Monday, November 19, 2012

वे दिन ...

तुम यकीन कर सकते हो- मैं फिर से निर्मल वर्मा को पढ़ रही हूँ। मुझे लगने लगा है की जो लोग अकेले रहना जानते हैं (सिर्फ शारीरिक तौर पर नहीं, मानसिक तौर पर भी) उन्हें कोई न कोई अच्छा साथी ज़रूर मिल जाता है। अब देखो ये कितना बड़ा संयोग है (या कुछ और ही - अजीब सा ) की मैं इतने दिन यह किताब पढना टालती रही और आज - आज बहुत रो चुकने के बाद मैंने यह किताब उठायी। मुझे अजीब सा विश्वास है- निर्मल वर्मा पर की बहुत दुःख होने पर अगर उन्हें पढ़ा जाए तो इनका साहित्य दवा  का काम करेगा। ' एक चिथड़ा सुख' में मैं इनके दुःख की परिभाषा अब तक नहीं भूली हूँ। बहुत ही द्र्श्यात्मक, काव्यात्मक, और कल्पनात्मक परिभाषा थी। ऐसी की इंसान पढ़े भी, समझे भी, महसूस भी करे और कभी यूँ ही एक दिन धोखे में उसे जी भी ले .

खैर मैं दुसरे उपन्यास के बारे में बता रही थी। 'वे दिन' पर इन्हें ज्ञानपीठ पुरूस्कार मिला है। और यह पढने का सुअवसर मुझे अपने ही निर्णय के कारन प्राप्त हुआ है। एम् . ऐ (फ़ाइनल) के आखरी पेपर में मुझे कई विकल्प में से एक रचनाकार को चुनना था, सो ये पहले से ही मेरे मन में था की मैं निर्मल वर्मा को चुनुंगी। 

वैसे, मैं अभी तक हर बात बता चुकी हूँ, मुख्य  बात को छोड़कर हा हा ... बात यह है की मुझे नहीं पता था की आज जिस बात को लेकर मैंने इतने आंसू बहाए हैं, यह किताब कहीं न कहीं उसी बात से जुडी है। हाँ, आज एक दोस्त ने बातों ही बातों में मुझसे कह दिया की - मैं खाली बैठी हूँ, और अपना समय नष्ट कर रही हूँ स्वाभाविक था, मुझे बुरा लगा। मैं बहुत रोई, उसने जो कहा उस बात पर नहीं- उससे जुडी कई बातों पर। और फिर ये किताब उठाई एक दो पन्ने पलटे  और - 

"क्या कर रहे हो आजकल?"
"कुछ नहीं, मैं खाली हूँ।" 

... मुझे उससे सहानुभूति हुई। कितना अच्छा है की वह मुझे नहीं जानता। न ही मैं उससे कोई अपेक्षा कर सकती हूँ। बस कहानी के चलते मैं उससे प्यार कर सकती हूँ। और कहानी ख़त्म होने के बाद हमेशा की तरह मेरे भीतर कुछ वहीँ ठहर जायेगा ... उसी समय , उसी जगह , उन्ही लोगों के बीच ... कहानी के अंत को सभी पात्रों की तरह मैं भी स्वीकार करुँगी ... एक मूक असहाय स्वीकृति के साथ ... मैं एक ज़िन्दगी जी चुकी होंगी ... एक दर्द का नया एहसास मेरे भीतर जन्म लेगा  - और समय के साथ वही याद बन जायेगा . हममें से कोई 'जीना सीख  कर नहीं आता ... हम सब यहीं इसी ज़मी पर टुकड़ों टुकड़ों में जीना सीखते हैं ..

Friday, October 26, 2012

मृत्युंजय - एक चरित्र, अनंत कहानी

कर्ण ! अब ये मेरे लिए एक नाम या महाभारत का एक चरित्र मात्र  नहीं रह गया है। 

आज मृत्युंजय  उपन्यास पूरा हुआ। किसी भी कार्य के शुरू होने से उसके पुरे होने की भी एक कहानी होती है। लेकिन आज वह नहीं। यूँ तो विचारों के कई बुलबुले जैसे  कई दिशाओं में फेल गए हैं , लेकिन मैं मात्र एक को लेकर चलूंगी। अब , आखिर, अब भटकना उचित नहीं। 

पांच पांडव या कर्ण  - इनमे से कौन श्रेष्ठ है? ये सवाल नहीं, ये विचारों का जाल है। श्रेष्ठता को सिद्ध करना इतना आसान नहीं और वो करने वाली मैं कुछ भी नहीं - - - लेकिन - - - कर्ण श्रेष्ठ है--- और अगर है तो उसकी श्रेष्ठता का कारण क्या है - - - 

