Friday, February 18, 2011

रसीदी टिकिट

खुशवंत सिंह जी ने एक बार अमृता से कहा , तुम्हारा प्रेम प्रसंग बस इतना ही है , यह तो एक स्टाम्प पर भी लिखा जा सकता है... बस अमृता जी को बात जम गयी और अपनी आत्मकथा का नाम उन्होंने रसीदी टिकिट ही रख दिया. ये बात हमें हमारे प्रोफेसर ने एक दिन पढ़ते वक़्त किसी प्रसंग के सन्दर्भ में बतायी थी. मैं सोचती रही की इसे बिना कन्फर्म किये यहाँ कैसे लिखूं और आज इत्तेफाक ऐसा हुआ की दैनिक भास्कर में खुशवंत जी का रसीदी टिकिट के उपर एक छोटा सा लेख आया जिससे  मुझे रसीदी टिकिट के नाम का रहस्य बताने का मौका  मिल गया. 

अमृता प्रीतम को आज से पहले कभी नहीं पढ़ा था. हाँ कई बार नाम जरुर सुना था , तब सोचती थी की पता नहीं कैसा लिखती होंगी.  एक इंग्लिश के प्रोफेसर ने कभी पढ़ाते पढ़ाते आदतन इसे (रसीदी टिकेट) अच्छी पुस्तक जान कर हमें सुझाया की हम भी पढ़ें. एक पुस्क्तक मेले में ये हाथ आई तो खरीद ही ली. आज जब इसका एक एक पृष्ठ  पलट रही हूँ तो लग रहा है की सच में यह एक आत्म-कथा है. या की अमृता के शब्दों में आत्मा की कथा. अमृता ने इसी विचार को मन में रख कर पुस्तक का काया-कल्प किया होगा. आत्मा पर जब गैर जरुरी नाम , घटनाएं, शक्लों का बोझ  नहीं तो फिर आत्मा की कथा पर भला  क्यूँ? ...सामान्य  आत्मकथाओं से बिलकुल अलग इसका रूप और रूह है...

रसीदी टिकेट अमृता के सपने , हकीकत , दुःख-सुख की परछाई , प्रेम के फूल , और एहसासों की झील है . भुला-भटका यात्री इसमें झाँक कर देखे तो शायद उसे अपने एहसासों का अक्स भी इसमें नज़र आ जाये. 

मैं तो इस झील में अपना बहुत कुछ छोड़ आई हूँ और बदले में  कोई मुझसे पूछे की मैंने क्या पाया है , तो मैं कहूँगी , एक नाम -  "इमरोज़". इमरोज़ फारसी शब्द है , जिसका अर्थ है , "आज" , बीते कल और आने वाले कल से मुक्त. अमृता के जीवनसाथी इन्द्रजीत ने अपना नाम बदल कर इमरोज़ रख लिया था. खैर! अमृता को धन्यवाद देना चाहूंगी , उन्होंने मुझे विश्वास की डोर से बाँध दिया - विश्वास जो मैं खो चुकी थी की साहिर और इमरोज़ जैसे प्यार करने वाले लोग भी  इस दुनिया में होते हैं. अमृता आपको भी विश्वास की डोर से बाँध सकती है अगर आप सपनो के सच होने में या चमत्कारों में विश्वास नहीं रखते. और अगर आप काँटों के रास्ते से गुज़र रहे हैं तो अमृता आपसे कहेंगी - फूलों के बाग़ दूर नहीं , सफ़र अभी ख़त्म नहीं हुआ है.

बहुत छोटी सी पुस्तक है और ज्यादा महंगी भी नहीं है. थोड़ी आत्म-कथा जैसी है थोड़ी पारी कथा जैसी. 
अमृता को पढने का सफ़र बहुत अच्छी  पुस्तक से शुरू हुआ... आशा करती हूँ ये खूबसूरत वादियों से होकर चलता ही  रहे... 

3 comments:

  1. यह किताब एक पुस्तक की दुकान पर देखी दी हफ्ते भर पहले... अब जल्द ही खरीदूंगा...
    सुझाव के लिए धन्यवाद...

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    Replies
    1. क्या कोई बता सकता है कि प्रसिद्ध लेखिका अमृता प्रीतम की आत्मकथा "रसीदी टिकिट" कहाँ मिलेगी?
      किसी सज्जन को किसी बुक कॉर्नर या स्टाल में 70 के दशक की यह पुस्तक दिखे तो कृपया मुझे 094255 84241 पर सूचना देने की कृपा करें

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