Tuesday, April 22, 2014

परीक्षित

"तुम्हे पता है तुम बहुत खुदगर्ज़ हो "
" हाँ मुझे पता है. … आई लव यू  परीक्षित "
" फिर भी मुझे छोड़ कर जा रही हो। "
" ज़रूरी है  … क्यूंकि   … "
"मुझसे ज्यादा प्यार तुम खुद से करती हो "
"शायद  … लेकिन मैं कैसे बताऊँ तुम्हे की इस शहर में मेरा दम घुटता है। । इन लोगों के बीच  … इस भीड़ में  … मेरे सपने अलग हैं  … हम कभी साथ रह ही नहीं सकते परीक्षित " , इससे पहले परीक्षित श्रुति को रोक पाता , श्रुति आठ साल के रिश्ते को पीछे छोड़ कर चली गयी।

पचास - पचास माले की ऊँची इमारतों के पीछे सूरज होले - से गुम  हो गया।  परीक्षित अंधेरों को नापते हुए बालकनी में आ कर खड़ा हो गया. उसके एक हाथ में से सफ़ेद कागज़ हवा में उड़ गए  … वो सिर्फ कागज़ नहीं थे श्रुति के सपनों का स्केच था - एनजीओ की बिल्डिंग का स्केच  … परीक्षित की आँखों में न आंसू थे , न हाथ में शराब  … उसके दिल में बस एक गहरा चुभने वाला अफ़सोस था कि वो श्रुति को वक़्त पर  ये विश्वास नहीं दिला सका कि वो भी उसके सपनों का हिस्सेदार है।

3 comments:

  1. would love to know more about 8 saal ka rishta, superb piece

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    1. Thank you.. Aath saal ka rishta mahaj kahaani ka ek hissa hai koi hakikat Nahi

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