वे दिन ...
तुम यकीन कर सकते हो- मैं फिर से निर्मल वर्मा को पढ़ रही हूँ। मुझे लगने लगा है की जो लोग अकेले रहना जानते हैं (सिर्फ शारीरिक तौर पर नहीं, मानसिक तौर पर भी) उन्हें कोई न कोई अच्छा साथी ज़रूर मिल जाता है। अब देखो ये कितना बड़ा संयोग है (या कुछ और ही - अजीब सा ) की मैं इतने दिन यह किताब पढना टालती रही और आज - आज बहुत रो चुकने के बाद मैंने यह किताब उठायी। मुझे अजीब सा विश्वास है- निर्मल वर्मा पर की बहुत दुःख होने पर अगर उन्हें पढ़ा जाए तो इनका साहित्य दवा का काम करेगा। ' एक चिथड़ा सुख' में मैं इनके दुःख की परिभाषा अब तक नहीं भूली हूँ। बहुत ही द्र्श्यात्मक, काव्यात्मक, और कल्पनात्मक परिभाषा थी। ऐसी की इंसान पढ़े भी, समझे भी, महसूस भी करे और कभी यूँ ही एक दिन धोखे में उसे जी भी ले . खैर मैं दुसरे उपन्यास के बारे में बता रही थी। 'वे दिन' पर इन्हें ज्ञानपीठ पुरूस्कार मिला है। और यह पढने का सुअवसर मुझे अपने ही निर्णय के कारन प्राप्त हुआ है। एम् . ऐ (फ़ाइनल) के आखरी पेपर में मुझे कई विकल्प में से एक रचनाकार को चुनना था, सो ये पहले से ही मेरे मन में था की मैं निर्मल वर्मा को ...