकी।

रात गहरा रही है...
दिल डूब रहा है फिर से,
आज इस गहराई में।

वो चांदी की थाली सा दिखा
आज चाँद भी रूठा मुझसे रुसवा हुआ
तुम न रूठना बस गले लग जाना
रात अँधेरी अभी और है बाकी।


धुन संगीत और ताल की कमी है... मुझे मालुम है कविता थोड़ी कमज़ोर है...पर दिल की गहरायी से बनी है ... !!! ज़्यादा ख़ास तो नही पर मेरे दिल के बहुत पास है... :)

एक त्रिवेणी

मेरी आत्मा पर दाग कुछ बन रहे हैं
कुछ समय पहले ही धोया था इसे

अब सोचती हूँ उठा कर फ़ेंक ही दूँ।

मुखोटा

Man is least himself when he writes in his own person,
Give him a mask and he will speak the truth.
-Oscar wilde

मुखोटे मैंने भी लगाये
में किरदार बनी कई रोल निभाए

ऐसा जमा मेकप भी की उतरता नही चेहरे से मेरे अब ।

Thursday, December 10, 2009

कविता

कविता क्या सिर्फ़ शब्दों का जमावड़ा है
मन के जज्बात कुछ नही?
भारी भारी शब्दों का अखाड़ा है
दिल की भावना कुछ नही?

जो सोचते हैं की
खड़ा करेंगे कविता का महल
एक एक ईंट सोने की चुनकर
आभा बढ़ाने के लिए
ग़लत सोचते हैं।

कविता तो एक कुटिया है
मन दिल और मस्तिष्क के
कोने कोने से तिनकों को चुनकर
बनाया गया घोंसला है।

कविता कोई मजदूरी नही
वह तो सबुरी ह
शांत सुंदर अभिव्यक्ति
अशांत मन की!



Tuesday, December 8, 2009

बेनाम कविता !

आपके लिए,

समय से परे हट कर देखो
भूत , भविष्य वर्त्तमान से दूर
एक अलग सा समय है
वो समय महसूस होता है
उन दो मस्तिष्क को उन दो दिलों को
जो मिल जाते हैं
बावजूद दूरियों के
बावजूद खामोशियों के
बावजूद पहरों के
वो फिर अलग संसार बनाते हैं
पीले झाडे पत्तों से सपनो का आशियाँ बनाते हैं
सच को वे मापते नहीं उसकी परवाह नहीं करते
सच भी अधुरा होता है वे ये जानते हैं
झूट को ही सही कल्पना का नाम देकर
बड़ी प्यारी सी नाजुकता से दिल बहलाते हैं
पर आखिर वे अपने बनाये संसार में खुश रहते हैं
किसी का दिल नहीं तोड़ते
किसी की हंसी नहीं छीनते
झूठे धर्म या प्रेम के नाम पर
लड़ाई नहीं करते किसी को लुटते नहीं
इस समय से दूर इस समय से परे
कुछ खोजते हैं
कुछ तलाशते हैं
वो क्या है ये तो भला
वो दो दिल ही जानते हैं.

आपकी,
..........

Saturday, December 5, 2009

ज़िन्दगी किसी के जाने से रूकती नही

५.1२.2009

कोई आया था और कोई चला गया
ज़िन्दगी किसी के जाने से रूकती नही

वो नदी सदा बहती ही रहती है
कभी किसी मोड़ पर थकती नही

उसने एक दिन थामा था हाथ मेरा
बोंला " तुम कुछ क्यूँ कहती नही"

पर मैंने तोह कहा तुमने सुना नही...
सुन कर भी शायद मुद कर देखा नही ...

हर बार जब कोई गया
दिल का एक टुकड़ा कहीं बिखर गया

और तुम जिस दिन से गए...
दिल को समझाया यही ...


कोई आया था और कोई चला गया
ज़िन्दगी किसी के जाने से रूकती नही...

ज़िन्दगी किसी के जाने से रूकती नही।





Friday, December 4, 2009

बासी - पुरानी

रंगों में डूबी जिंदगानी है
खुशियाँ आनी खुशियाँ जानी हैं
सोचती हूँ ठहर ही जाऊ
जब रुकी मेरी कहानी है
जाने फिर कब अवकाश मिलेगा
वो मुझे मेरे पास मिलेगा
.......

