Thursday, December 30, 2010

साम्या

"नहीं ये नहीं हो सकता " ,"लेकिन क्यों नहीं ? क्या अब हम दोस्त नहीं हैं ? " "दोस्त ... हाँ... पता नहीं...मुझे नहीं पता ... प्लीज़ मुझे अकेला छोड़ दो." इतना कह कर साम्या रेस्टोरेंट से चली गयी और उसके बाद मैंने उसे कभी नहीं देखा... अगले कई  सालों तक  नहीं. जब में उससे पहली बार मिला तब मुस्किल से वह बीस-इक्कीस साल की होगी...ओह...बहुत ही मासूम सी लगती थी.. छोटा कद , घुंघराले बाल .. ज्यादा लम्बे नहीं .. शायद कंधे तक... और गहुआ रंग ... भीड़ में कम बोलना .. और अकेले में चिल्लाना ... जोर जोर से हँसना ... वेटर के सामने मुस्कुराना और उसके पलटते ही मुझे आँख मारना... जब मैं उसे बच्ची समझता तो बड़ो जैसी हरकते कर जाती ... और जब मैं कुछ करने जाता ... मासूम बन एक टक ऐसे  देखती जैसे मैंने कोई गुनाह कर दिया... बिलकुल पगली लड़की थी...

"पापा ये देखिये... आंटी...! साम्या आंटी को प्राइज़ मिला..." प्रशांत ने मुझे एक दम हिला ही दिया... मैंने प्रशांत को धीरे से मुस्कुरा कर कहा.. "हाँ ! लेकिन साम्या ने से इसे लेने से मना कर दिया..." अब प्रशांत के चोंकने की बारी थी..."लेकिन क्यों? ये तो बहुत बड़ा प्राइज़ है .. लगभग...शायद..." , "पांच करोड़ का ..." , " हाँ हाँ ... पांच करोड़... और आंटी ने इसे लेने से मना कर दिया? ... पर क्यों? " ... मैं प्रशांत के इस भोले प्रश्न पर मुस्कुराने के अलावा कुछ कह न सका सिवाय इसके की ..."बेटा वो ऐसी  ही हैं..." , गीता रसोई घर के अंदर से ही बोली "हाँ वो ऐसी ही है .. बहुत अजीब... उसे दुनिया की परवाह नहीं..." मैंने इस टिपण्णी पर  कोई जवाब नहीं दिया... और धीरे से बालकनी में आकार खड़ा हो गया .. सूरज अभी किनारे पर नहीं पहुंचा था... डूबने में  समय था... अभी भी गर्म तेज़ आग उगल रहा था... मैं साम्या के बारे में नहीं सोचना चाहता था फिर भी उसका चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता... उस दिन रेस्टोरेंट में हमारी आखरी मुलाक़ात थी ... जब वो मुझे अकेला छोड़ कर जा रही थी मैं समझ गया था वो मुझे प्यार नहीं करती  ... वो कभी किसी को प्यार नहीं कर सकती थी... या शायद कुछ और था जो मैं समझ नहीं पाया... उसका दर्द... उसका दर्द मेरे समझ से परे था... अचानक मुझे सब धुंधला दिखाई देने लगा... मेरी आँखों में आंसू थे... मैं खुद को रोक नहीं पाया... मैंने मन ही मन इश्वर से उसके सुख की कामना की... इश्वर से प्रार्थना करने के बाद मुझे बहुत अजीब शान्ति महसूस हुई ...ऐसा लगा  जैसे सच में कोई मुझे सुन था ...

मैंने अगले दिन का पेपर उठाया तो देखा  की साम्या अब इस दुनिया में नहीं रही...एक क्षण के लिए अचानक से  मन विचलित हो गया  था... पर पुरे दिन अजीब सी शान्ति ने मुझे आ घेरा... मुझे पूरा यकीन है...उस दिन सच में इश्वर ने मेरी प्रार्थना सुन ली थी...

आज भी अक्सर साम्या का हँसता हुआ चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता है... और फिर मुह से अनजाने में निकल जाता है...पगली लड़की !

सपने

दूर पहाड़ी से उगता हुआ सूरज
खिलती धूप
और उसकी चमक से
रौशन होता वो लकडियो वाला घर
आस-पास हरियाली
और नीचे बहती हुई वो सुरीली नदी...

सपने कितने रंगीन होते हैं न ,
और शायद अंधे भी
जिन्हें बीच में फैलती  खाई नहीं दिखती
पीले झड़ते पत्ते
और सूखती नदी नहीं दिखती...

Wednesday, December 29, 2010

याद

बहुत  दिनों  बाद
वे मुझे  फिर याद   आई
जिन्हें  मैंने  तीन  अप्रेल  कि शाम  को 
पहली  बार  उसी रेस्टोरेंट में देखा  था 
और  उसके  बाद  शायद  एक  या  दो  बार  और देखा हो  
एक  सुंदर  कांच  के  महल  में  कैद 
वो  एक  सुनहरी  और  एक  चमकीली  मछली .

एक  बक्से  में  बंद 
बिना  गुनाह  के  सजा  झेलती 
उपर  से  नीचे 
नीचे  से  उपर चक्कर काटती  
बक्से  से  निकलने  को  बैचेन  मन ...

मैं  बहुत  दूर  बैठी  उन्हें  ताकती  
और  कुछ   सोच  न  पाने  कि  स्तिथि  में  थी 
कोई  चीज़  थी  हमारे  बीच 
एक सी   
ज़िन्दगी  में  कैद  फिर   भी 
ज़िन्दगी  से  दूर 
ये  तड़प  थी  
बन्धनों  की  . 

उन मछलियों   की  याद  
अभी  भी   ज़ेहन  में  किसी  
जिंदा  तस्वीर  कि  तरह "कैद" है.

Sunday, October 3, 2010

सिल लिए हैं मैंने होंठ अपने अब



मेरे शब्दों को तुम पसंद नहीं,
और तुम्हे मेरे शब्द.
सिल लिए हैं मैंने  होंठ अपने अब. 

चुप रहते रहते सारे, 
कहीं खो गए हैं शब्द,
सिल लिए हैं मैंने होंठ अपने अब.

दीवारे ताकती हैं मुझे ,
तकिये पर टपकते हैं शब्द,
सिल लिए हैं मैंने होंठ अपने अब.



Tuesday, September 14, 2010

क्या तुम्हे नहीं लगता
बढ़ता ही जा रहा है ये प्रेम दरिया
या कि जैसे
बसंत अब मुस्कुरा रही हो शीत में भी ?

