Sunday, October 3, 2010

सिल लिए हैं मैंने होंठ अपने अब



मेरे शब्दों को तुम पसंद नहीं,
और तुम्हे मेरे शब्द.
सिल लिए हैं मैंने  होंठ अपने अब. 

चुप रहते रहते सारे, 
कहीं खो गए हैं शब्द,
सिल लिए हैं मैंने होंठ अपने अब.

दीवारे ताकती हैं मुझे ,
तकिये पर टपकते हैं शब्द,
सिल लिए हैं मैंने होंठ अपने अब.



3 comments:

  1. चुप रहते खो गए सारे शब्द ...
    इतना चुप भी ना रहो कि खो जाएँ सारे शब्द ...
    इतना मुखर भी नहीं कि ख़त्म हो जाएँ सारे शब्द ...
    तकिये पर बिखरे शब्द उठाये तो ये कविता बन ही गयी ..
    और बनती रहे ..
    शुभकामनायें ...!

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  2. shabd bhi ajib hain
    kabhi khilte juba par
    to kabhi bandish hain
    armano me .........

    par ek sach inka
    ye badal dete halaat
    aur na kuch ho
    ye dete hain saath.....

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  3. वाणी गीत से सहमत हूँ , संवादहीनता की स्थिति वास्तविकता से दूर ले जायेगी ...लिखती रहें !
    शुभकामनायें

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