शाम ढलती जाती है
अकेली नही ढलती
मेरी परछाइयों को भी ले जाती है
और दे जाती है घुटन भरी तन्हाई
जिसे में अपने साथ लिए घुमती हूँ ....

Tuesday, December 1, 2009

ठूंठ !

हिम्मत करके कॉलेज के सेकेण्ड इयर में मैंने हिन्दी की एक मैगजीन में अपनी एक कविता छपने के लिए दी। परन्तु शायद वो पेनल को पसंद नही आई और वो नही छपी । थोड़ा दुःख तोह हुआ और शुरुवाती कोंफिड़ेंस भी लूज़ हो गया पर फिर मुझे याद आया की निराली जी की भी तोह पहली कविता "जूही की कलि" महवीर द्विवेदी जी ने "सरस्वती " पत्रिका में नही छपी। आप यकीन नही मानेंगे आज तक मुझे वो किस्सा याद है और तस्सली बंधी हुई है की शायद जिस तरह निराली जी ने ऊँचाई प्राप्त की में भी कर सकू। :)
खैर में अपनी वो कविता ब्लॉग पर लिखना चाहती हूँ की आप लोग मुझे सही आकलन करके बता सके । मेरी ये पसंदीदा रचना है।

ठूंठ

एक ठूंठ खड़ा है शायद बरसो से
जिसकी जडें बहुत गहरी हैं
शायद किसी मौसम में वो हरा होता है
पर जब भी में देखती हूँ
तोह वह ठूंठ ही दीखता है
जाने क्यूँ पर में ही उसे देखना चाहती हूँ

इसीलिए क्यूंकि शायद
मेरे अंदर भी कहीं कोई ठूंठ है
जिसकी जडें बहुत गहरी हैं
जो किसी मौसम में तोह हरा होता है
पर जब भी में अंदर झांकती हूँ
जाने क्यूँ मुझे वो ठूंठ ही दीखता है।

Saturday, November 28, 2009

कुछ शब्द गुलज़ार जी के लिए



वैसे तो मेरा ज्यादा परिचय नही है गुलज़ार जी से पर एक बार गलती से मैंने उनकी ग़ज़ल त्रिवेनियों की किताब पढ़ी और तभी से में उनकी कविता की कायल हो गई। फिर एक दिन पंकज ने उनके बारे में बताया साथ ही उनके ब्लॉग पर उन्होंने गुलज़ार जी की कुछ त्रिवेनियाँ भी लिखी जिन्हें पढ़कर बहत अच्छा लगा।

http://pupadhyay.blogspot.com/2009/11/blog-post_09.हटमल


कल अचानक से दैनिक भास्कर में मेरी नज़र गुलज़ार जी की तस्वीर व उन पर लिखे लेख पर पढ़ी जो की जाने मने साहित्यकार खुशवंत सिंह जी ने लिखा था। वैसे तो मुझमें इतना धैर्य नही की में एक कोई लेख पुरा पढ़ सकूँ पर खुशवंत सिंह जी मेरे प्रिया स्तंभकार व लेखक हैं और फिर लेख भी गुलज़ार जी पर था तोह पढ़े बिना रहा न गया। उनका लेख पढ़ कर गुलज़ार जी के बारे में बहुत कुछ बातें जानने को मिली जिसमें सबसे दिलचस्प थी उनका असली नाम - सम्पुरण सिंह कालरा । और भी दिलचस्प बात थी की उनके ज़माने में खुबसूरत लड़कियां उनकी दीवानी थी। खुशवंत सिंह जी ने गुलज़ार के विषय में एक बहुत अच्छी बात कही की उनकी ज़िन्दगी में आई कई औरतो की शिकायत रही की वे एक अलग थलग से प्राणी हैं हमेशा एकांत की तलाश करते हैं। फिर खुशवंत सिंह जी ने इसी बात का समानीकरण करते हुए लिखा है - सभी कवियों और लेखको को एकांत की जरुरत होती है और वे बुरे साथी साबित होते हैं - ये बात बहुत तक सही भी है , मैंने अपनी ज़िन्दगी में ही ऐसे कई उदाहरण देखे हैं ।