*****

क्यों मैं देखने लग गयी हूँ बताओ
तुम्हारी ही सूरत में
मेरे अजन्मे बेटे कि मासूमियत? 

*****


Monday, August 30, 2010

3.) अनुवाद

3.)
अनुवाद


मृत ज़मीन की रुखाई के मध्य,
एक फूल की ख़ामोशी ;
इतनी मासूम और गंभीर,
कि अब वो ख़ामोशी उसकी अमर कहानी बन गयी है .

२.) अनुवाद

 
२.) 
अनुवाद  

तुम्हारे कदमो के निशाँ,
मेरे दोस्त !
मिटाए जा चुके हैं,
"किसके द्वारा?"
तुम्हे नहीं पता?
ओह बेचारा इंसान !
जिसे ये नहीं पता उसकी गलती क्या है,

रुको !
भागो मत!
भूल धुंध कि तरह हर कहीं फैली है ,
इसीलिए आखिरी फैसले से पहले,
इस धुंध को साफ़ होने दो.

अनुवाद

स्वयं कि अंग्रेजी कविताओं का अनुवाद करने का मन हुआ... अनुवाद में वैसे भी रूचि है और हाल ही कुछ दिनों से कई छोटी अंग्रेजी कविताएं लिखी तो सोचा पहले इन्ही का अनुवाद करके देखा जाए... तो कुछ अनुवाद श्रंखला से ---

१.)

मेरे मित्र !
तुम कहते कुछ हो और  करते कुछ और,
और तुम पढ़ाते हो कबीर ,
यह एक शर्मनाक बात है,
ओह! शिकायत करना बेकार है,
यह संसार है.
अद्भुत और अजीब  !
नकली चेहरों  से घिरा,
और
अविश्वास से भरा.

Saturday, August 7, 2010

श्रेया...

" मिसेज मेहता , आइरिस ने अपनी सफलता का श्रेय आपकी परवरिश को दिया है , इस बारे में आप कुछ कहना चाहेंगी ? "

मुक्त हंसी के साथ श्रेया मेहता पत्रकार को जवाब में कहने लगी  , " अच्छा! तो अब वो इतनी समझदार भी हो गयी है ..." पत्रकार जैसे कुछ समझ न पायी हो , ऐसा एक्सप्रेशन देती है , तो श्रेया फिर कहने लगी  ...पर  अबकी बार थोड़ी गंभीरता भरे स्वर में .. " हाँ.. कभी कभी मुझे भी लगता है...  शादी से पहले में इतनी रिबेलिअस थी ...पर कुछ न कर सकी ... यहाँ तक कि शादी भी खुद कि मर्ज़ी से नहीं कर सकी.. और फिर एक लम्बी लिस्ट है कि मैं क्या क्या नहीं कर सकी और किस वजह से...तभी से मैंने यह तय किया कि मेरे साथ जो होना था वो हो गया लेकिन अपने बच्चो को मैं ऐसी परवरिश दूंगी कि .... कि कल को उन्हें ये न लगे कि वो अपनी नहीं किसी और कि ज़िन्दगी ढो रहे हैं... मैं चाहती थी कि मेरे बच्चे ज़िन्दगी जिए... ओर वो भी खुद कि बनायी हुई..."
पत्रकार अभी भी संतुष्ट नहीं दिखी , फिर जोर देकर बोली , " पर ऐसा क्या ख़ास सिखाया आपने अपने बच्चो को? " 
फिर से मुक्त  हंसी कि लहर हवा में समां गयी.  ".... जब मैं बी. ए कर रही थी... इंग्लिश में ... तब किसी ने खलील गिब्र्न कि एक किताब मुझे गिफ्ट कि थी उसकी सभी बाते हालांकि अच्छी थी पर एक बात मेरे दिल को छू गयी ओर वो थी ... कि ... तुम्हारे  बच्चे  तुम्हारे नहीं है , वो तो ज़िन्दगी कि इच्छा के ही  बच्चे हैं , वे तुम्हारे द्वारा आये हैं पर तुमसे नहीं आये , वे तुम्हारे साथ हैं परन्तु वे तुमसे सम्बद्ध नहीं हैं..... और जैसा कि मैंने इसका अर्थ निकला वह है कि -  अंततः उनकी आत्मा कि यात्रा कबसे चली आ रही  है तुम मात्र इस जीवन में उसके संग हो ... उसकी यात्रा को बिना रुकावट के चलने दो..... ओह्ह... माफ़ करना मैं बहुत गहराई में चली गयी थी... आप चाय लेंगी या कोफ़ी? " ... पत्रकार अचानक इस प्रश्न से  जैसे चौंक गयी , शायद वो भी उसी गहराई में डूब गयी थी... बोली - " नहीं नहीं आंटी आप प्लीज़ अपनी बात पूरी कीजिये..." . "...ओह्ह... अच्छा ! तो मैं बस यही कह रही थी कि मैंने कभी अपने बच्चो को ये नहीं बताया कि उन्हें क्या करना चाहिए या क्या नहीं.. मैंने सिर्फ यही बताया कि मेरे लिया क्या सही है , दनिया किसे सही मानती है और उन्हें खुद तय करना होगा कि उन्हें स्वयम के लिए उन्हें क्या चुनना है ... और बस पता नहीं आइरिस कब इतनी बड़ी हो गयी.. मुझे तो पता ही नहीं चला .. कब कोलेज से निकलते ही उसने एक नोवेल भी पब्लिश  करा लिया..."

पत्रकार  का चेहरा अचानक खिल गया , श्रेया समझ नहीं पायी , सोचा शायद उसे अपने सारे सवालों के जवाब मिल गए . पत्रकार विनम्रतापूर्वक श्रेया का इतना समय लेने के लिए माफ़ी मांगते हुए और थेंक्स आंटी कहते हुए जल्दी जल्दी चली गयी.. और रह गयी श्रेया अकेली ...