कर्ण का जीवन भयंकर संघर्षमय रहा और यह उपन्यास शत-प्रतिशत उसके संघर्षों को प्रकट करने में सफल रहा है। कर्ण की श्रेष्ठता के कुछ बिंदु जग-जाहिर हैं -वह महा-पराक्रमी , महावीर, अर्जुन से भी कुशल योद्धा था, उसकी ख्याति दिग्विजय कर्ण की जगह दान-वीर कर्ण के कारन हुई, लेकिन इससे भी श्रेष्ठ गुणों से वह युक्त वीर था - वह था - स्थिर बुद्धि, वचन-बद्धता। इसे ही कृष्ण ने आदर्शवादिता कहा है और इसीलिए उन्होंने कर्ण की जगह पांच पांडव को चुनने का बहुत मुश्किल निर्णय लिया। लेकिन इन्ही दो गुणों के कारन कर्ण किसी भी  पांडवों से  सौ गुना श्रेष्ठ है और पांडवों का जयेष्ट भात्र  कहलाने योग्य है। 

संघर्ष -शील , पथ-भ्रष्ट , शापित, परन्तु सत्यान्वेषी, स्थिर-बुद्धि, और एक परम भक्त कर्ण। सुर्यपुत्र  कर्ण की विलक्षणता का परिचय प्रारंभ से उसके कवच्कुंदल के अतिरिक्त इस प्रश्न  से मिलता है  - "मैं कौन हूँ". स्वयम के सत्य को जानने की प्रबल इच्छा। कर्ण की विलाक्षन्त्ता का अद्भुत प्रमाण है - दान देने का प्राण। जिसके चलते उसने अपने कवच-कुंडल इंद्र को दे डाले और मृत्यु-शैय्या पर सोने के दो दांत भी दिए। यह अद्भुत नहीं तो और क्या है, क्या यह सबके बस की बात है? 

सबसे अधिक प्रशंसनीय है उसकी कृतज्ञता जो उसने दुर्योधन का साथ अंतिम क्षण तक निभा कर की। वह यह जानता था की वह पथ-भ्रष्ट हो चूका है, फिर भी उसी पथ पर टिका रहा, लेकिन ससम्मान। यही महत्वपूर्ण है। जो रास्ता आपने चुना है, फिर चाहे धरती ही क्यूँ न हिल जाये , कितनी ही बड़ी विपत्ति क्यूँ न आ जाये, उस पर टिके रहना लेकिन इस प्रकार की आपका सम्मान सुरक्षित रहे। क्यूंकि सम्मान के बिना व्यक्ति उतना ही ठूंठ  है जितना पत्तियों, फूलों के बिना पेड़। 

महाभारत महान पराक्रमी विलक्षण अद्वितीय महा पुरुषों की कहानी है , जिसमे स्वयम भगवन श्री कृष्णा भी एक पात्र हैं। रचनाकार ने जगह जगह एक ही बात दुहराई है, बड़े लोगों के दुःख भी बड़े होते हैं। साथ ही एक और बात जो इस उपन्यास की बहुत बहुत ख़ास है - की मानव रूप में ये देव रुपी महापुरुष भी परिस्थितियों के सामने उतने ही दीन-हीन देखते हैं , जितने की हम जैसे आम  इंसान। सत्य जानने  वाले पितामह भीष्म, यहाँ तक की श्री कृष्ण जिन्होंने स्वयम माया रची है, उनके सम्मुख भी एक क्षण आता है जब वे निर्णय न कर पाने की स्तिथि में होते हैं, वे भी संभ्रांत होते हैं।

 ये देव गुणों वाले ऐसे मानवो की कहानी है जिसमे  सत्यान्वेषी पुरुष सत्य के लिए लड़ते हैं, धर्म के लिए आवाज़ उठाते हैं, कर्म करने को तत्पर रहते हैं,  भ्रमित भी होते हैं, और संघर्षों के मध्य अपने - अपने रास्ते का चुनाव करके लक्ष्य निर्धारित कर उस तक पहुँचने की कोशिश करते है--- क्या हमारी भी कहानी कुछ ऐसी ही नहीं  है?  

