Thursday, February 11, 2010

ढाई किलो की रजाई

हालांकि मुझे अक्सर चीज़ों से प्यार हो जाता है - अपनी चीज़ों से , और फिर उनसे एक रिश्ता सा जुड़ जाता है पर वो ढाई किलो की रजाई तो में दीदी के लिए लेकर आई थी , उससे भला मेरा क्या रिश्ता? पर कोई रिश्ता तो था और इसीलिए उसे में कभी भुला नहीं पाउंगी.


वो जनवरी के पंद्रह दिन - हाथ का असहनीय दर्द - और ढाई किलो की रजाई. अब शायद आप समझ गए की मेरे और रजाई के बीच क्या रिश्ता होगा... नहीं समझे? :) 


बहुत ही दर्द दिया है  इस रजाई ने मुझे ... पर में क्या कम बेवकूफ थी? दूकान से घर तक वो ढाई किलो की रजाई कंधे पर लाद कर लायी हालांकि इस किस्से से वाकिफ सभी लोगों ने मुझे "कंजूस" समझा - पर में अपने रोमांटिक वर्ल्ड में खोयी हुई थी ... एहसास ही नहीं हुआ इस बात का की ढाई किलो की रजाई उठाने का क्या हश्र हो सकता है . में कभी उन मजदूरों के बारे में सोचती जो दिन भर अपने शरीर पर बोझा  ढोते हैं ... तो कभी उन औरतो के बारे में  जो सुबह चार बजे पनघट पर पानी भरने जाती हैं और बड़े बड़े घड़े सर पर उठा कर लाती है . पर एक दिन बाद जब ढाई किलो की रजाई उठाने की वजह से मेरे हाथ में बहुत ज़ोरों का दर्द उठा - तो मेरे सर से रोमांटिक खयालो का सारा भूत भाग गया. फिर सच्चाई की ज़मीन पर कदम रखते ही मुझे लजाई शरमाई घूँघट में छिपी औरत का घड़े उठाने वाले रोमांटिक द्रश्य की जगह उसके शरीर में उठने वाले दर्द , उसकी परेशानिया , और उसके सुख की नींद के बाधक तत्वों की कहानिया दिखने लगी. 


रजाई से मेरा रिश्ता कुछ यूँ ही बनने लगा ... नफरत का तो सवाल नहीं जो आज तक किसी से नहीं हुई ... प्यार हो नहीं सकता था इतना दर्द जो दिया.... पर थोड़ी तकलीफ देकर ही जो इसने मुझे रोमांटिक वर्ल्ड से निकाल  कर हकीकत से वाकिफ कराया ... इतना सिखाया वो कोई सच्चा गुरु ही सिखा सकता है...  


ढाई किलो की रजाई को एक गुरु के रूप में पाकर निर्जीव वस्तुओं और मेरे रिश्ते की किताब में एक  नया अध्याय जुड़ गया. 

2 comments:

  1. वाह!!.....क्या बात है ..आपने ,अपने दर्द से दूसरों के दर्द का अहसास किया ......बहुत गहराइ है आपकी सोच में .

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  2. बहुत गहराइ है आपकी सोच में .

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