 खिड़की से बाहर  बच्चो के झुण्ड को कई मिनिट तक देखते देखते अचानक उसकी आँखों में चमक और होंठो पर मुस्कान छा गयी ... अनजाने ही उसके मुह से निकल गया - " अरे! मेरी ज़िन्दगी ख़त्म थोड़ी न हुई है... मैं क्यों इनती डिप्रेस हो रही हूँ... क्या हुआ कि मुझे वो मौका नहीं मिला .. अभी भी कौन सी देर हुई है.. हाँ देर तो गयी है पर ... उफ़... मुझे पता है अब मुझे क्या करना है...हाँ! मैं एक स्कूल खोलूंगी.. शिक्षा में वो पहलु लेकर आउंगी जिस पर अब तक किसी ने गौर नहीं किया... हाँ! शिक्षा - ज़िन्दगी जीने कि...वाओ !!! " अचानक श्रेय इतने  उत्साह से भर गयी कि भूल ही गयी कि रात के आठ बज गए और वो घने अँधेरे घर में अकेली है... पर ... ये तो झूठ  है .. न तो श्रेया के अंदर  न हीं बाहर अँधेरा रह गया था और न ही अब वो अकेली थी.. उसके सपने फिर एक रूप लेकर उसे छेड़ने , उसके संग खेलने आ गए थे... 

Monday, August 2, 2010

उफ़!!... तुम भी न.

तुम जानते हो? तुम्हे कितना मिस किया ?
हाँ... आई नो ! तुम बोलोगे - मुझसे ज्यादा नहीं .
शायद ये सच भी हो... पर क्या फर्क पड़ता है ...
मिस करने के  अलावा भी बहुत कुछ किया ... यु   नो ... बहुत कुछ फील कर रही हु...
.......................................................
"क्या?"
अभी बताया तो...
"उफ़... तुम भी न..." और  मैं खिलखिलाकर हंस दी ...




*--------------*----------------*


उन्होंने पुछा  क्या किया इतने दिन? 
मैंने कहा - आप  मेरी ज़िन्दगी में नहीं रहोगे तब ये ज़िन्दगी कैसे होगी , यही देखा...
अच्छा तो कैसी होगी...?
पता नहीं... पर जब आप रहते हो वैसे तो नहीं होगी...
"उफ़... !!! तुम भी न..." और मैं खिलखिलाकर हंस दी ...


*--------------*---------------*


तुम सच में चाहती हो मैं किसी ओर से शादी कर लू?
...... हाँ .....
सच?
हाँ...
और तुम क्या करोगी उसके बाद?
मैं भी किसी से शादी कर लुंगी.
एक बात कहू? कभी कभी मुझे लगता है तुम मुझे उतना प्यार नहीं करती जितना मैं तुम्हे करता हु.
हम्म...
क्या ? हम्म....??
कुछ नहीं....
उफ़... तुम भी  न... !! और मैं खिलखिलाकर हंस दी...


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हे! वहा क्या खड़ी हो ... आओ न... फिल्म का लास्ट सीन है ...
हम्म .......
मी......ई..ई..त ... आ..आ..अओ ना वहां क्या कर रही हो खिड़की पर खड़े होकर 
सनसेट ! .... तुम यहाँ आ जाओ..
....फिल्म ख़त्म हो गयी  ... लो मैं ही आ गया... तुमने  इस सनसेट के पीछे वो फिल्म छोड़ दी ... सनसेट तो रोज़ ही होता है ऐसा क्या है इसमें...
कुछ नहीं ... कुछ भी तो नहीं..
अच्छा ! किसी कि याद आ रही है क्या?
उफ़!!... तुम भी न... और हम दोनों खिलखिलाकर हंस दिए...
जब राजीव टीवी बंद करने गए सूरज कि आखिरी रौशनी मेरी आँखों के भीतर चुपके से आकर कहीं खो  गयी...

Friday, July 30, 2010

2 mahine...

क्या कहू कुछ समझ नहीं आ रहा ... लगभग दो महीने से में लापता हूँ... इतनी गहरी चुप्पी ऐसे ही तो नहीं टूटती ... खैर! दो महीने घर पर आराम से रही ओर सबसे ख़ास बात की मैंने इतना कुछ नया पढ़ा , देखा , जाना की उसे कैसे बयान करू समझ ही नहीं आ रहा... कुछ नोवेल्स और अच्छी चीज़े पढ़ी (कभी मौका मिला तो लिस्ट के साथ अपने विचार भी व्यक्त करुँगी). खाना बनाने में अब परफेक्ट हो गयी हूँ (ऐसा मम्मी कहती है :) ) और ... कुछ लघु कथाये भी लिखी . कुल मिलकर दो महीने घर पर रहना सार्थक हुआ. अब वही दौड़ भाग और पढाई शुरू... ----
 पहला दिन जयपुर में ---- कुछ अजीब सा लगा .. जैसे एक सपना हो...
पहली रात ----- थोडा  अकेलापन लगा ... बेड भी थोडा सख्त था ... फिर भी नींद आ  गयी शायद बहुत थक गयी थी. आश्चर्य है , घर पर सबके रहते लगता था थोड़ी privacy चाहिए ... थोडा टाइम चाहिए ... खुद के लिए... और अब...पता नहीं इतनी याद घर की कभी नहीं आई...

Wednesday, June 2, 2010

एक सूरजमुखी आत्मा : विन्सेंट वान गोघ

http://prosepot.blogspot.com/2010/06/blog-post.html

अभी अभी एक किताब ख़तम की है , "लस्ट फॉर लाइफ" , विन्सेंट वान गोघ , एक डच चित्रकार के जीवन पर आधारित इरविंग स्टोन द्वारा लिखित. दिल में कई भाव उमड़े उन्हें एक आर्टिकल  का स्वरुप देकर उतार डाला.... उपर दिए ब्लॉग लींक पर क्लीक करके आप वह आर्टिकल पढ़ सकते हैं.

Thursday, May 27, 2010

बेजुबान कि जुबानी

मेरी नयी कोमिक्स - पानी बचाने , पानी का सही उपयोग करने एवं पक्षियों को पानी उपलब्ध कराने पर बनायी है. 
सच कहू मुझे नहीं लगता मैंने पहली बार से कोई तरक्की की है पर में खुश हूँ कि आखिर मैंने कोमिक्स बनाने कि कला सीख  कर उसे कचरे में नहीं डाल दिया बल्कि उसका उपयोग किया और उसे जारी रखा... और  कोई भी कला धीरे धीरे ही मंज कर निखरती है... तो मैं आशाओं से भरपूर हूँ... और एक और  खुशखबर यह है कि जल्द ही में अपने शहर में कोमिक्स कि वर्कशॉप आयोजित करने जा रही हूँ.. बड़ो के आशीर्वाद ओर हमउम्र दोस्तों कि शुभकामनाये  एवं साथ चाहिए ...
- ओजसी  