खुशवंत सिंह जी ने गुलज़ार का जीवन संदीप सेन की पुस्तक 'एरिया' में पढ़ा था और उसमें से एक कविता भी प्रस्तुत की , जो इस प्रकार से है - शीर्षक - स्केच


याद है एक दिन


मेरी मेज पर बैठे बैठे


सिगरेट की डिबिया पर तुमने


छोटे से पौधे का


एक स्केच बनाया था


आकर देखो


उस पौधे पर अब फूल खिल आए हैं।



महान लेखको का यही गुन है की वे चाहे एक लेख लिखे या फिर एक कविता की पंक्ति वो बस दिल में उतर जाती है।




Thursday, November 26, 2009

अतीत की देहलीज़ पर खड़ी ....

अतीत की देहलीज़ पर खड़ी
वह कुछ डरी सी
देख रही है अतीत के चलचित्रों में
अपनी ही परछाई ...
कोने में दुबक कर सोयी
रोई आज वह खूब रोई
देख कर माँ पिताजी का प्यार
अपने छोटे भाई के प्रति
दुत्कारा नही उसे
न ही उपेक्षा की उसकी
फिर भी जाने क्यूँ लगने लगा उसे
की कोई प्यार नही करता उसे

प्यार!
अतीत में प्यार की कमी सी थी
कमरे में अँधेरा था
तकिया उसके आंसुओं से गिला था
वह ख़ुद को चुप कराती
सर पर ख़ुद ही हाथ फेर
लोरियां सुनाती
खुश करने के लिए
ख़ुद को परियों की कहानियाँ सुनाती

अतीत की देहलीज़ पर खड़े
जब वह वर्त्तमान की और देखती है
तो समझ पाती है
क्यूँ वो लड़की
अभी तक बचपन की कहानियों में khoyi है
उन्ही कल्पना के जंगलों में भटक रही है
वह तो कभी बड़ी हुई ही नही थी
बल्कि समय ने उसे बाँध लिया है
और उस देहलीज़ पर खड़ा कर दिया है
जहाँ से वह न अतीत में पूर्णतः kho हो पाती है
न वर्त्तमान में जी पाती है ...

अतीत की देहलीज़ पर खड़ी...



Monday, November 23, 2009

triveni

एक रोज़ उसने मुझे प्यार से दी
महीन चांदी के सितारों वाली वो चुनर

और आज तलक में उसमें से चांदनी छानती हूँ

Sunday, November 22, 2009

अधूरे चित्र

कुछ अधुरा अधुरा सा
आज लग रहा है
सब कुछ पिछला भुला कल
याद आ रहा है...
वो दुनिया जो मैंने बनाई थी
एक पेंटिंग सी थी...
पेंटिंग!
आह! वो पेंटिंग्स , वो चित्र
जो बड़े ही मन से बनाये थे मैंने
कोई कलाकार नही थी में
द्रोइंग में खास दिलचस्पी भी नही थी
पर एक जूनून सा था
उन कई रंगों में
एक सुकून सा था
जाने क्या सोच कर वो चित्र बनाये
एक के बाद एक अधुरा छोड़
कई चित्र बनाये
आज भी स्टोर रूम के किसी कोने में
रखी हैं वो पेंटिंग्स...
पेंटिंग!
हाँ! पेंटिंग की तरह ही
ज़िन्दगी हो गई है मेरी
या शायद में उन अधूरे चित्रों सी हो गई हूँ
स्टोर रूम में कैद
पुरे होने की तलाश में
कहीं खो सी गई हूँ...

Saturday, November 21, 2009


सोचती हूँ कभी

क्यूँ पौधा बनाया मुझे

काश! में बेल होती तो

अपने पेड़ से लिपटी होती

शाखा होती ,

पेड़ से जुड़ी होती

फूल होती ,

पेड़ पर खिली होती

किसी भी तरह काश!

