Saturday, April 20, 2013

खुद को समझने के क्रम में

खुद को जानने , समझने , पहचानने का भी कैसा मोह है। परम सुख भी। परम आवश्यकता भी। लेकिन समझने के क्रम में जितने भी विचार बुलबुले की भाँती उठते हैं मानो सिर्फ खंड-सत्य है लेकिन खंड सत्य तो हैं ...
मुझे लगने लगा है , मैं इस दुनिया की हूँ ही नहीं। और अगर हूँ भी तो वह साधू जो माया और विरक्ति की देहलीज़ पर खड़ा कभी इस ओर  कभी उस ओर सुनी आँखों से ताकता है और जब माया से मुह फेर उसकी बोझिल पलकें विरक्ति के घने वटवृक्ष के नीचे हमेशा के लिए आँखे मूँद लेना चाहती हैं। लेकिन ये खेल विकट है। इतनी जल्दी रुक जाता तो बात क्या थी।

आत्मा को बोझ असहनीय है। फिर वो चाहे पत्थर का हो या फूल का। और फिर कहा था न , " दान को भी समर्पण कर देना ..." मैं नहीं जानती इन शब्दों का सही अर्थ क्या है। लेकिन एक बात मन में उठ रही है। कुछ भी लेकर रखना नहीं है सब दे देना है । कुछ भी साथ लेकर नहीं चलना - सुन्दर असुंदर , प्रिय - अप्रिय सब यहीं छोड़ चल देना है। क्यूंकि जीवन की यात्रा मन, बुद्धि, शरीर की यात्रा नहीं है। जीवन की यात्रा आत्मा की यात्रा है। और आत्मा को कोई भी बोझ असहनीय है।    

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