Monday, October 15, 2012

अध्-पके विचार - मृत्युंजय (शिवाजी सावंत)

मेरा मन अभी कितने भावों का क्रीडा-स्थल बना हुआ है, मैं बता नहीं सकती। एक लम्बी यात्रा से जब घर पहुंची तो इस बात का अंदाजा भी नहीं था की मम्मी  ने मेरे लिए 'मृत्युंजय' लाकर रखी होगी . न जाने कबसे इस पुस्तक को पढने की हार्दिक इच्छा मन में थी।दो-तीन दिन ही हुए हैं किताब शुरू किये हुए, लेकिन मन में न जाने कितने विचार आ गए।  विचारों की तो छोडिये, न जाने कितने भाव जो किरदारों ने महसूस किये वो मेरे मनचले मन ने भी कर डाले।

मृत्युंजय , महशूर मराठी उपन्यासकार , शिवाजी सावंत द्वारा लिखित एक बेहद लोकप्रिय उपन्यास है। महाभारत की इस व्याख्या का मुख्या किरदार, वो भूला हुआ सूर्य-पुत्र , ज्येष्ठ पांडव कर्ण  है, जिसका जीवन स्वयम में जीवन की एक श्रेष्ठ पाठशाला है। महाभारत को साधारण दृष्टि से देखने पर यह मात्र एक अट्ठारह दिवसीय धर्म-युद्ध हो सकता है परन्तु अन्य महा-काव्यों की भाँती यह भी मानव और नियति सम्बन्धी कई गुत्थियों पर प्रकाश डालता है।

यूँ तो अब तक की कहानी पढ़ कर मन में कई विचार चक्कर लगाते  रहते हैं परन्तु एक विचार जो दिल मैं पैठ सा गया है वह यह की - जब सूर्य-पुत्र , पराक्रमी  योद्धा, दानवीर कर्ण ; अर्जुन जैसा धुनार्धर वरदान प्राप्त कुंती, यज्ञफल स्वरुप जन्मी साक्षात सुगंध की देवी द्रौपदी, धर्म-राज युधिष्ठिर, धीर-गंभीर भीष्म पितामह, और स्वयं भगवन स्वरुप श्री कृष्णा ही जब नियति की डोर से बंधे इस पृथ्वी पर  मात्र कठपुतली से हैं तो हम साधारण कलयुगी मनुष्य इस बात का दंभ कैसे भरने लगे की हम पृथ्वी की सर्वश्रेष्ठ कृति हैं, और इश्वर-नाम की वस्तु  भी शोध  का विषय है। क्या सचमुच ही मनुष्य अपनी मुर्खता की चरम-सीमा पर नहीं है?

महा-मानव होते हुए भी इनके मन में शंकाओं, आशाओं की लहरें उठती हैं, इनका भी संयम डांवाडोल होता है, इनसे भी भूलें होती हैं, पाप होत्ता है, - और अगर ये सब नियति की एक महा-लीला के उद्देश्य से होता है तो हमारे जीवन में भी ये सब किसी योजना के तहत नहीं होता  होगा? पर अगर ऐसा होता भी है तो प्रश्न ये है की - कैकयी ही क्यूँ? कुंती ही क्यूँ? क्यूँ कर्ण ही  ऐसे भाग्य का स्वामी बना? क्यूँ पांडू को ही उस भयंकर श्राप का ग्राही बनना पड़ा ?

खैर! प्रश्नों का अंत नहीं है  ... अब जब उगते सूरज का प्रचंड वैभव देखती हूँ तो, पूरा के पूरा महाभारत आँखों के सामने ऐसा खड़ा हो जाता है मानो ये कल की ही बात हो ... सत्य को पहचानने  के लिए श्रद्धा और आँगन की तरह खुला मन चाहिए, कोई प्रमाण नहीं ...


Friday, August 31, 2012

अमृता प्रीतम : एक मर्द , एक औरत

"तुमने पिक्चर ऑफ़ डोरियन ग्रे पढ़ी है?" मर्द ने पुछा? 
" पिक्चर ऑफ़ डोरियन ग्रे  "? 
"ओस्कर वाइल्ड का मशहूर उपन्यास. "
"मेरा ख्याल है, कोलेज के दिनों में पढ़ी थी, पर इस वक्त याद नहीं...शायद उसमे पेंटिंग की कोई बात थी.."
"हाँ... पेंटिंग की. वह एक बड़े हसीं आदमी की पेंटिंग थी..."
"फिर शायद वह आदमी हसीं नहीं रहा था और उसके सात ही उसकी पेंटिंग बदल गयी थी .. कुछ ऐसी ही बात थी... "
"नहीं, वह उसकी दिखती शक्ल के साथ नहीं  बदली थी, उसके मन की हालत से बदली थी. रोज़ बदलती थी."
"अब मुझे याद आ गया है. आदमी उसी तरह हसीं रहा था पर पेंटिंग के मुह पर झुर्रियां पढ़ गयी थी..."

....

(अमृता प्रीतम : एक मर्द , एक औरत से उद्धरण ) 

 पिछले दिनों में पढ़ी हुई हिंदी कहानियों में से समबसे उम्दा कहानी!!!

अमृता प्रीतम : "सात सौ बीस कदम".