में अपने पेड़ की होती

पर अब में दूर हूँ

हीन, क्षुद्र ,

सिर्फ़ एक चोटी पौध हूँ

क्यूँ पौधा बनाया मुझे

काश! में बेल होती ।

इसके आगे भी कुछ पंक्तियाँ लिखी थी मैंने पर जब मैंने अपनी मम्मी को सुनाई तब मम्मी ने अन्तिम पंक्तियाँ सुनकर कहा - ये नई generation की सोच है इसीलिए मैंने वो पंक्तियाँ इस कविता में से हटा दी। मम्मी ने उसे अपने ढंग से देखा पर में चाहती हूँ आप लोग भी उसे पढ़ें ताकि मुझे आपकी राय भी पता चले की कविता अन्तिम पंक्तियों के बिना अच्छी लग रही है या अन्तिम पंक्तियों के साथ। ये रही अन्तिम पंक्तियाँ -

पर कहते हैं जो होता है अच्छे के लिए होता है

में वो डूब तो नही

जो पैरों की मार सहती है

अपमान , दर्द और चोट सहती है

में भले ही एक पौधा हूँ

जो भी हूँ जैसा भी हूँ

उस डूब से तो बेहतर हूँ।

तुम्हारी याद में -

पंकज की कलियों को खिलने के लिए
उर्जा दी ओजस्वी सूर्य की किरणों ने
निभाया एक दिन का साथ
पर कहा रोक पाया सूर्य
इस पंकज को मुरझाने से
कल फिर उगा नया कमल
खिला मुस्कुराया पुष्पित पल्लवित हुआ
उसी सूर्य की ओजस्वी किरणों से
प्रेम से प्रेरणा से

Thursday, November 19, 2009


हँसते रहना

खिलखिलाते रहना

दो कदम पर ही घर है मेरा

ऐसे ही साथ निभाते रहना

कभी हो जाऊ नज़रों से ओझल

मेरे गीत सदा गुनगुनाते रहना

चाँद सिक्कों के लिए नही जीते ज़िन्दगी अपनी

ख्वाब सोती आँखों को दिखाते रहना

आंसुओ को पीने में मज़ा ही क्या है

प्रेम की अमृत बूँद पिलाते रहना

Wednesday, November 18, 2009

कुछ पंक्तियाँ

दिल में दर्द है
दिल में सवाल हैं
दिल में एक दरवाजा है
दिल में एक खिड़की है
दिल से बहार झाँकने पर वो चाँद दीखता है
दिल में अँधेरा छाया है
इस दिल में दुबक कर सोया जा सकता है
दिल में अकेले में रोया जा सकता है
इस दिल में कई बात छिपी है
दिल अक्सर खामोश रहता है
दिल कभी चुपके से कुछ कहता है
दिल की दीवार का रंग लाल है
इस दिल का बहुत बुरा हाल है
दिल मेरा बेचारा है
दिल कमज़ोर और हारा है ...


Tuesday, November 17, 2009

दो पंक्तियाँ


बूँद बूँद अपनी वो औरों पर लुटाता था

वो कुआँ भी कभी प्यासा था


--------------------


रात घिरने को आई आँखें हैं सजल

अब तो मुझको गा लेने दो ये ग़ज़ल

Monday, November 16, 2009

जेसमीन




जेसमीन


लोग भले ही उसे ध्रुव तारा बुलाते हो जेसमीन उसे लेरी के नाम से बुलाती थी । लोगों को वह टिमटिमाता सुंदर तारा दीखता हो पर जेसमीन के लिए वो एक हेंडसम बॉय था जिससे वो बहुत प्यार करती थी और जो उससे बहुत प्यार करता था । कितनी सुंदर कल्पना है न ! पर ये कल्पना हर रात कुछ पलों के लिए सजीव हो जाती थी। प्यार भरी आंखों से जेसमीन उसकी तरफ़ देखती है और लेरी उसे अपनी तरफ़ खींच कर बाहों में लेकर बहुत प्यार करता है - और दो पल ऐसे ही गुज़र जाते हैं। पर उन दो पलों का ये एहसास - एक तनहा कल गुजरने के लिए काफ़ी होता है।