Monday, May 24, 2010

अँधेरा और रौशनी


 तुम इंग्लिश लिटरेचर पढ़ रही हो न ---हाँ ! --- एक बात बताओ --- पूछो ! --- शेक्सपियर इतना महान कैसे बना? --- उसका जीवन मुश्किलों से भरा था पर उसने ज़िन्दगी के अँधेरे से लड़ कर रौशनी को पा लिया था यही कारण है कि उसके नाटक हमें घोर अँधेरे कि गुफा का दर्शन कराते हुए रौशनी का रास्ता दिखा देते हैं--- हम्म! ... तो क्या हार्डी को एक असफल और निचे दर्जे का साहित्यकार मानना चाहिए?--- नहीं! मुझे नहीं लगता कि वह असफल है या किसी भी दृष्टि से शेक्सपियर से निचे दर्जे का साहित्यकार है--- और वह कैसे? ---- उसके उपन्यास के पात्र अँधेरे के तल को छू जाते हैं हालांकि वे रौशनी तक नहीं पहुचते पर वे पूरी कोशिश करते हैं उस रौशनी को पाने कि... इसी बुरी हार में उनकी जीत है ... और  इसी कोशिश में वे अपने भीतर कि किसी रौशनी से मिल पाते हैं --- हम्म! --- आइ होप तुम मुझे समझ रहे हो--- हाँ! में पूरी कोशिश कर रहा हूँ--- (जोर से हँसते हुए) हम्म... मेरी नज़र में हमेशा कोशिश करते रहना ही सफल और सच्चा होना है --- (मुस्कुराते हुए) हम्म! में समझ गया.

Sunday, May 23, 2010

योगी और भोगी

सहर और साशा कि आत्माएँ शायद एक दूसरे कि प्रतिबिम्ब थी . दोनों ही स्वच्छंद रूप से इस प्रथ्वी  पर भ्रमण करना चाहते थे. दोनों ने एक ही बिंदु से अपनी यात्रा कि शुरुआत कि थी. बिना शादी किये वे अकेले अलग अलग घूमते रहे. सहर के कई सम्बन्ध बने ... पर वह एक जगह कभी नहीं टिका ... एक जगह से दूसरी जगह घूमता रहा , सच कि तलाश में... धीरे धीरे लोग उसे योगी बुलाने लगे... उसका सम्मान करते .. उसे आसानी से अपना लेते... योगी का संसार भर में नाम हो गया... साशा भी उसी सच कि तलाश में भटकती रही... उसके भी कई संभंध बने ... वह भी एक जगह नहीं टिक पायी .. भटकती रही ... धीरे धीरे लोगो को उस पर संदेह होने लगा... उसका सम्मान घटता गया .. लोग उससे कटते गए.... लोग अब उसे भोगी बुलाने लगे... अब भी सहर ओर साशा में ज्यादा फर्क नहीं था ... वे एक ही आत्मा के दो प्रतिबिम्ब थे... एक योगी दूसरा भोगी....!!!

Tuesday, May 18, 2010

ग्रासरूट कोमिक्स






यह ग्रासरूट कोमिक्स है. हाल ही में जयपुर में जवाहर कला केंद्र में प्रवाह एनजीओ और कई संस्थाओं के तत्वाधान में आयोजित एक कार्यशाला में मैंने ग्रासरूट कोमिक्स बनाना सिखा था. यह कोमिक्स उसी कार्यशाला में बनायी थी. मेरी पहली कोमिक्स है यह आशा करती हूँ आगे इससे भी कुछ अच्छा कर पाउंगी. :) 

Tuesday, May 4, 2010

मन पतंगा

मन पतंगा जल रहा
में हो रही धुआ धुआ ...
इस जलने में भी क्या नशा सा  है ...

मन पतंगा जब  से  हुआ
जी रहा तेरी रौशनी के दम पे
इस तरह जीने में भी एक मज़ा सा  है...

मेरे पागल मन पर लोग  हँसे
इसकी फितरत पे ताने कसे
में हंसी खूब  हंसी ओर कहती रही
मन तो मेरा पतंगा सा है...
मन तो मेरा....

मन पतंगा जल रहा
दूर जब से तुझसे हुआ...
तेरे होने में तो जलन , न होने में भी पीड़ा है ...
कमबख्त ये पतंगा भी तो एक कीड़ा है...

जलने देना इस पतंगे को
बुझना न लौ तू..
तेरी रौशनी के दम से जी रहा
माना मर रहा है हर घडी ..
पर इस मरने में भी मज़ा सा है...
इस तरह  जीना स्वर्ग सा  है..

Sunday, May 2, 2010

उज्जवल ...

