Thursday, March 11, 2010

ढलते सूरज की यादे ओर नए सूरज का इंतज़ार

ढलता सूरज                                                                         
बुझते  दीपक की लौ के समान
चमका दो पल के लिए
आँखों को चकाचौंध कर 
दिल में उमंग जगाकर
जोश को सिंहासन पर बैठा कर
सपनो में सिरहन पैदा कर
बुझ गया
नहीं! वो सूरज  था
ढल गया.


ये रात क्यूँ आती है?
पर उससे पहले
ये शाम भी तो कुछ गाती  है; 
कुछ उदासी के गीत,
जो बुझे दीपक की लौ पर
उठते धुए के समान 
मन पर काला साया बिखेर देती है...


ये शाम वक़्त से पहले बूढ़े हुए
किसी बच्चे सी गुमसुम रहती है
रात तो फिर भी 
बहुत तो नहीं पर कुछ
आराम सा  देती है...


सूरज ढलने से लेकर 
में उस वक़्त का इंतज़ार करती हूँ
जो इस शरीर के सभी दरवाज़े
हौले से बंद कर
मेरे सपनो में खो जाएगा 
जब तक नया सूरज फिर से आएगा
जब तक कोई उस ढलते सूरज की यादो को मिटाएगा.

4 comments:

  1. आशा की किरण के बारे में सोचना भी, कभी कभी भारी वेदना को भी कम करती है ! शुभकामनायें !

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  2. उम्मीद के सुर कुछ कम हैं...देखिए!यूं कम ना होने पाएं...। अच्छा लिखा.

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  3. @ sateesh ji - Aapne bilkul sahi kaha - phir umeed per to duniya kayam hai ... is aasha ki kiran ka hi sahara hai. :)

    @ shukla ji - Jaane kyun aapka comment dwiarthiya laga raha hai ... agar kavita ki lay taal kam hai - to sach kahu dil se nikli- nikal gayi - lay taal kam hone ki wajah shayad udaasi thi... jo bina sangeet ke chaayi thi so use please ignore karne ka kasht kare... aur rahi baat umeed ke kam na hone ki to bhagwan per bharosa hai - sab theek hi hoga :)
    comments ke liye dhyanawaad!

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  4. .. बहुत सुंदर ....रचना....

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