Saturday, January 16, 2010

Rishton ki uljhan - Rishton ki bikhran

धागों का एक गट्टा
उलझा पड़ा है
पलंग के नीचे कहीं
पहले छोटा था
धीरे धीरे
बड़ा हो गया है
मोटा हो गया है
पहले सुलझ सकता था शायद
अब कोई गुंजाईश नहीं
काटने पड़ेंगे कुछ धागे
एक - एक करके.


कई पत्ते बिखरे थे
कल रास्ते में
बचकर चलना चाहती थी
पत्तों को कुचलना
वो दर्द भरी चीख
अच्छी नहीं लगती.
पर बावजूद कोशिशों के,
दस-पंद्रह तो
मर ही गए ,
बिचारे! पहले से ही
अधमरे थे.

10 comments:

  1. क्यों समेट रखे थे ऐसे धागे,
    जिन्हें गट्ठर की शक्ल देनी पड़ी
    फिर भी झटक नहीं सके
    ऐसा लगाव भी...
    इसीलिए तो अब तक रखे हैं बिस्तर तले कहीं
    काट ही दो वो तार, जो रोकते हैं उड़ान
    चाहे बोझ हों...या गति-अवरोधक
    ----
    पत्ते कुचलकर भी नष्ट नहीं होंगे
    कराहेंगे, फिर दबकर खाद बन जाएंगे
    उगेंगे फिर...
    अधमरे हो गए हैं वो
    क्योंकि हमें लगता है---उनकी ज़रूरत बाकी नहीं रही

    ---

    बकवास बहुत हुई...अब प्रतिक्रिया

    अच्छा लिखने लगी हैं आप! लगातार चिंतन का ग्राफ ऊपर ही ऊपर उठ रहा है. मुबारक़।

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  2. inhe bakwaas kahenge to meri kaviton ko kya kahenge.. ye to mahabakwaas hain :D
    aapki pratikriya meri kavita se kahin jyada gehri hai :) isiliye mubarak aapko!

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  3. उलझने समेटे सुन्दर भाव है आपकी पंक्तियों में....

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  4. बहुत उम्दा ही नहीं, बहुत गहरा भी... धागों का गट्ठर की शक्ल में आ गये, लेकिन पैरों तले पत्तों के कुचले जाने का दर्द वाकई अफसोसनाक है.. शानदार लिखा है... बेहतरीन

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  5. aap sabhi ko encouragement ke liye bahut hi Dhanyavaad... :)

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  6. घूमते टहलते आपकी ब्लॉग पर आया भावनाएँ बहुत अच्छी है आपकी कविता की..निरंतरता बनाए रखों..शुभकामनाएँ

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  7. सौम्या जी क्षमा करें एक बात कहना चाहता हूँ जब आपके पास कमेंट का मॉडरेशन सुरक्षित है तो यह वर्ड वैरीफिकेसन हटा दीजिए इससे कभी कभी कमेंट देने वालों को बहुत समस्या हो जाती है...क्षमा करें यह एक सुझाव था बाकी आपकी इच्छा है...धन्यवाद!!

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  8. Vinod ji achha hua aapne bata diya...meine bahut baar koshish ki ye hatane ki per ye phir aa jaata hai... ek baar fir koshish karti hoon... :)
    aapke comments ke liye dhanyavaad.

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