Saturday, August 7, 2010

श्रेया...

" मिसेज मेहता , आइरिस ने अपनी सफलता का श्रेय आपकी परवरिश को दिया है , इस बारे में आप कुछ कहना चाहेंगी ? "

मुक्त हंसी के साथ श्रेया मेहता पत्रकार को जवाब में कहने लगी  , " अच्छा! तो अब वो इतनी समझदार भी हो गयी है ..." पत्रकार जैसे कुछ समझ न पायी हो , ऐसा एक्सप्रेशन देती है , तो श्रेया फिर कहने लगी  ...पर  अबकी बार थोड़ी गंभीरता भरे स्वर में .. " हाँ.. कभी कभी मुझे भी लगता है...  शादी से पहले में इतनी रिबेलिअस थी ...पर कुछ न कर सकी ... यहाँ तक कि शादी भी खुद कि मर्ज़ी से नहीं कर सकी.. और फिर एक लम्बी लिस्ट है कि मैं क्या क्या नहीं कर सकी और किस वजह से...तभी से मैंने यह तय किया कि मेरे साथ जो होना था वो हो गया लेकिन अपने बच्चो को मैं ऐसी परवरिश दूंगी कि .... कि कल को उन्हें ये न लगे कि वो अपनी नहीं किसी और कि ज़िन्दगी ढो रहे हैं... मैं चाहती थी कि मेरे बच्चे ज़िन्दगी जिए... ओर वो भी खुद कि बनायी हुई..."
पत्रकार अभी भी संतुष्ट नहीं दिखी , फिर जोर देकर बोली , " पर ऐसा क्या ख़ास सिखाया आपने अपने बच्चो को? " 
फिर से मुक्त  हंसी कि लहर हवा में समां गयी.  ".... जब मैं बी. ए कर रही थी... इंग्लिश में ... तब किसी ने खलील गिब्र्न कि एक किताब मुझे गिफ्ट कि थी उसकी सभी बाते हालांकि अच्छी थी पर एक बात मेरे दिल को छू गयी ओर वो थी ... कि ... तुम्हारे  बच्चे  तुम्हारे नहीं है , वो तो ज़िन्दगी कि इच्छा के ही  बच्चे हैं , वे तुम्हारे द्वारा आये हैं पर तुमसे नहीं आये , वे तुम्हारे साथ हैं परन्तु वे तुमसे सम्बद्ध नहीं हैं..... और जैसा कि मैंने इसका अर्थ निकला वह है कि -  अंततः उनकी आत्मा कि यात्रा कबसे चली आ रही  है तुम मात्र इस जीवन में उसके संग हो ... उसकी यात्रा को बिना रुकावट के चलने दो..... ओह्ह... माफ़ करना मैं बहुत गहराई में चली गयी थी... आप चाय लेंगी या कोफ़ी? " ... पत्रकार अचानक इस प्रश्न से  जैसे चौंक गयी , शायद वो भी उसी गहराई में डूब गयी थी... बोली - " नहीं नहीं आंटी आप प्लीज़ अपनी बात पूरी कीजिये..." . "...ओह्ह... अच्छा ! तो मैं बस यही कह रही थी कि मैंने कभी अपने बच्चो को ये नहीं बताया कि उन्हें क्या करना चाहिए या क्या नहीं.. मैंने सिर्फ यही बताया कि मेरे लिया क्या सही है , दनिया किसे सही मानती है और उन्हें खुद तय करना होगा कि उन्हें स्वयम के लिए उन्हें क्या चुनना है ... और बस पता नहीं आइरिस कब इतनी बड़ी हो गयी.. मुझे तो पता ही नहीं चला .. कब कोलेज से निकलते ही उसने एक नोवेल भी पब्लिश  करा लिया..."

पत्रकार  का चेहरा अचानक खिल गया , श्रेया समझ नहीं पायी , सोचा शायद उसे अपने सारे सवालों के जवाब मिल गए . पत्रकार विनम्रतापूर्वक श्रेया का इतना समय लेने के लिए माफ़ी मांगते हुए और थेंक्स आंटी कहते हुए जल्दी जल्दी चली गयी.. और रह गयी श्रेया अकेली ...

 खिड़की से बाहर  बच्चो के झुण्ड को कई मिनिट तक देखते देखते अचानक उसकी आँखों में चमक और होंठो पर मुस्कान छा गयी ... अनजाने ही उसके मुह से निकल गया - " अरे! मेरी ज़िन्दगी ख़त्म थोड़ी न हुई है... मैं क्यों इनती डिप्रेस हो रही हूँ... क्या हुआ कि मुझे वो मौका नहीं मिला .. अभी भी कौन सी देर हुई है.. हाँ देर तो गयी है पर ... उफ़... मुझे पता है अब मुझे क्या करना है...हाँ! मैं एक स्कूल खोलूंगी.. शिक्षा में वो पहलु लेकर आउंगी जिस पर अब तक किसी ने गौर नहीं किया... हाँ! शिक्षा - ज़िन्दगी जीने कि...वाओ !!! " अचानक श्रेय इतने  उत्साह से भर गयी कि भूल ही गयी कि रात के आठ बज गए और वो घने अँधेरे घर में अकेली है... पर ... ये तो झूठ  है .. न तो श्रेया के अंदर  न हीं बाहर अँधेरा रह गया था और न ही अब वो अकेली थी.. उसके सपने फिर एक रूप लेकर उसे छेड़ने , उसके संग खेलने आ गए थे... 

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