Wednesday, June 8, 2011

खिड़की के कांच से आती 
पीली रौशनी में
कमरे के खालीपन को 
थकी आँखों से नापती रहती हूँ...
जीवन निरुद्देश्य सा लगने लगा है.
इसीलिए नहीं की किस्मत साथ नहीं, 
पर अब वे दिन नहीं रहे
जब प्यार के दो शब्द ---
दिन की खुराक मिला करती थी.

10 comments:

  1. कुछ रोज़ हुए
    वो झरना धीमे बहता हैं
    हलके हलके न जाने
    क्या क्या सहता हैं?

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  2. बहुत सुंदर ...

    झरना कहाँ कुछ सहता है
    दर्द का भी एक संगीत
    झरने के संग बहता है... :)

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  3. क्यों रोके निश्चल,
    निर्झर खुद को?
    बह जाने दे
    सुख को, दुःख को.

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  4. बह जाना ही होता गर
    सुख और दुःख को
    क्यूँ कोई झरना बहता
    इस रुख को...

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  5. निर्झर तो बेसुध बहें
    जो जोगी रमता रंग
    वो परवा क्यूँ करें
    जो सुखदुःख होवे संग?

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  6. दुःख जब पी ले मन निर्झर
    तब निखरे दिन औ दिन पर ...

    :) well I have really given - up... you are a too gud a poet to have contest with :)
    Take care!

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  7. (: damn me if I even think of Contesting u

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  8. :) but i was perplexed , who could , not even think of contesting with me... do you have any idea of that person?

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  9. I wish I had...

    But you know what I love IDEAS (:

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  10. Umm... Ideas sometimes kill me...
    I want to be away from them , but they find me anyway...

    Anyway , if you happen to meet the Anonymous , please thank him to have increased my interest in this blog. :)

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