अगले दिन उसके होठों पर मुस्कराहट होती है और दिल में इंतज़ार - फिर से उन्ही कुछ पलों को जी भर के जीने का।

एक और लघु कथा


रिलेशनशिप

"तो फिर क्या आज से हम साथ है?" मयंक ने चैटिंग करते हुए संजना को मेसेज भेजा । संजना को ये पढ़कर बहुत अजीब लगा। उसे समझ में नही आया आख़िर ये क्या था - प्रपोसल या इन्फोर्मशन या फिर क्वेस्चन ? उसने मयंक से पुछा "वाट इस दिस? वाट दू यु मीन ?" मयंक ने तपाक से जवाब में लिख दिया - "ओपन रिलेशनशिप है न इसलिए ओपेंली प्रपोस कर दिया।"
संजना और मयंक दोनों ही शादी के बंधन तो क्या कमिटमेंट को भी नही स्वीकार करते थे। इसीलिए मयंक ने इस नए ट्रेंड को अपनाना ठीक समझा - ओपन रिलेशनशिप । जब तक जी चाहे साथ रहो , न चाहे छोड़ दो।
कितना आसान हो गया है सबकुछ। संजना को मयंक की बात एक हद तक ठीक भी लगी थी । कम से कम इसमें बॉय फ्रेंड की झक झक तो नही थी और पर्सनल स्पेस भी थी। पर .... फिर वो हाँ करने में झिझक क्यूँ रही थी। ऐसी क्या चीज़ थी जो उसे ऐसा करने से रोक रही थी ... शायद कोई ऐसा सच था जो संजना को ये गलती {?} करने से रोक रहा था।
संजना ने फिर अपने दिल को मनाना चाहा ... ख़ुद को उलहना दी ... यहाँ तक की ख़ुद को पिछड़ी मानसिकता का कहकर दुत्कारा भी पर फिर इस द्वंद्व के बीच सच की आवाज़ सुनाई दी - मयंक मुझे प्यार तो नही ही करता है पर शायद उतना पसंद भी नही करता ...उसकी लाइफ में मेरी क्या इम्पोर्टेंस है? में रहू या न रहू उसे क्या फरक पड़ेगा? और ... बस ... और कुछ नही । ये ओपन रिलेशनशिप में पड़कर में ख़ुद को और तकलीफ नही देना चाहती । पर ... में अकेली भी नही रहना चाहती । ओह! ये रिलेशंस .... हाउ टिपिकल दे आर । में ग़लत थी रिलेशनशिप इतने आसान नही होते । इंसान ख़ुद जितना जटिल होता है उसके रिलेशनशिप उतने जी जटिल होते हैं।

एक लघु कथा

दो सहेलियां

तीन साल ही हुए थे दोनों की दोस्ती को पर एक अजीब सा बंधन था दोनों के बीच । वो दो सहेलियां थी - खास सहेलियां। शायरी और रोली तीन साल से हॉस्टल में एक ही कमरे में साथ रह रही थी। कल उनकी हॉस्टल की ज़िन्दगी का आखरी दिन था और आज की रात उनके साथ की आखरी रात। एक्साम्स ख़तम हो चुके थे इसीलिए पढ़ाई की टेंशन नही थी। दोनो पुरी रात बैठकर बातें करना चाहते थे । गर्मी के दिन थे इसीलिए हॉस्टल की छत पर बिस्टर लेकर चले गए। थोड़ी देर तक बैठ कर वो हॉस्टल के पुराने रंगीन दिन याद करने लगे। दोनों उस चाँद को निहार रहे थे जो अपनी सम्पूर्णता में मदमस्त सबसे बेखबर था। और दोनों को किसी अधूरेपन का एहसास सा हुआ। शब्दों की जरुरत नही थी । रोली ने शायरी का हाथ खींच कर उसे अपने पास लेटा दिया। चाँद की रौशनी खलल पैदा कररही थी । चादर मुह पैर धक् कर दोनों ने आँखे मीच ली । शायरी ने रोली का हाथ पकड़ कर उसे दबाया ... शायद उसे डर लग रहा था ... रोली ने उसे धीरे से गले लगा लिया।

चाँद ढला नही पर सूरज ने उसे छिपा दिया था। रोली ने अपनी आँखे खोली तो ऊपर नीले आसमान पर उसे रात वाला तनहा बेसब्र चाँद दिख गया ... जो अब सूरज की रौशनी से सराबोर था । रोली के होठो पर एक मुस्कान थिरक गई। शायरी के माथे को उसने बेझिझक चूम लिया.

