Saturday, June 4, 2011

बहुत कोशिश कि

बहुत कोशिश कि 

खोला करूँ शाम को खिड़कियाँ
क्यूंकि सूरज कभी डूबता नहीं

एक परछाई बनी रहूँ
क्यूंकि साए कभी कुछ कहते नहीं

वो लकीरें मिटा दूं
तुम्हारे चेहरे से जो तुम्हारी नहीं ,और मेरी नहीं

ओर वो तारे भी
जो कभी सपने बन गए थे हमारी आँखों के



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