Saturday, April 19, 2014

आशय

वो नहीं जानता उसे क्या करना है।
मैं नहीं जानती मुझे क्या करना है।
सब लोग कहते थे प्यार करना आसान है ( और हमें आसानी से हो भी गया)
बात ये नहीं की हम खुश नहीं हैं, लेकिन हम ये नहीं जानते इसके आगे क्या है  …
आशय अक्सर कुछ उलझा-सा , कुछ भी कहीं से भी जोड़ने में  रहता है  …
मैं अक्सर दूर कहीं जाकर एक नयी ज़िन्दगी शुरू करने की सोचने लगती हूँ  …
मुझे लगता है कमी मुझमे है.
उसे लगता है कमी उसमे है।
हम बहुत खुश हैं  …
कल शाम चाय पीते पीते  वो आकाश में ऊँचे एयरोप्लेन की उड़ान देखने लगा (वो हमेशा से पाइलट बनना चाहता था )
कभी कभी सोचती हूँ क्या हम वो सब कुछ   सब कुछ कर सकते हैं जो करना चाहते हैं, जिस तरह से जीना  चाहते हैं।  अक्सर आशय को देख  कर सोचती हूँ , बिना अर्थ के जीवन कितना निरर्थक है खाली है ,  कब ढूंढ  सकेगा वो  अपने जीवन का आशय , और मैं …कब पा सकुंगी आशय अपने जीवन का .



5 comments:

  1. After a long long time! ! Keep faith and keep walking tall, one day they both will find the way.

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  2. ब्लागिंग निजी अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है -यहाँ यह बखूबी व्यवहृत हो रहा है

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