Tuesday, May 4, 2010

मन पतंगा

मन पतंगा जल रहा
में हो रही धुआ धुआ ...
इस जलने में भी क्या नशा सा  है ...

मन पतंगा जब  से  हुआ
जी रहा तेरी रौशनी के दम पे
इस तरह जीने में भी एक मज़ा सा  है...

मेरे पागल मन पर लोग  हँसे
इसकी फितरत पे ताने कसे
में हंसी खूब  हंसी ओर कहती रही
मन तो मेरा पतंगा सा है...
मन तो मेरा....

मन पतंगा जल रहा
दूर जब से तुझसे हुआ...
तेरे होने में तो जलन , न होने में भी पीड़ा है ...
कमबख्त ये पतंगा भी तो एक कीड़ा है...

जलने देना इस पतंगे को
बुझना न लौ तू..
तेरी रौशनी के दम से जी रहा
माना मर रहा है हर घडी ..
पर इस मरने में भी मज़ा सा है...
इस तरह  जीना स्वर्ग सा  है..

6 comments:

  1. सबसे पहले तुम किसी ब्लाग अग्रीगेटर से जुड जाओ जैसे चिट्टाजगत और ब्लागवाणी.. लोगो को फ़िर तुम्हे पढने मे आसानी होगी.

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  2. सुंदर और कोमल भावनाओं की बढ़िया अभिव्यक्ति !
    शुभकामनायें !

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  3. @ Pankaj.. thanks for suggestion.... sochungi iske baare me.. lekin dar lagta hai ek baar log padhne lagenge mein dil se likhna band kar dungi... conscious ho jaungi .. so let it be... :)
    @Sateesh ji - Thank you :)

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  4. hey that is really gr8, felt like i am reading old hindi poems from my hindi textbook :)

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  5. @Sanjeev - Thanks :)
    @Lincoln - ah ! shall I take it as a compliment ? :) Thanks!!!

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