बाबा

दस दिन हो गए थे बाबा को ऐसी हालत में हालांकि उसे यहाँ आये २-३ दिन ही हुए हैं। सब कुछ ठहर-सा गया था ज़िन्दगी में। फिर भी इतनी भगा-दौड़ी थी। रूम से अस्पताल , अस्पताल से दवाईखाना ,हाल से आइ.सी.यु , आइ.सी.यु से कमरा, इसे फोन करो, उसे सूचना दो , इससे डाक्टर के पते लेना और बस ये सिलसिला चलता ही रहता जब तक एक भारी पत्थर सर पर न महसूस होने लगे कि - 'अब क्या?' कैसे किसी और की ज़िन्दगी का फैसला किसी और के हाथों में आ जाता है। जैसे ज़िन्दगी नहीं खेल हो -तीन एम्पायर ने फैसला लिया, बस आप 'आउट ' । पर उसके बाबा के लिए यह फैसला किया गया था कि उन्हें 'और खेलने देना चाहिये ' . नहीं ये खेल तो नहीं , यहाँ तो सब कुछ बहुत ' सीरियस ' है। इतना बड़ा निर्णय, इतनी बड़ी जिम्मेदारी, इतना खर्चा, और फिर। ... यह क्रिकेट ग्राउंड नहीं समाज है। उसकी अंग्रेजी वाली मेडम कहा करती थी - 'कन्वेंशंस ! कन्वेंशंस माई डियर। 'कई खांचे, कई खूँटियाँ। .. पहले से तय निर्णय वहां टंगे हैं - कोई चुनाव नहीं है - ये निर्णय हैं,ऐसे ही हैं,और ऐसे ही लेने पड़ेंगे. ऐसा क्यों है? किसने बनाया? ये सब फ़ालतू की बातें हैं।
... एक पल को वह ठिठका , बाबा ने आँखें खोली थीं। आस-पास सन्नाटा था। ...घडी में लगभग रात के डेढ़ बजे होंगे उसे लगा बाबा को कुछ चाहिए होगा पर। ... बाबा शांत थे। .. हमेशा की तरह। कुछ पल छत को सुनी आँखों से ताकते रहे फिर एक निगाह उस पर डाली। वह कुछ कह पाता इससे पहले उन्होंने आँखें बंद कर लीं। जाने क्यों उसे ऐसा लगा कि बाबा को तकलीफ हो रही है - वो इस पीड़ा से मुक्ति पाना चाहते हैं ,पर उन्हे इसकी आज़ादी नहीं है। उस क्षण को उसे लगा - यह पीड़ा है। ... हर पीड़ा से बड़ी - जीवन और मृत्यु के बीच निहायत तीन बिंदी ...
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