न जाने क्या मन हुआ, निर्मल वर्मा की ' वे दिन' के साथ  अमृता प्रीतम की एक कहानियों की किताब उठा ली - नाम है - "सात सौ बीस कदम". 
अमृता प्रीतम की आत्म-कथा पढ़ी थी - रसीदी टिकिट' तभी से मन में था की इन्हें और पढना है...
अभी सिर्फ दो कहानियाँ पढ़ी होंगी, लेकिन मन में कई विचार आ रहे हैं.  मन में एक तरह का द्वंद्व हमेशा चलता रहता है. एक तरफ मन कहता है, जैसे सब लिख रहें हैं, वैसे तुम भी लिखो , लेकिन फिर, वर्मा और प्रीतम जैसे लेखकों को पढ़कर मन पर लगाम लग जाती है. मन कहता है - नहीं! लिखो लेकिन तब जब शब्द दिल से निकले, अनुभूति में खुद के अनुभवों की महक हो , वही लिखो जो भोगा हो, देखा हो और देख कर दिल बैठ गया हो या आह उठी हो... और लिखकर दिखाओ केवल तब जब खुद को संतुष्टि हो - जब तुमने वैसा लिखा हो, जैसा तुम्हे पढना पसंद हो... 

Monday, August 13, 2012

निर्मल वर्मा - और आत्मालाप

मैंने सोचा नहीं था इतना जल्दी निर्मल वर्मा को पढ़ पाऊँगी, पर हार्डी के बाद उन्हें पढना अच्छा लग रहा है , ऐसा जैसे, 'दुःख' के एक चेप्टर से दूसरे चेप्टर पर आ गयी हूँ... 

बिलकुल अंदेशा न था, पर ऐसा ही हुआ, इस उपन्यास ने मुझे (मेरे अंदर बहुत कुछ जिसे मैंने एकत्रित कर लिया था उसे) decenter कर दिया है. जैसे चार पाए पर खड़े दो लड़खडाते पैरों के निचे से पाए खीच लिए हो...

पूरी रात सो नहीं पायी (उपर से तेज़ थर्राती बारिश की आवाज़..).. पता नहीं रात में मैंने कितनी बार तड़पते हुए, गुस्से में बिलबिलाते हुए खुद से कहा - this text is cruel. ये मुझे अंदर ही अंदर खाते जा रहा था... the narrative is so haunting... जैसे कांच पर ढूंढ़ जम गयी हो ओर साधारण चीज़ भी असाधारण हो गयी हो... just like a blur image...देख लेने पर भी कुछ देखा न हो, बहुत कुछ छुट गया हो ऐसा एहसास - एक अनाम अधूरापन जो खुद की तहों को खोलने-टटोलने की कोशिश करता है - ओर जिसमे बहु पीड़ा होती है ...

वर्मा का यह उपन्यास, सच कहूँ तो, पीड़ा-दायक है, it dissects, चीर-फाड़  करता है . आप चिल्लाते रहेंगे की कोई फोड़ा नहीं है - पर यह जिद्दी है, ढूंढ़ निकालेगा, ओर बिना आपसे पूछे चीर-फाड़ करने लगेगा. 

इस उपन्यास का शीर्षक बहुत disurbing  है - 'एक चीथड़ा सुख' ....
'सुख' भी यहाँ 'दुःख' की चर्चा के बिना अधुरा है. बल्कि मानो 'सुख' दुःख का ही सूचक हो. तीव्र प्यास में दो बूँद पानी की पिने पर-   पीते समय प्यास का एहसास ओर दुगुना हो जाता है. ऐसे ही सुख के दो क्षणों में भी दुःख की छाया आस-पास से घेर लेती है... 
'चीथड़ा' शब्द ही अपने आप में नकारात्मक है... और केवल  नकारात्मक नहीं बल्कि यह हिंसा का भाव भी लिए हुए है. जैसे किसी खूबसूरत रेशमी दुपट्टे को किसी ने बेदर्दी से फाड़ कर हाथ में  एक चीथड़ा पकड़ा दिया हो - भीख में डे दिया हो - एक एहसान की तरह. 
तब क्या वर्मा की भी हार्डी की ही तरह फिलोसोफी है की - 'Happiness is just an interlude in the general drama pf pain'. 

शायद हाँ- शायद नहीं. 

(to be continued...)