Sunday, November 15, 2009

कुछ खास तो नही बस यूँ ही है -

- तुम हँसना और हँसते रहना,
कहकर एक मुस्कान दे गया
वो अजनबी सा दोस्त
आज दिल पैर दस्तक दे गया

-आँखें मेरी आइना तो नही
फिर भी उसने कुछ कहा नही
दिल ख़ुद को समझाता रहा
नही वो बेवफा नही , वो बेवफा नही

-खुशी भी और गम भी
ये साथ साथ क्यूँ चलते हैं
आँखे कुछ कहती नही
बस आंसू ही झरते हैं

-रंग जाने क्यूँ उसे बहुत पसंद थे
कई रंगों वाला कुरता वो पहना करती थी
वो आँखे कितनी सुंदर थी
दुनिया का हर रंग अपने में भर लेती थी

कुछ खास नही बस बासी त्रिवेनियाँ -

कहीं पढ़ा था मैंने
किताबों से अच्छा कोई दोस्त नही

पर आज कल दोस्ती मेरी कलम से हो गई है

- दिल क्या है ?
घर के स्टोर का एक कोना सा है....तुम आना कभी!

रौशनी की यहाँ कुछ कमी मुझको लगती है


Friday, November 13, 2009

फिर चार पंक्तियाँ

यूँ ही लिख दी थी एक दिन मैंने बैठे बैठे -

कल शाम ही को चिट्ठी पढ़ी थी उसकी,
तब एक तस्वीर मेरे जेहन में उतर आई
आज रात फिर एक तार आया है
और उसमें उसकी मौत की ख़बरआई ।

तीन और त्रिवेनियाँ

- छोड़ दिया है अंधेरे की फिक्र करना मैंने
ऊँची ऊँची अट्टालिकाओं से अब आकाश जगमगाता है

अमावस्या भी अब तोह ईद का चाँद हो गई है

- सूखे पत्तों में दिन भर ढूंडा था
तेरी यादो को समेत कर ले जा रही थी

एक बार फिर उस हवा ने मेरा सब कुछ चीन लिया

-अकेले रहते रहते सब एहसास मर चुके थे
घर के कोने कोने से मिलकर लगा - में जिंदा हूँ

बहुत दिनों बाद किसी ने आज दिल दुखाया है

Thursday, November 12, 2009

चार पंक्तियाँ

चाँद को देखती हूँ तो सोचती हूँ
क्या किस्मत उसने पायी है
खूबसूरती इतनी है मगर
दूर तलक फैली तन्हाई है

एक ग़ज़ल

मन में ये आज उलझन है क्यूँ
आज ख़ुद से ये अनबन है क्यूँ

पिंजरे में वह तड़पता रहा
मन पंछी आख़िर कैद है क्यूँ

द्वंद्व सा हर वक्त रहता हैं मन में
मन आख़िर इतना कमजोर है क्यूँ

तीन त्रिवेनियाँ

तीन त्रिवेनियाँ

-उसके बालों से अब सफेदी टपकने लगी थी
आँख का चश्मा भी अब लुढ़कने लगा था

किसी ने कहा था "जवानी की यादों को टटोलने के दिन आ गए"

-काका के चेहरे की लकीरों में कितनी कहानियाँ छिपी हैं
उसकी ज़िन्दगी के कटोरे में अनुभव की चवन्नियां रखी हैं

मन करता है लिपट जाओं उन कन्धों से जिसने ज़िन्दगी के बोझ को यूँ बिना शिकायत उठाया

-साड़ी में पहले अस्त व्यस्त सी रहा करती थी
मिनी स्कर्ट में उसको अब शर्म नही लगती

शर्माना वैसे भी अब आउट ऑफ़ फैशन हो गया है

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