Sunday, May 2, 2010

उज्जवल ...

वो लोग सही कहते थे केवल प्यार से पेट नहीं भरता... ओफ्फो ! ये कमबख्त ऑटो वाले रुकते तक नहीं ... गर्मी तो ऐसे बढ़ रही है लगता है सच में दुनिया ख़तम होने वाली है- हो जाये मेरी बाला से तो अच्छा है ये रोज़ रोज़ की आफत छूटेगी. .... "भैया ये लोकी क्या भाव है?" "दीदी क्या आप भी रोज़ रोज़ पूछते हो ..." "अच्छा चल आधा किलो दे दे ओर पाव भर टमाटर  ओर प्याज   भी बाँध देना  " .... आज  तो फिर भी शान्ति है कल से ही मनु तनु की छुटियाँ शुरू होंगी जिद पर लग जायेंगे दोनों - कश्मीर ले चलो , हमें कश्मीर जाना है.. अरे मज़ाक है क्या कश्मीर जाना.. कितना खर्चा होता है उन्हें क्या पता.. ओह ! कश्मीर...सच कितना सुंदर लगता होगा..ओर कबसे मेरा ख्वाब था कश्मीर की खूबसूरती को देखने का.. मैंने तो हनीमून के लिए भी वही जगह सोची थी पर उज्जवल ने हनीमून ही केंसल करा के अपाहिज बच्चो  के स्कूल में दान कर दिए रुपये. .... "ऑटो --- भैया कोयले वाली गली ले चलोगे?... क्या? ३० में ? अभी तो में २५ में आई हूँ  ... अच्छा चलो ...  " जाने किस महान ने इसे कोयले वाली गली का नाम दिया था... शायाद पहले कोयले की खान रही होगी..उफ़ में भी क्या न क्या सोचती रहती हूँ... मनु तनु के आने का टाइम हो गया... रोटियां भी बनानी है. उज्जवल ने भी  कुछ रिपोर्ट्स बनाने को दी थी..  खुद न जाने कहाँ कहाँ घूमते रहते हैं...ओर ये काम.. तंग आ गयी हूँ में इस सब काम से.. हर नौकरी वाले को छुटियाँ मिलती हैं.. कितनी बार कहा था सरकारी नौकरी देख लो .. पर नहीं.. जिद्द ऐसी है की घर बार भी नहीं दीखता... बस पैदा कर दिया बच्चो  को ... सारी जिम्मेदारियां तो अब मेरी ही है न... मेरा तो चलो छोडो .. बिचारे उनके मन की कौन सोचेगा... २ साल से कश्मीर जाने की रट लगा कर रखे हैं.. कहीं भी घुमने ले चलो तो मन बहल जाएगा... पर नहीं... इन्हें फुर्सत ही कहाँ .. अपनी समाज सेवा की पीछे  खुद के बच्चो का कभी नहीं सोचा... "हाँ भैया बस यही.. यही उतार दो.." ... मैंने ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी है.. कभी सोचा था की अपने बच्चो को वो सब दूंगी जो मुझे भी नहीं मिला...यहाँ तो में उतना भी नहीं दे सकी जितना मुझे मिला है... कल से ही नौकरी तलाश करुँगी... उज्जवल के  मूल्यों के पीछे अपने बच्चो की ख्वाहिशों ओर अच्छे भविष्य की बलि नहीं चढ़ा सकती में. ...... "अरे ये घर खुला कैसे है? .... "
 " उज्जवल ! ... उज्जवल  आप इतनी जल्दी आ गए? कल आने वाले थे न... " "हाँ...क्यूँ खुश नहीं हो क्या मुझे देख कर? " .. "ओफ्फो बताइये न... काम हो गया आपका? " "हाँ...लेकिन कल ही आता पर  वो मैंने सोचा एक दिन जल्दी आकर तुम्हारी पेकिंग  में मदद करा देता" "पेकिंग? कौन कहाँ जा रहा है? " "हम सब कश्मीर जा रहे हैं न.." ..... " ओह उज्जवल... आप.. " "हाँ में सच कह रहा हूँ... मेरी पत्नी ओर बच्चो को भुला नहीं हूँ..." "ओह उज्जवल... " "तुम्हारे मन की बात जानता हूँ... ओर जितना तुमने मुझे समझ कर हर कदम पर मेरा साथ दिया है ... इतना करना तो मेरा भी फ़र्ज़ बनता है ..." "उज्जवल मुझे माफ़ करना..." "श्श्श्श ... आइ लव यु " .... "ओह उज्जवल.. आइ लुव यु टू" ...

4 comments:

  1. बहुत ही भावपूर्ण लिखा है आपने!शैली बहुत ही बढ़िया लगी !

    एक गृहस्थ परिवार की छोटी से लेकर बड़ी उलझनों में उलझे मन के सभी आयाम दिखाती रचना!

    कुंवर जी,

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  2. bahut achha likha lag raha hai jase dil khol diya ho...be happy always love u!Gd bless u(:

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