Sunday, August 12, 2012

'एक चीथड़ा सुख'

"...उसके ड्राइंग मास्टर क्लास में कहते थे - देखो, ये सेब है. यह सेब टेबल पर रखा है. इसे ध्यान से देखो. सीढ़ी आँखों से - एक सुन्न निगाह सुई की नोक-सी सेब पर बिंध जाती. वह धीरे धीरे हवा में घुलने लगता गायब हो जाता. फिर, फिर अचानक पता चलता - सेब वहीँ है, मेज पर जैसा का तैसा - सिर्फ वह अलग हो गया है, कमरे से, दूसरे लड़कों से, मेज ओर कुर्सियों से - और पहली बार सेब को नयी निगाहों से देखा रहा है. नंगा, साबुत, संपूर्ण, ... इतना संपूर्ण की वह भयभीत सा हो जाता है, भयभीत ही नहीं- सिर्फ एक अजीब - सा विस्मय पकड़ लेता, जैसे किसी ने उसकी आँखों से पट्टी खोल दी है... "  
( 'एक चीथड़ा सुख' , निर्मल वर्मा )

कई दिनों से मेरी नज़र उस पर पड़ी थी. माँ ने देख लिया था मैं उनकी लाइब्रेरी से छेड़खानी कर रही हूँ. जैसे ही उन्होंने मेरे हाथ में निर्मल वर्मा की 'एक चीथड़ा सुख' देखी, उन्होंने सर ना में हिलाया , जैसे उन्हें इस किताब पर मेरा स्पर्श पसंद न हो... उस वक्त मैंने किताब को और दूसरी किताबों के बीच दफना दिया... पर उसी वक्त कहीं मैं दिल में जानती थी की कुछ दिन बाद मैं फिर इसे उठौंगी, ... ओर तब पढने के लिए...
आज सुबह से ही अलसाया सा मौसम हो रहा था... सब सात बजे उठे ओर मैं पांच बजे से ही किताबे खोल कर बैठ गयी थी... अचानक हाथ में 'एक चीथड़ा सुख' उठा ली... धुल से भरी कपडे से पोंछ   पढना शुरू किया...लेकिन धुल गयी नहीं...कागजों पे छितरी थी... शब्दों के भी भीतर...अर्थों में जा छिपी थी... 
सोचती हूँ वो धुल झाड पाऊँगी या नहीं...
अर्थों की परतों से सच्चाई को पाना आसान नहीं हैं...

Friday, May 11, 2012


झूठ और सच के परे
एक आदम कद चेहरा है
जिसके गहन गंभीर भावों में लिखा है - 
"अहम् ब्रह्मास्मि" !!!

Saturday, April 14, 2012

प्रार्थना

खोना व्यर्थ न हो मेरा ;

मेरा खोना भी हो
पाने जैसा ही...


Sunday, April 1, 2012

मैं हूँ भी
और नहीं भी
क्या होने से मेरे
मुझे खुद भी फर्क पड़ता है



In the darkness by ~ThierryV on deviantART

Tuesday, February 21, 2012

इंतज़ार

 



आइ एम रिअली वेरी सोरी , मैं उस दिन घर नहीं आ सका.
नहीं... कोई बात नहीं... मुझे इंतज़ार करना पसंद है
ओह.. सच तुम मेरा इंतज़ार कर रही थी ?
हाँ... शायद... या इस बात का कि तुम आओ ही न और ज़िन्दगी बस यूँही एक इंतज़ार में कट जाये...
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"ज़िन्दगी क्या है?"
"एक लम्बा इंतज़ार ! प्यार... और फिर बिछड़ जाने का डर ..."

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कभी खुद को रोक नहीं पाती और पतझड़ कि टूटी टहनी सी गिर पड़ती हूँ...धीरे से खुद से पूछती हूँ... क्यूँ तोडा वो मौन, वो अंतहीन इंतज़ार...?
... फिर एक हवा कंपकपाती छु कर निकलती है... भीतर ही कहीं से आवाज़ आती है...इंतज़ार का ही नया एक अध्याय शुरू करने के लिए... 




Wednesday, February 15, 2012

सच्चा सुख और सृजन

जीवन के एक सूत्र को भी किसी माध्यम से जाहिर कर देने में कितना सुख है.
सच्चा सुख और सृजन दो अलग बातें हो ही नहीं सकती.
चाहे किसी कला के माध्यम से सृजन हो
या प्रेम में अभूतपूर्व क्षणों का सृजन हो
हमेशा सृजन में सच्चा सुख छिपा होता है.

Friday, February 10, 2012

शेखर एक जीवनी: जीवन अभी और भी बाकी है...

शेखर चलता रहा चलते चलते जब थक गया तो भी बैठा नहीं सिर्फ रुक गया पर चलने की प्रक्रिया को मन में दुहराता रहा चलना ज़रूरी हो गया था ... हो जाता है कभी कभी...
"इट्स डल टू थिंक अबाउट आईदीअलिजम" !
शारदा ! शान्ति ! शशि ! मन में कोई हंसा , क्या तुने सभी को अपने अंश के रूप में ही  चित्रित किया? हाँ उससे परे मन देख भी कहाँ सका है? पर...

