Thursday, April 18, 2013

मेरे देवता !



मेरे देवता ! 

दिनभर की खिट -पिट , झगडा जंजाल 
एक ही ले पर चलती रेलगाड़ी सी ज़िन्दगी 
बिसरने पर और बिसरता  जा रहा समय 
घडी की टिक-टिक, एक काम दूसरा काम 
हज़ारों विचार, लाखों प्रश्न, करोड़ों ख्वाब 
और ख्वार होती ज़िन्दगी 
सुनी बालकनी से सड़कों पर चलती जिंदगियों को 
ताकती आँखे 
कभी तो खत्म होना है ये , या 
कभी नहीं ? सपनो में कोई सार नहीं !
पर जब तब आँखों में तैर आता है एक द्रश्य - 
लाल चुनर और सिंदूरी मांग 
और तभी जाग उठते हैं वो संस्कार , वो सपने - 
की मेरा सर झुके जिन चरणों में , 
वो पूज्य हों !
वो ... मेरे देवता हों !

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