वो लोग सही कहते थे केवल प्यार से पेट नहीं भरता... ओफ्फो ! ये कमबख्त ऑटो वाले रुकते तक नहीं ... गर्मी तो ऐसे बढ़ रही है लगता है सच में दुनिया ख़तम होने वाली है- हो जाये मेरी बाला से तो अच्छा है ये रोज़ रोज़ की आफत छूटेगी. .... "भैया ये लोकी क्या भाव है?" "दीदी क्या आप भी रोज़ रोज़ पूछते हो ..." "अच्छा चल आधा किलो दे दे ओर पाव भर टमाटर  ओर प्याज   भी बाँध देना  " .... आज  तो फिर भी शान्ति है कल से ही मनु तनु की छुटियाँ शुरू होंगी जिद पर लग जायेंगे दोनों - कश्मीर ले चलो , हमें कश्मीर जाना है.. अरे मज़ाक है क्या कश्मीर जाना.. कितना खर्चा होता है उन्हें क्या पता.. ओह ! कश्मीर...सच कितना सुंदर लगता होगा..ओर कबसे मेरा ख्वाब था कश्मीर की खूबसूरती को देखने का.. मैंने तो हनीमून के लिए भी वही जगह सोची थी पर उज्जवल ने हनीमून ही केंसल करा के अपाहिज बच्चो  के स्कूल में दान कर दिए रुपये. .... "ऑटो --- भैया कोयले वाली गली ले चलोगे?... क्या? ३० में ? अभी तो में २५ में आई हूँ  ... अच्छा चलो ...  " जाने किस महान ने इसे कोयले वाली गली का नाम दिया था... शायाद पहले कोयले की खान रही होगी..उफ़ में भी क्या न क्या सोचती रहती हूँ... मनु तनु के आने का टाइम हो गया... रोटियां भी बनानी है. उज्जवल ने भी  कुछ रिपोर्ट्स बनाने को दी थी..  खुद न जाने कहाँ कहाँ घूमते रहते हैं...ओर ये काम.. तंग आ गयी हूँ में इस सब काम से.. हर नौकरी वाले को छुटियाँ मिलती हैं.. कितनी बार कहा था सरकारी नौकरी देख लो .. पर नहीं.. जिद्द ऐसी है की घर बार भी नहीं दीखता... बस पैदा कर दिया बच्चो  को ... सारी जिम्मेदारियां तो अब मेरी ही है न... मेरा तो चलो छोडो .. बिचारे उनके मन की कौन सोचेगा... २ साल से कश्मीर जाने की रट लगा कर रखे हैं.. कहीं भी घुमने ले चलो तो मन बहल जाएगा... पर नहीं... इन्हें फुर्सत ही कहाँ .. अपनी समाज सेवा की पीछे  खुद के बच्चो का कभी नहीं सोचा... "हाँ भैया बस यही.. यही उतार दो.." ... मैंने ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी है.. कभी सोचा था की अपने बच्चो को वो सब दूंगी जो मुझे भी नहीं मिला...यहाँ तो में उतना भी नहीं दे सकी जितना मुझे मिला है... कल से ही नौकरी तलाश करुँगी... उज्जवल के  मूल्यों के पीछे अपने बच्चो की ख्वाहिशों ओर अच्छे भविष्य की बलि नहीं चढ़ा सकती में. ...... "अरे ये घर खुला कैसे है? .... "
 " उज्जवल ! ... उज्जवल  आप इतनी जल्दी आ गए? कल आने वाले थे न... " "हाँ...क्यूँ खुश नहीं हो क्या मुझे देख कर? " .. "ओफ्फो बताइये न... काम हो गया आपका? " "हाँ...लेकिन कल ही आता पर  वो मैंने सोचा एक दिन जल्दी आकर तुम्हारी पेकिंग  में मदद करा देता" "पेकिंग? कौन कहाँ जा रहा है? " "हम सब कश्मीर जा रहे हैं न.." ..... " ओह उज्जवल... आप.. " "हाँ में सच कह रहा हूँ... मेरी पत्नी ओर बच्चो को भुला नहीं हूँ..." "ओह उज्जवल... " "तुम्हारे मन की बात जानता हूँ... ओर जितना तुमने मुझे समझ कर हर कदम पर मेरा साथ दिया है ... इतना करना तो मेरा भी फ़र्ज़ बनता है ..." "उज्जवल मुझे माफ़ करना..." "श्श्श्श ... आइ लव यु " .... "ओह उज्जवल.. आइ लुव यु टू" ...

Saturday, April 24, 2010

पंखो का शरीर

मेरे कमरे के सामने वाले
घर के पीछे
यानी मेरे कमरे के सामने
एक कबूतर के जोड़े ने गीज़र के उपर
डेरा बसाया है ----

कई दिनों बाद आज
मैंने उन्हें गौर से देखा -
कबूतरी परेशान है
कबूतर लाचार है
कबूतरी पेट से है
कबूतर उसके पास है
कबूतरी को एक पल चैन नहीं उसके पंखो में कुछ काट रहा है
कबूतर बिलकुल शांत है
कबूतरी अपनी चौंच से कोशिश कर रही है
कबूतर चुप चाप बैठा उसे ताक रहा है
क्यूंकि कबूतरी परेशान है ,
मुझे लगता है कबूतर थोडा गंभीर है,
में खड़ी खड़ी लाचारी से सब कुछ देख रही हूँ
उससे भी बढ़कर महसूस कर रही हूँ.
रह रह कर "अमेरिकेन ब्यूटी " फिल्म का हीरो याद आ रहा है,
संसार में असंख्य खूबसूरती बिखरी हुई है,
ओर फिर खूबसूरती सिर्फ ख़ुशी से ही तो पैदा नहीं होती न.

कबूतरी उसके पंखो के शरीर में
अपनी चोंच चुभा चुभा कर खुद को आराम दे रही है...

मुझे उसका पंखो का शरीर लुभा रहा है ,
ओर एक अरसे तक में उसे यूँही एक तक देखती हूँ....

Saturday, March 13, 2010

निज भाषा का प्रेम

मन में कई विचार दौड़ रहे हैं ... पढ़ रही हूँ इंग्लिश पर विचार हिंदी भाषा को लेकर हैं. 


क्या हिंदी केवल भाषा है? यही सवाल में इंग्लिश के लिए भी पूछ सकती थी , पर जवाब में तभी दे पाती जब इंग्लिश बोलने वाले देश में रहती. भाषा हमारी संस्कृति से सीधा सम्बन्ध रखती है. किसी भी देश की आत्मा को समझना हो तो उस देश के साहित्य को पढना चाहिए. हिंदी हमारी केवल भाषा नहीं है. कई देशो में हो सकता है की उस देश की भाषा , भाषा से अधिक कोई महत्व न रखती हो , पर हमारे लिए निश्चित रूप से हिंदी का अनूठा स्थान है. मुझे कभी कभी ऐसा लगता है की , ये हमारी गलत धारणा है की हम चीजों को चुनते हैं , सही मायने में चीज़े हमें चुनती है. कहा जाता है , भगवान् जब तक न बुलाये , हम उस मंदिर जा ही नहीं पाते. ठीक उसी तरह , हम चीजों को जितना प्यार देंगे वो हमारी बनकर रहेंगे. हिंदी को हमने बहुत प्यार दिया है , इसे राष्ट्र भाषा बनाने में क्या कसार नहीं छोड़ी , ओर आज तक भी अंग्रेजी के प्रकोप से इसे बचाने के लिए हम इसे अपने गले से लगाए हुए हैं. ये हमारा प्यार है हमारी भाषा के प्रति. ओर देखिये ये हिंदी हमारा प्यार हमें कैसे लौटाती है. किसी से आप दूसरी भाषा में बात करे ओर फिर उससे अच्छी हिंदी में बात करे , आप खुद महसूस करेंगे की हिंदी भाषा से प्रेम की अनोखी धारा बहती है. जाने क्या जादू है इसमें? पर इसके सही प्रयोग करने पर हमे इसमें से संस्कृत जैसा सम्मान ओर उर्दू जैसे मिठास का अनुभव होता है. 