साहित्य ! साधना ! सेवा ! पुरुष होने का दंभ. कुछ है जो मैं समझ नहीं पा रही. कुछ है जो मैं समझना नहीं चाहती. सहानुभूति  नहीं पैदा करना चाहती मन में शायद. शेखर इन सब से कुछ उपर है.

बेचने के लिए लिखा हुआ साहित्य नहीं. ये द्वंद्व ! ... वह इक्कीस  साल का शेखर और... एक पोथा लिखा "हमारा समाज' , कितने में बिकेगा, दो रूपए. हूँ. और फिर दुनिया बदल जाती है. 'हमारा समाज' बिक जाता है. बेच दिया जाता है. समाज में कितना कुछ है जिसे बदलने की आग मन में धधकती है. पर यहाँ ... सबसे मन दूर चला जाता है.. निरे अन्धकार में...

एक बचकानी सी बात मन में आई है...शेखर के आगे की जीवनी लिखूं. या क्यूँ न शशि की ही एक जीवनी लिख डालूं कितना कुछ होगा शशि के मन में, हृदय में जो शेखर नहीं लिख पाया होगा... पर नहीं...अभी जीवनी या आत्म-कथा का समय नहीं... अभी मिटटी को और रोंदना बाकी है... जीवन अभी और भी बाकी है...

(अज्ञेय द्वारा लिखित, शेखर एक जीवनी से प्रेरित भाव)


Thursday, February 2, 2012

बाणभट्ट कि आत्मकथा - महामाया


महामाया  - "पुरुष वस्तु-विछिन भाव रूप सत्य में आनंद प्राप्त करता है, स्त्री वस्तु-परिगृहीत रूप में रस पाती है. पुरुष निःसंग है , स्त्री आसक्त, पुरुष निर्द्वंद्व है, स्त्री द्वन्द्वोमुखी , पुरुष मुक्त है स्त्री बद्ध. पुरुष स्त्री को शक्ति समझ कर ही पूर्ण हो सकता है, पर स्त्री , स्त्री को शक्ति समझ कर अधूरी रह जाती है. ...
तू क्या अपने को पुरुष और मुझे स्त्री समझ रहा है?  मुझमे पुरुष कि अपेक्षा प्रकृति कि अभिव्यक्ति कि मात्र अधिक है , इसीलिए मैं स्त्री हूँ. तुझमे पृकृति कि अपेक्षा पुरुष कि अभिव्यक्ति अधिक है , इसीलिए तू पुरुष है. "

"...परम शिव से दो तत्त्व एक ही साथ प्रकट हुए थे - शिव और शक्ति. शिव विधिरूप है और शक्ति निषेधरूपा. इन्ही दोनों तत्वों के प्रस्पंद-विस्पंद से यह संसार आभासित हो रहा है. पिंड में शिव का प्राधान्य ही पुरुष है और शक्ति का प्राधान्य नारी है. ... जहाँ कहीं अपने आप को उत्सर्ग करने कि, अपने-आपको खपा देने कि भावना प्रधान है वहीँ नारी है. जहाँ कहीं दुःख सुख कि लाख लाख धाराओं में अपने को दलित द्राक्षा के समान निचोड़ कर दूसरे को तृप्त करने कि भावना प्रबल है , वहीँ 'नारी-तत्त्व' है. नारी निःशेधरूपा है. वह आनंद भोग के लिए नहीं आती, आनंद लुटाने के लिए आती है. आज के धर्म-कर्म के आयोजन, सेन्य संगठन और राज्य विस्तार विधि रूप हैं, उनमे अपने आपको दूसरों के लिए गला देने कि भावना नहीं है इसीलिए वे एक कटाक्ष पर ढह जाते हैं , एक स्मित पर बिक जाते हैं. वे फेन बुदबुद कि भांति अनित्य हैं. ... " (बाणभट्ट कि आत्मकथा)

