कुछ मासूम से गुनाह मैं आज कबूल करती हूं तुमसे बातें की मैंने बिना तौल औ' बेतुकी जैसे तुम हो ही न वहां मैं खुद से ही करती थी बातें तुमसे सपने किए साझा और सोचा नहीं कि सपने तो किस...
रूह मेरी गिरवी रख लो तुम और बदले में कुछ भी देना नहीं ये तन तो मिट्टी की तिजोरी है और मुझे संभालना ही कब आया कीमती चीजों को कभी मेरा तो सब कुछ लूट ही जाना है लूट ही जाएगा तमाम ख्वाहिशें, उमंग और जीने की चाह भी एक दिन बिक जाएगी लेकिन रूह बचेगी तुम्हारे पास और कीमत उसकी बढ़ती ही जाएगी रूह मेरी गिरवी रख लो तुम और बदले में कुछ भी देना नहीं
तुम्हारे बारे में सोचते हुए मैं अक्सर उसी के बारे में सोचती रही हूँ और यह भी कि प्यार क्या ऐसा ही होता है... कि सदियों तक तुम्हारे नाम कोई जुदा न कर पाए कि मरने के बाद भी वो वहीं रहे, बिल्कुल वैसे ही हमेशा की तरह कि वो अनजाने ही तुम्हारी पीठ पर किसी और का नाम लिख दे और तुम फिर भी उससे बेपनाह मोहब्बत करो क्यूंकि उसकी मोहब्बत भी उसकी है और तुम भी कि तुम पेंटर से कवि बन जाओ और वो कवि से एक औरत - जो इश्क़ में मुकम्मल हो गयी है प्यार क्या ऐसा ही होता है इमरोज़? तुम्हारे बारे में सोचते हुए फिर अक्सर मैं उसके बारे में सोचने लगती हूँ.