पता नहीं
"कभी कभी फैसले लेना कितना मुश्किल हो जाता है न... खासकर जब दो चीज़ों में से एक को चुनना हो - एक गलत और दूसरा सिर्फ एक एहसास ... जो न सही लगता हो न गलत... बताओ न अगर तुम्हे चुनना हो तो तुम किसे चुनोगी?" "मैं?... पता नहीं." "अरे... कुछ भी पूछो तो तुम्हारा एक ही जवाब होता है - पता नहीं." मुस्कान जोरों से हंस दी. "मैं तो ठहरी एक बेवकूफ तुम्ही बता दो न." "उम्... मैं ?... अगर एहसास विश्वास पर टिका हो तो एहसास को चुनुँगा." "और अगर विश्वास ठहरता न हो तो?" विशाल ने एक पल मुस्कान कि आँखों में झाँका , मानो कुछ अनकहा पढ़ लेना चाहता हो... मुस्कान उसी मासूमियत से उसे देखती रही. विशाल कुछ कीमती न ढूंढ़ पाने के कारण छटपटा रहा था ... मुस्कान ने आँखों से इशारा में ही पुछा कि क्या हुआ... तब विशाल धीरे धीरे सोचते हुए बोला - "विश्वास को दृढ बनाना एक चुनौती है , एक परीक्षा है और शायद इसी परीक्षा में सफल होने पर हमें वो मिल जाए जो हमें चाहिए." विशाल अभी भी प्रश्न भरी नज़रों से मुस्कान को टटोल रहा था... मुस्कान कुछ उलझी उलझी थी अचानक से...