हिंदी के पश्चात अगर कानो को कुछ लुभाता है तो वो है क्षेत्रीय भाषाए . पंजाबी का खुलापन , लड़कपन देखिये , बंगाली का माधुर्य , ब्रज भाषा की तुलना किस्से की जा सकती है . बिहारी बोलना तो लालू की वजह से नया फैशन बन गया था. हाँ मराठी थोड़ी कड़क भाषा लगती है. राजस्थानी जब प्यार से - पधारो महरे देश कहते हैं तो फोरेनेर भी भाव विहल हो जाते हैं. इस देश की एक एक बोली में भी जादो है. लिटररी फेस्ट के दौरान शोभा दे जी ने सही कहा था की - भारत की गली गली में जादू है , हमें जादू - ओर परियो के किस्सों की क्या जरुरत है? 


एक बात इन दिनों मैंने ब्लॉग की दुनिया में गौर की - वह यह की आप इंग्लिश के ब्लॉग पर जाये , किसी की प्रशंसा करे , उसके भावो को सराहे , पर बदले में सिर्फ एक - थैंक्स के कुछ नहीं मिलेगा. ओर यही आप किसी हिंदी ब्लॉगर के साथ करे तो बदले में - धन्यवाद् के साथ - प्रेम मिलेगा, स्नेह मिलेगा, आशीष मिलेगा . हिंदी दिल से दिल को जोड़ने का कार्य करती है. एक हिन्दुस्तानी जब हिंदी में बोलता है तो वह निश्चित ही अपने दिल से बोलता है . हिंदी भाषा से जितना प्रेम आप लुटा सकते हैं , मुझे नहीं लगता अंग्रेजी उसका एक - चौथाई प्रेम भी दे सकती ; कम से कम अन्य भाशिये देश में नहीं दे सकती , उनके देश में हालांकि वह ही भाषा सभी भावो को प्रकट करने का माध्यम है - क्यूंकि वो उनकी निज भाषा है , जैसे हिंदी हमारी है. 
"निज" शब्द से भारतेंदु जी की पंक्तियाँ याद आ गयी - 


निज  भाषा  उन्नति  अहै  , सब  उन्नति  काउ  मूल  
बिन  निज  भाषा  ज्ञान  के  , मिटे  न  हिय  काउ  सूल .



Friday, March 12, 2010

भाषा का द्वंद्व

 परीक्षा शुरू होने में मात्र अट्ठारह दिन शेष हैं. चिंता स्वाभाविक है. पर बैचैनी ओर भी बहुत चीजों की वजह से है . में अंग्रेजी साहित्य की विद्यार्थी हूँ. यह मेरा हमेशा से प्रिय विषय है. पर साथ ही हिंदी साहित्य भी मुझे बेहद पसंद है शायद इसका श्रेय मेरी मम्मी को जाता है जो की हिंदी साहित्य की लेक्चरार है या फिर मेरी रूचि को जिसकी वजह से मैंने दोनों साहित्य  ब. ए तक पढ़े. 


परन्तु अब लगता है बहुत बड़ी गलती की दोनों साथ पढ़कर . एक द्वंद्व सा छा गया है जीवन में. जब कॉलेज में थी तब इंग्लिश की क्लास के बाद इंग्लिश ही बोलती थी , इंग्लिश में ही सोचती थी , ब्रिटेन की दुनिया में खोयी रहती थी , ओर जब हिंदी की क्लास से निकलती , मन में पन्त की , तुलसी दास की पंक्तियाँ घुमती थी .  


दोनों साहित्य पढने से एक अच्छी बात यह हुई की मुझे यह समझ में आया की चाहे वह भारत हो या विदेश ,  मानव मूल्य , उनकी भावनाए सब जगह लगभग एक सी हैं. दोनों साहित्य को  साथ में पढने से एक दुसरे से अच्छे से सम्बंधित कर पायी. एक ओर बात जो मैंने गौर की वह ये की दोनों साहित्य की धारयिएन साथ ही बही या एक का प्रभाव दुसरे पर पढ़ा. जैसे की अमेरिका एवं ब्रिटेन में जब existentialism की लहर आई तो उसका प्रभाव भारत पर पड़ा ओर यहाँ के साहित्य में अस्तित्ववाद छा गया. दोनों साहित्य की एक धारा को पढ़ कर उसे ओर गहराई से समझने का मौका मिलता है. 


लेकिन इसका एक बुरा प्रभाव जो मुझ पर पड़ा है वह यह है की में अपने आपको दो संसार में खोया हुआ पाती हूँ . एक अजीब से द्वंद्व में हूँ. एक ही समय दो विचार आते हैं - दोनों अलग - एक इंग्लिश में तो दूसरा हिंदी में :) अजीब सा मिलन है. हिंदी वाले अंग्रेजी से खफा , अंग्रेजी वाले हिंदी को तवज्जो नहीं देते... ओर में? में बीच में त्रिशंकु बनी हुई लटक रही हूँ. में गलती से लेखीका हूँ दोनों ही भाषाओं की . एक कविता हिंदी में तो उसी समय दूसरी इंग्लिश में बन जाती है. पर में दोनों से ही बराबर प्यार करती हूँ इसीलिए दुविधा ओर भी बढ़ जाती है. कभी एक विचार आता है तो मन सोचता  है - हिंदी में लिखू ? या इंग्लिश में? फिर मना की इंग्लिश में लिखा तो मन करता है इसी को काश हिंदी में लिखती . फिर एक दिल कहता है चलो कोई बात नहीं अब इसे अनुवाद कर लेना.... पर में ओर मेरा आलस ! 


इच्छा है की अंग्रेजी ओर हिंदी की सभी विधाओं में कुछ न कच लिखू. ओर साथ में कभी अनुवाद भी करू - अगर अपनी ही कोई रचना कर सकी तोह बहुत ख़ुशी होगी. ओर अंत में आशा है की मेरा द्वंद्व समाप्त हो , ओर दो  साहित्य की इन दो राहो से अपनी एक नयी राह खोज सकू. 



Thursday, March 11, 2010

ढलते सूरज की यादे ओर नए सूरज का इंतज़ार

ढलता सूरज                                                                         
बुझते  दीपक की लौ के समान
चमका दो पल के लिए
आँखों को चकाचौंध कर 
दिल में उमंग जगाकर
जोश को सिंहासन पर बैठा कर
सपनो में सिरहन पैदा कर
बुझ गया
नहीं! वो सूरज  था
ढल गया.


ये रात क्यूँ आती है?
पर उससे पहले
ये शाम भी तो कुछ गाती  है; 
कुछ उदासी के गीत,
जो बुझे दीपक की लौ पर
उठते धुए के समान 
मन पर काला साया बिखेर देती है...


