Thursday, January 8, 2015

अन्या से अनन्या


प्रभा जी का सिर्फ एक उपन्यास पढ़ा था और लगा की इनकी आवाज़ मेरी आवाज़ से मिलती  है।  वो भी मारवाड़ी समाज , रीति -रिवाज़ों , और महिलाओं की स्थिति के बारे में लिखतीं हैं और मैं भी संस्कृति और महिलाओं के बारे में विचार करती हूँ। इन पर पी.एच डी करने में तो मज़ा आएगा। लेकिन प्रभा खेतान जी की आत्मकथा (अन्या से अनन्या ) पढ़कर  बेहद झटका लगा।  एक ऐसी छवि के साथ मेरा नाम हमेशा  लिए जुड़ जायेगा मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।


 ऐसा सुना था कि  प्रभा खेतान की आत्मकथा बहुत बोल्ड है।  लेकिन उनकी आत्मकथा पढ़ कर मुझे कहीं भी ये नहीं लगा कि 'कुछ ज्यादा' कहा  गया है बल्कि यही लगा कि 'ज्यादा को सीमित  ' करके कहा गया है।

मैं जिन पर शोध करने जा रही हूँ वह एक ऐसी महिला हैं जिनका व्यक्तिगत जीवन उहापोह और लीक से हटकर रहा है।  मारवाड़ी समाज की यह महिला बंगाल में न केवल उच्च शिक्षा प्राप्त करती हैं बल्कि विवाह संस्था को ठुकरा कर अपने से 18 वर्ष बड़े विवाहित और पांच बच्चों के पिता से प्रेम कर बैठती हैं।   ज़िन्दगी उन्हें समर्पित कर  देती हैं।  चूँकि वह उस व्यक्ति पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं रहना चाहती इसीलिए वह पहले एक हेल्थ क्लब खोलती हैं तथा फिर चमड़े की वस्तुओं के निर्यात का व्यवसाय करती हैं।  आजीवन ' दूसरी औरत ' का ठप्पा न केवल इन्हे घोर मानसिक कष्ट देता है बल्कि इनके आत्मविश्वास को भी झकझोरता रहता है।

आत्मकथा लिखना हर किसी के लिए अलग मायने रखता है।  मेरे ख्याल में इनके लिए आत्मकथा लिखना एक कथार्सिस था।  बेहद जरुरी क्यूंकि दुनिया ने इन्हे जो कुछ भी समझा लेकिन  ठीक नहीं समझा, और  आत्मकथा तो खुद ही को समझने की और स्वयं का विश्लेषण करने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।  प्रभा जी की आत्मकथा में कहीं भी कुछ भी गैरजरूरी नहीं है। 

आत्मकथा की पृष्ठभूमि में मारवाड़ी संस्कृति के साथ साथ बंगाल का बदलता राजनैतिक परिवेश, आर्थिक संकट , आपातकालीन भारत , विश्वयुद्ध , शीतयुद्ध ,नक्सलबाड़ी काण्ड आदि सभी कुछ है।  पढ़कर लगता है इससे पहले कलकत्ता और बंगाल को कभी नज़दीक से देखा ही नहीं।



 मेरे यह कहने का मतलब कि  ,"एक ऐसी छवि के साथ मेरा नाम हमेशा  लिए जुड़ जायेगा मैंने सपने में भी नहीं सोचा था" यह है कि मैंने अपनी ज़िन्दगी में सोचा था कि मैं एक बोल्ड जीवन जियुंगी , पारम्परिक समाज को ठुकरा कर अपने मूल्यों पर ज़िन्दगी जीयूँगी। लेकिन मैं तो उसी पितृसत्तात्मक समाज का एक अंग बनकर रह गयी हूँ। प्रभा जी एक आत्मनिर्भर महिला थी और मैं ? मेरा नाम इनके साथ जुड़ जायेगा लेकिन क्या मैं प्रभा की आत्मशक्ति को जी पाऊँगी - आत्मविश्वासी , आत्मनिर्भर , हर चुनौती को स्वीकार करने वाली , हर समस्या से जूझने वाली और अंत में स्वयं को जैसे भी हो स्वीकार करने वाली।

 मुझे बेहद ख़ुशी और रोमांच है कि मेरा नाम इनसे जुड़ेगा।  

3 comments:

  1. Difficult for you, but then, your emotionally connect with her will see you sailing all the way

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    1. Yes bhaiyya , I hope I will present her and her works as never presented before.

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  2. नमश्कार! आप काफ़ी बढ़िया लिखते हैं| आपकी नयी रचनाओं का इंतेजार रहेगा|

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