Wednesday, December 29, 2010

याद

बहुत  दिनों  बाद
वे मुझे  फिर याद   आई
जिन्हें  मैंने  तीन  अप्रेल  कि शाम  को 
पहली  बार  उसी रेस्टोरेंट में देखा  था 
और  उसके  बाद  शायद  एक  या  दो  बार  और देखा हो  
एक  सुंदर  कांच  के  महल  में  कैद 
वो  एक  सुनहरी  और  एक  चमकीली  मछली .

एक  बक्से  में  बंद 
बिना  गुनाह  के  सजा  झेलती 
उपर  से  नीचे 
नीचे  से  उपर चक्कर काटती  
बक्से  से  निकलने  को  बैचेन  मन ...

मैं  बहुत  दूर  बैठी  उन्हें  ताकती  
और  कुछ   सोच  न  पाने  कि  स्तिथि  में  थी 
कोई  चीज़  थी  हमारे  बीच 
एक सी   
ज़िन्दगी  में  कैद  फिर   भी 
ज़िन्दगी  से  दूर 
ये  तड़प  थी  
बन्धनों  की  . 

उन मछलियों   की  याद  
अभी  भी   ज़ेहन  में  किसी  
जिंदा  तस्वीर  कि  तरह "कैद" है.

4 comments:

  1. "कोई चीज थी हम दोनों में एक जैसी,

    जिन्दगी में कैद फिर भी जिन्दगी से दूर"

    निशब्द करती पंक्तियाँ.....

    मछली के दर्द को समझा आपने...और अपना दर्द समझा..क्या बात है जी,

    कुंवर जी,

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  2. अच्छी सोच को असल ज़िन्दगी से जोड़ा है आपने..
    अच्छी कृति...

    आभार

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  3. स्तिथि ...स्थिति
    जिंदगी में कैद फिर भी जिंदगी से दूर ...
    मार्मिक !

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