ये शाम वक़्त से पहले बूढ़े हुए
किसी बच्चे सी गुमसुम रहती है
रात तो फिर भी 
बहुत तो नहीं पर कुछ
आराम सा  देती है...


सूरज ढलने से लेकर 
में उस वक़्त का इंतज़ार करती हूँ
जो इस शरीर के सभी दरवाज़े
हौले से बंद कर
मेरे सपनो में खो जाएगा 
जब तक नया सूरज फिर से आएगा
जब तक कोई उस ढलते सूरज की यादो को मिटाएगा.

Thursday, February 25, 2010

mehndi wali baat ...

कुछ दिन पहले 
मेहँदी लगायी 
बड़े डर के साथ.


सुना था - 
"जिसे मेहँदी नहीं रचती 
उसे प्यार नहीं मिलता"
में जानती थी 
मुझे  मेहँदी नहीं रचती है ...


रोज़ देखती हूँ 
धीरे धीरे
मेहँदी उतर रही है...
हाथ घिस रहे हैं...
कुछ  धब्बे से बनते जा रहे हैं
उँगलियों पर 


कुछ दिनों में मेहँदी 
पूरी मिट जाएगी
कोई निशाँ नहीं रह जायेगा
न ही कोई डर


फिर जी भर के दिल को बेहलाउंगी
देखूंगी अपने  हाथ की ओर
खुद को समझाउंगी 
की तुम हो न मेरे लिए
मुझे प्यार करने के लिए....
मेरा साथ देने के लिए...


हो न तुम ???
तुम हो न!  ये कहने के लिए
की ये मेहँदी वाली बात एक झूठ  है...







Saturday, February 20, 2010

तनहा सफ़र में रात के तारे

जब भी रात के सफ़र में होती हूँ कुछ पंक्तियाँ बन ही जाती हैं... अभी जब में अपने घर से जयपुर आई तो  तारो भरी रात को देख कर ये पंक्तियाँ दिल में उतर गयी जिन्हें मैंने अपने मोबाइल में सेव कर लिया था ---


काली चुनरी में जड़े हुए हीरे से लगे 
मुझको ये रात के तारे 


रात भर  बैठी  गिनती  रही 
क्यूंकि जानती हूँ कटता नहीं ये तनहा सफ़र यूँही


एक तारे से दुसरे तारे के बीच सपनो के जाल बुनती रही 
क्यूंकि जानती हूँ सपनो के बूते भी जी जा सकती है एक लम्बी उम्र .

Thursday, February 11, 2010

ढाई किलो की रजाई

हालांकि मुझे अक्सर चीज़ों से प्यार हो जाता है - अपनी चीज़ों से , और फिर उनसे एक रिश्ता सा जुड़ जाता है पर वो ढाई किलो की रजाई तो में दीदी के लिए लेकर आई थी , उससे भला मेरा क्या रिश्ता? पर कोई रिश्ता तो था और इसीलिए उसे में कभी भुला नहीं पाउंगी.


वो जनवरी के पंद्रह दिन - हाथ का असहनीय दर्द - और ढाई किलो की रजाई. अब शायद आप समझ गए की मेरे और रजाई के बीच क्या रिश्ता होगा... नहीं समझे? :) 


बहुत ही दर्द दिया है  इस रजाई ने मुझे ... पर में क्या कम बेवकूफ थी? दूकान से घर तक वो ढाई किलो की रजाई कंधे पर लाद कर लायी हालांकि इस किस्से से वाकिफ सभी लोगों ने मुझे "कंजूस" समझा - पर में अपने रोमांटिक वर्ल्ड में खोयी हुई थी ... एहसास ही नहीं हुआ इस बात का की ढाई किलो की रजाई उठाने का क्या हश्र हो सकता है . में कभी उन मजदूरों के बारे में सोचती जो दिन भर अपने शरीर पर बोझा  ढोते हैं ... तो कभी उन औरतो के बारे में  जो सुबह चार बजे पनघट पर पानी भरने जाती हैं और बड़े बड़े घड़े सर पर उठा कर लाती है . पर एक दिन बाद जब ढाई किलो की रजाई उठाने की वजह से मेरे हाथ में बहुत ज़ोरों का दर्द उठा - तो मेरे सर से रोमांटिक खयालो का सारा भूत भाग गया. फिर सच्चाई की ज़मीन पर कदम रखते ही मुझे लजाई शरमाई घूँघट में छिपी औरत का घड़े उठाने वाले रोमांटिक द्रश्य की जगह उसके शरीर में उठने वाले दर्द , उसकी परेशानिया , और उसके सुख की नींद के बाधक तत्वों की कहानिया दिखने लगी. 


रजाई से मेरा रिश्ता कुछ यूँ ही बनने लगा ... नफरत का तो सवाल नहीं जो आज तक किसी से नहीं हुई ... प्यार हो नहीं सकता था इतना दर्द जो दिया.... पर थोड़ी तकलीफ देकर ही जो इसने मुझे रोमांटिक वर्ल्ड से निकाल  कर हकीकत से वाकिफ कराया ... इतना सिखाया वो कोई सच्चा गुरु ही सिखा सकता है...  


ढाई किलो की रजाई को एक गुरु के रूप में पाकर निर्जीव वस्तुओं और मेरे रिश्ते की किताब में एक  नया अध्याय जुड़ गया. 

Friday, January 29, 2010

रह रह कर आम की सौंधी महक
मुझे सुहाती है
जून के महीने में लबालब आम से भरे ओठों 
की याद दिलाती है 


वो पापा से जिद्द कर कर
आम की पेटियां मंगाना
वो माँ से लड़ कर भी
आम पर आम खूब खाना


रोना खूब बिलखना
आम का मौसम गुज़र जाने पर
दिन -ब-दिन महीने - दर- महीने
यूँही बिता देना इसके फिर आने तक


आज जब एक पल के लिए
समय ठहरा सा लग रहा है
आम की सौंधी महक
फिर भी मुझे अकेला नहीं छोडती 


बच्ची-सी है ये
कहीं न कहीं से आ जाती है मेरा प्यार पाने
या शायद थोड़ी बड़ी हो गयी है,
जो आती है मेरा साथ निभाने. 

