Monday, January 25, 2010

अक्सर में जानबूझ कर ब्यौरा लगाने छत पर जाती हूँ
और देखती हूँ -


दो पक्षी उत्तर को उड़ते 
एक पक्षी दक्षिण को...
ये नर्म बहती सी धुप,
और ये दोपहर की स्तभ्द्ता
जिसमें चीखती सी कभी कभी
द्रिल्लिंग की आवाज़ 
या अचानक सुनाई देती
पटरी पर दौडती ट्रेन की साज़,
मुझे एक सफ़र पर ले जाती है ...
और उस गाँव छोड़ देती  है ,
जिसमें ऐसे ही किसी दोपहर की स्तभ्द्ता में 
में खुद  को तालाब किनारे बैठा देखती हूँ -


बिखरे सूखे बाल,
लाल कांच की चूड़ियाँ ,
कंधे से सिरकता हरा दुपट्टा ,
पैरों में मैली चांदी की पाजेब,
आँखों की चमक और ओठों पर थिरकती हंसी,
दोपहर की स्तभ्द्ता के बावजूद 
कानो में गूंजता आज़ादी का गीत
जीवन में मिठास घोलने वाला 
दिल के पंछी से मधुर संवाद...


पर अब ये -
आँखों की चमक,
मुक्त हंसी,
आज़ादी का गीत,
और मधुर संवाद,
मिलते हैं  सिर्फ इस सफ़र में
उन चंद पलों में,
जो में चुरा लेती हूँ,
जब छत पर जानबूझ कर ब्यौरा लगाने आती हूँ . 

7 comments:

  1. कविता सचमुच बहुत अच्छी बन पड़ी है, पढ़ते समय अतीत के कुछ दृश्य लौट्ते दिखते हैं. NOSTALGIA में लौटाने के लिये धन्यवाद.

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  2. bahut khoob .....likha hai aapne ......kalpna ki duniya hi alag hoti hai

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  3. @ Iyer ji - Thank you :)
    @ Vicharo ka darpan - Sach kaha aapne kalpana ki duniya bahut nirali hoti hai :)

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  4. are gajab....aaj to is chhat par aakar mujhe bhi bahut acchha laga....kyaa baat kah daali hai is chidiya ne.....are main to bhoot hoon....ye main kahaan aa gayaa....bhaago.....!!

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  5. Bhooton ka is nagri mein Swagat hai ji! :)
    Sach mujhey insano se adhik toh bhoot hi pasand hai.

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  6. Are Pankaj aaj aapka comment kaise? Lagta hai mere blog ke bhagya khul gaye :P

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