Sunday, February 13, 2011

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बहुत दिनों बाद हिंदी की कोई बेहतरीन पुस्तक हाथ आई. पर इसे मैंने एक बार में नहीं पढ़ लिया ... धीरे-धीरे एक-एक अक्षर पि कर और घटनाएं जी कर लगभग  दो -तीन दिन में समाप्त की. पुस्तक थी - रसीदी टिकिट , अमृता प्रीतम की आत्मकथा. मैंने कई बार यह दुविधा व्यक्त की है की जब मैं अंग्रेजी पढ़ती हूँ तो मन और जिबान अंग्रेजी हो जाते हैं और जब हिंदी पढ़ती हूँ तो हिंदी. पर यह पुस्तक इस सबसे  से ऊपर थी. अमृता जी के ही भावों में - दर्द का कोई नाम या शक्ल नहीं होती. चाहे उसकी व्याख्या अंग्रेजी में हो या हिंदी में , वो सच्चा हो तो आत्मा के भीतर उतर जाता है...

यूँ ही मन को बहला रही हूँ की , कभी कुछ बन पायी की आत्मकथा लिख सकूँ तो इस बात का ज़िक्र जरुर करुँगी की रसीदी टिकिट का मेरे मन के उपर क्या प्रभाव पड़ा. और अगर नहीं तो , खैर ! उसकी कल्पना में वक्त जाया नहीं करना चाहती. 

3 comments:

  1. दुनिया में प्यार का जिक्र होगा तो अमृता उसमे आएगी ही ...क्योंकि प्यार ने उसे चुना था !

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  2. पूरा ब्यौरा दें किताब का, ताकि पढने को प्रोत्साहित हो मन..

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  3. @Vaani geet - bilkul sahi...
    @Pratik - jarur dungi... waise likhna toh bahut kuch chahti thi us kitaab ke baare me... lekin shabdon ne saath nahi diya... pr ab .. agar aisi baat hai ki koi use padhkar protsaahit ho to jarur likhungi.. :) Thanks

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