गुनाहों का देवता

 बड़ा अद्भुत है ये! एक माँ अच्छे से जानती है बच्चे को कब क्या खुराक देनी है वैसे ही भगवान् जानते होंगे कि मन को कब किस खुराक कि जरुरत होती है. इस महीने दो अद्भुत  पुस्तकें पढ़ी. एक, बाणभट्ट कि आत्मकथा, जिसने ये बताया कि , स्वयं को निःशेष भाव से दे देना ही वशीकरण है. दूसरी, गुनाहों का देवता, जिसने ये बताया को स्वयं को निःशेष भाव से कैसे दिया जाता है. मन में कब से इच्छा थी धर्मवीर भारती कि , गुनाहों का देवता पढने कि, पर पढने के बाद मन अजीब सा हो गया है. मैं यह तय नहीं कर पा रही हूँ कि ऐसा क्या था इसमें जिसने मुझे छू लिया हो या मुझसे कुछ मेरी ही भूली कहानी कह दी हो. हाँ! इसे पढ़ते समय कुछ ऐसा लगा -  जब स्वयं का ही जीवन एक प्रेत कि गुफा जैसा हो, मन ने कभी देवता कि प्रतिमा खंडित कर मंदिर को अपवित्र कर दिया हो,और  गुनाहों का देवता जब खुद में कहीं ही बसा हो तो उसे अक्षरों में पढने कि क्या जरुरत.  खैर! उपन्यास पड़ने का बाद अब मुझे लेश मात्र भी आश्चर्य नहीं कि क्यूँ यह इतना प्रसिद्द है.

" ये आज फिजा खामोश है क्यूँ, हर ज़र्र को आखिर होश है क्यूँ?
 या तुम ही किसी के हो न सके, या कोई तुम्हारा हो न सका." 

ये कोई और समय होता तो मन कहता - यही तुम्हारा भी रास्ता है. तुम्हे भी खुद को मिटा देना है. जो रौशनी तुम्हे मिली है उसे लुटा देना है. पर कोई रौशनी मिली ही कहाँ है? और मन पहले ही संभल भी गया है, अब वह कहता है कि वो लेखक का सच है या किरदारों का पर तुम्हारा नहीं. तुम्हे अपना सच स्वयं ढूँढना है. अभी कुछ ही समय में तुम्हे भी घर से विदा लेनी है. अपनी आँखे वक़्त पर खोल लो कहीं ऐसा न हो कोई सपना धीरे धीरे टूट रहा हो और तुम उसके बिखरने से पहले अपना होश भी न संभाल पाओ. मुझे गेसू कि याद हमेशा आती रहेगी. 

उपन्यास में मेरा सबसे प्रिय प्रसंग शायद वह है जब बर्टी अपने तोते को मार देता है. तीन गोलियां चलती हैं और तीसरी गोली से आखिर तोता मर ही जाता है. दरअसल यह सांकेतिक प्रसंग है. तीन गोलियां , सुधा, बिनती और प्रमीला है, और तोता चंदर. बर्टी इसके बाद दर्शन कि गूढ़ बातें करने लगता है पर वह जो उदाहरण देता है उससे इस संकेत का प्रमाण मिल जाता है - " हर एक कि ज़िन्दगी का एक लक्ष्य होता है. और वह लक्ष्य होता है सत्य को , चरम सत्य को जान लेना. वह सत्य जान लेने के बाद आदमी अगर जिंदा रहता है तो उसकी यह असीम बेहयाई है. ... मसलन तुम अगर किसी औरत के पास जा रहे हो या किसी औरत कि पास से आ रहे हो और संभव है उसने तुम्हारी आत्मा कि हत्या कर डाली हो..."

... आत्मा कि हत्या... इससे सुधा का एक और उदबोधन याद आता है , " चंदर, मैं तुम्हारी आत्मा थी. तुम मेरे शरीर थे. पता नहीं हम लोग कैसे अलग हो गए. तुम्हारे बिना मैं सूक्ष्म आत्मा रह गयी. शरीर कि प्यास, रंगीनियाँ मेरे लिए अपरिचित हो गयी...और मेरे बिना तुम केवल शरीर रह गए. शरीर में डूब गए... पाप का जितना हिस्सा तुम्हारा उतना ही मेरा है.. पाप कि वैतरणी के इस किनारे जब तक तुम तडपुंगी,तभी तक मैं भी तडपुंगी  ..." 

देवता तो तुम रहे पर कुछ गुनाह तुमसे हो गए. पर भक्त को देवता का हर गुनाह क्षम्य होता है. वरना कौन राम को पूजता और कौन कृष्ण को. आज मुझे जाने क्यूँ वेन गोघ भी याद आ रहे हैं. अंतर्द्वंद्व भले ही जीवन में कितने भी हो और भिन्न हों सभी कि राहें अंत में एक सत्य के प्रकाश स्तम्भ तक जाती हैं. पता नहीं क्यूँ, उपन्यास खत्म होने पर भी इसके अधूरे होने का आभास सा लग रहा है , लग रहा है जैसे एक कहानी कहीं कोई अभी भी अधूरी है...

