Sunday, August 12, 2012

'एक चीथड़ा सुख'

"...उसके ड्राइंग मास्टर क्लास में कहते थे - देखो, ये सेब है. यह सेब टेबल पर रखा है. इसे ध्यान से देखो. सीढ़ी आँखों से - एक सुन्न निगाह सुई की नोक-सी सेब पर बिंध जाती. वह धीरे धीरे हवा में घुलने लगता गायब हो जाता. फिर, फिर अचानक पता चलता - सेब वहीँ है, मेज पर जैसा का तैसा - सिर्फ वह अलग हो गया है, कमरे से, दूसरे लड़कों से, मेज ओर कुर्सियों से - और पहली बार सेब को नयी निगाहों से देखा रहा है. नंगा, साबुत, संपूर्ण, ... इतना संपूर्ण की वह भयभीत सा हो जाता है, भयभीत ही नहीं- सिर्फ एक अजीब - सा विस्मय पकड़ लेता, जैसे किसी ने उसकी आँखों से पट्टी खोल दी है... "  
( 'एक चीथड़ा सुख' , निर्मल वर्मा )

कई दिनों से मेरी नज़र उस पर पड़ी थी. माँ ने देख लिया था मैं उनकी लाइब्रेरी से छेड़खानी कर रही हूँ. जैसे ही उन्होंने मेरे हाथ में निर्मल वर्मा की 'एक चीथड़ा सुख' देखी, उन्होंने सर ना में हिलाया , जैसे उन्हें इस किताब पर मेरा स्पर्श पसंद न हो... उस वक्त मैंने किताब को और दूसरी किताबों के बीच दफना दिया... पर उसी वक्त कहीं मैं दिल में जानती थी की कुछ दिन बाद मैं फिर इसे उठौंगी, ... ओर तब पढने के लिए...
आज सुबह से ही अलसाया सा मौसम हो रहा था... सब सात बजे उठे ओर मैं पांच बजे से ही किताबे खोल कर बैठ गयी थी... अचानक हाथ में 'एक चीथड़ा सुख' उठा ली... धुल से भरी कपडे से पोंछ   पढना शुरू किया...लेकिन धुल गयी नहीं...कागजों पे छितरी थी... शब्दों के भी भीतर...अर्थों में जा छिपी थी... 
सोचती हूँ वो धुल झाड पाऊँगी या नहीं...
अर्थों की परतों से सच्चाई को पाना आसान नहीं हैं...

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