Friday, January 29, 2010

रह रह कर आम की सौंधी महक
मुझे सुहाती है
जून के महीने में लबालब आम से भरे ओठों 
की याद दिलाती है 


वो पापा से जिद्द कर कर
आम की पेटियां मंगाना
वो माँ से लड़ कर भी
आम पर आम खूब खाना


रोना खूब बिलखना
आम का मौसम गुज़र जाने पर
दिन -ब-दिन महीने - दर- महीने
यूँही बिता देना इसके फिर आने तक


आज जब एक पल के लिए
समय ठहरा सा लग रहा है
आम की सौंधी महक
फिर भी मुझे अकेला नहीं छोडती 


बच्ची-सी है ये
कहीं न कहीं से आ जाती है मेरा प्यार पाने
या शायद थोड़ी बड़ी हो गयी है,
जो आती है मेरा साथ निभाने. 

6 comments:

  1. आम का सवाद और बचपन की यादों को शब्दों का रूप दे दिया ........वाह...बहुत प्यारी कविता .......

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  2. very nice somya..keep it up!! :)

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  3. @vicharo ka darpan - aam ka swaad bachpan ka abhinna ang lagta hai... :)
    @Parul - Thank u Parul

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  4. ओजसी.. बहुत ही बढ़िया रचना है.. आम किसे पसंद नहीं होते.. मेरा तो सबसे पसंदीदा फल आम ही है.. वाह बचपन याद दिला दिया आपने.. सुंदर

    ज़रूर पढ़िये..
    मेरी जुगाड़ यात्रा...
    http://abyazk.blogspot.com/

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  5. @abyaz - Thank u comment ke liye n apna link dene ke liye.. padhkar bahut achha laga :)

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  6. दों को शब्दों का रूप दे दिया ........वाह...बहुत प्यारी कविता .......

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