Sunday, January 29, 2012

बाणभट की आत्मकथा

ऐसा अक्सर कम ही होता है की कोई किताब पढ़कर एक सिरहन सी पुरे शरीर में दौड़ जाती है. मुझे याद है पिछली गर्मियों की छुट्टी में 'लस्ट फॉर लाइफ' पढ़कर मै इतनी खो गयी थी की खुद को रोक ही नहीं सकी और जैसे ही बुक ख़त्म हुई अपने विचार लिख डाले. आज भी जब वो लेख पढ़ती हूँ तो लगता है की वो शब्द मेरे अंदर की गहराइयों से निकले थे और सूरजमुखी की भांति खिल गए थे. ऐसी ही अंदर तक झकझोर देने वाली किताब मैंने इन दिनों पढ़ी, 'बाणभट की आत्मकथा", हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित. 

कई बार जो विचार अंग्रेजी उपन्यास पढ़कर समझे वही अपनी भाषा में पढ़कर ऐसा लगा मानो ऐसा पहले कभी नहीं पढ़ा. भारत की भूमि ऐसी है की यहाँ जन्म लेने वाली हर स्त्री खुद को किसी न किसी अपराध की दोषी मानती है. सदियों से उनके मस्तिष्क में ये बात घुसा दी गयी है की उसका स्त्री होना ही अभिशाप है, उसकी देह अशुद्ध है और वह माया स्वरूप है. पर इस चंचल मना के बारे में लेखक नयी ये नयी बात बताते हैं- 
"साधारणतः जिन स्त्रियों को चंचल और कुलभ्रष्ट माना जाता है उनमे एक देविय शक्ति भी होती है."

संपूर्ण उपन्यास में एक तरह का द्वंद्व लक्षित है. सभी पात्र सत्य के पूर्ण रूप को प्राप्त कर लेना चाहते हैं, इश्वर को प्राप्त कर लेना चाहते हैं, परन्तु इश्वर है कहाँ? धर्म में? शास्त्र में? संसार में? कर्त्तव्य में? प्रेम में? कहाँ है इश्वर? सत्य क्या है? अघोरभैरव बाणभट को उसका सच इन शब्दों के माध्यम से दिखाते हैं ,

 "देख रे, तेरे शास्त्र तुझे दोखा देते हैं. जो तेरे भीतर सत्य है उसे दबाने को कहते हैं; जों तेरे भीतर मोहन है उसे भुलाने को  कहते हैं; जिसे तू पूजता है उसे छोड़ने को  कहते हैं. ... इस ब्रह्माण्ड का प्रत्येक अणु देवता है. देवता ने तुझे जिस रूप में सबसे अधिक मोहित किया है उसी की पूजा कर." 

मनुष्य कितना अँधा  है. जिसे धर्म समझ कर पूजता रहता है वो सच्चा धर्म नहीं होता और जिसे अधर्म समझ कर  छोड़ देता है वही उसका  सच्चा धर्म होता है. धर्म सर्वथा नियम और आचार में बंधा नहीं होता. उसे मन की आँखों से परखना और आत्मा की कसौटी पर जांचना होता है . हर मनुष्य का सत्य अलग होता है या यूँ कहना उचित होगा की सत्य हर मनुष्य के समक्ष  भिन्न रूप में प्रकट होता है. सुचरिता कहती है , " क्यूँ नहीं मनुष्य अपने सत्य को अपना देवता समझ लेता है , आर्य?" ... "मन बड़ा पापी है, गुरुदेव, वह कब मनुष्य को नारायण रूप में देखेगा." 

बाणभट भोला था, आदि से अंत तक पाषाण रूप था, पर वह भोला पाषाण था, अक्सर जिन पाषाणों से देवताओं की मूर्तियाँ बनती हैं. हृदय के भीतर की आवाज़ सुन पाना और उस पर अमल कर पाना भी तो हर मानुष देव के बस की बात नहीं. परन्तु अक्सर स्त्रियों के भीतर की शक्ति पुरुष शक्ति से अधिक होती है. चाहे प्रेम में उत्सर्ग करना हो या रणभूमि में बलिदान देना हो स्त्रियों में देवीय गुणों की प्रधानता होती है. महाराज महामाया के मोह में तो बंधे थे परन्तु उन्हें उनका सच एक योगी दिखता है, " रानी को तुमने कभी छोड़ना नहीं चाह; पर तुमने कभी उसे अपनाने का भी प्रयत्न नहीं किया... तुमने न तो अपने आप को निः शेष भाव से दे ही दिया है, न दुसरे को निः शेष भाव से पाने का ही प्रयत्न किया."

निपुनिया का त्याग इस सन्दर्भ में अतुलनीय है. जीवन में जिस पथ पर वह चलती रही उसका उचित अंत भी उसने ढूंढ़ निकला और अपना जीवन सफल बना लिया. "अपने को निः शेष भाव से दे देना ही वशीकरण है" 


 




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