Tuesday, January 26, 2010


"आज़ाद पिंजरे का परिंदा"


क्या वो परिंदा बेजुबा था ? ... बेजुबा तो नहीं था शायद पर उसकी भाषा कुछ भले  इंसानों के परे थी  ... हर किसी का प्यारा वो परिंदा फिर भी पिंजरे में कैद था ... हरे , नीले गहरे रंग का वो सुनहरा परिंदा आँखों का चोर और चाल का सिपाही था ... (सिपाही , क्यूंकि सिर्फ पिंजरे में ही चलने को आज़ाद था )


उसका पहला मालिक भी खूब चालाक  ... लिख दिया पिंजरे पर चाक से - "आज़ाद पिंजरा" , मानो जैसे परिंदा पढ़ लेगा तुम्हारी भाषा और खुश रह लेगा इस "आज़ाद पिंजरे " में ... पर भाईसाहब! जब आप नहीं समझते उसकी भाषा तो ये बिचारा क्या समझेगा आपकी भाषा.. 


खैर! "आज़ाद पिंजरे  का परिंदा " इन भाईसाहब के हाथो से बिका जो इसे बेजुबान समझते थे ... और तब से अब तक ये कई बार बिक चूका है ... उनके हाथो जो इसे बेजुबान समझते थे -   ये "आज़ाद पिंजरे का परिंदा" इक सफ़र पर है - तलाश है इसे एक इंसान की जो समझ सके बस इतना की - ये बेजुबान नहीं ! 
शब्द साथ छोड़ देते हैं...भावनाए रिसती हैं... टप टप दो आँखों  से बहती है ... एक रात ये है ... एक वो रात थी ... अँधेरा दोनों में गहरा बराबर सा था ... पर उस रात तुम्हारी  आवाज़ मेरे साथ थी ... आज की रात बस उसकी गूंज शेष है ...


उस रात को बारह बजे चाँद खिला था ... तुम्हारी आवाज़ सुनकर उसे पलकों से छाना था मैंने  ... मेरी पूजा फिर भी पूरी कहाँ हुई थी? ... तुमने दिल खोला अपना ... मुझे राजदार बनाया... कुछ सपने बांटे ... थोडा ठिठककर .... रुक कर ... अपनी कमजोरियां बताई ... मैंने सुना तुम्हे ... तुम्हारे विचारों की अर्धांगिनी बनी ....पूजा की आखरी रस्म अभी भी बाकी थी ...


आवाज़ ने तुम्हारी चादर बन ढक लिया मुझे ... रात का अँधेरा और भी गहरा गया... प्यार की रस्म पूरी हुई... तुम खुश हुए .. थोडा संतुष्ट हुए... मेरी पूजा पूरी हुई... अब तुम्हारी पलके भारी होने लगी थी ... तुम सो गए थे .. भोर का सूर्य-चन्द्र मिलन मेरी झोली में खुशियाँ भर गया था...


क्या पता था इस झोली भर खुशियों से ही हर रात गुजारनी पड़ेगी....

Monday, January 25, 2010

अक्सर में जानबूझ कर ब्यौरा लगाने छत पर जाती हूँ
और देखती हूँ -


दो पक्षी उत्तर को उड़ते 
एक पक्षी दक्षिण को...
ये नर्म बहती सी धुप,
और ये दोपहर की स्तभ्द्ता
जिसमें चीखती सी कभी कभी
द्रिल्लिंग की आवाज़ 
या अचानक सुनाई देती
पटरी पर दौडती ट्रेन की साज़,
मुझे एक सफ़र पर ले जाती है ...
और उस गाँव छोड़ देती  है ,
जिसमें ऐसे ही किसी दोपहर की स्तभ्द्ता में 
में खुद  को तालाब किनारे बैठा देखती हूँ -


बिखरे सूखे बाल,
लाल कांच की चूड़ियाँ ,
कंधे से सिरकता हरा दुपट्टा ,
पैरों में मैली चांदी की पाजेब,
आँखों की चमक और ओठों पर थिरकती हंसी,
दोपहर की स्तभ्द्ता के बावजूद 
कानो में गूंजता आज़ादी का गीत
जीवन में मिठास घोलने वाला 
दिल के पंछी से मधुर संवाद...


पर अब ये -
आँखों की चमक,
मुक्त हंसी,
आज़ादी का गीत,
और मधुर संवाद,
मिलते हैं  सिर्फ इस सफ़र में
उन चंद पलों में,
जो में चुरा लेती हूँ,
जब छत पर जानबूझ कर ब्यौरा लगाने आती हूँ . 

Saturday, January 16, 2010

Rishton ki uljhan - Rishton ki bikhran

धागों का एक गट्टा
उलझा पड़ा है
पलंग के नीचे कहीं
पहले छोटा था
धीरे धीरे
बड़ा हो गया है
मोटा हो गया है
पहले सुलझ सकता था शायद
अब कोई गुंजाईश नहीं
काटने पड़ेंगे कुछ धागे
एक - एक करके.


कई पत्ते बिखरे थे
कल रास्ते में
बचकर चलना चाहती थी
पत्तों को कुचलना
वो दर्द भरी चीख
अच्छी नहीं लगती.
पर बावजूद कोशिशों के,
दस-पंद्रह तो
मर ही गए ,
बिचारे! पहले से ही
अधमरे थे.

Tuesday, January 12, 2010

स्पेक्स से झांकती वो जुड़वाँ आँखें...

डरी डरी सी सहमी आँखें ,

कहती फिर रूकती कुछ सोचती सी आँखें ।

ख्यालों में डूबी , उडती या तैरती सी आखें,

जागी सी हैं फिर क्यूँ लगे सोती सी आँखें।

रोती रहे फिर क्यूँ दिखे हंसती सी आँखें,

कुछ दिखाती बाकी सब छिपाती सी आँखें।

खुद से जाने क्या बतियाती सी आँखें,

झपकती , खुलती , फुदकती सी आँखें।

मस्ती भरी खिलखिलाती सी आँखें,

कभी कभी छलछलाती सी आँखे ।

प्यार से पुचकारती,

तो कभी शर्माती सी आँखें।

स्पेक्स के दायरे में सिमित ,

एक अलग संसार सी आँखें...

स्पेक्स से झांकती वो जुड़वाँ आँखें...

Tuesday, January 5, 2010

में चाँद हूँ


में चाँद हूँ !


रौशनी से नहाया हुआ,

अँधेरी गुफा में मिटने आया तिमिर का साया।


किसी ने मुझे देखा खूबसूरती के परदे में

तो किसी ने माना मुझे प्रेम रस का प्याला,

पर माधुर्य और सौन्दर्य से अलग,

आज एक रूप मैंने बनाया ।

ओजस्वी चाँद तब में कहलाया...


रौशनी से नहाया हुआ,

अँधेरी गुफा में मिटाने आया तिमिर का साया ।


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