Saturday, November 21, 2009


सोचती हूँ कभी

क्यूँ पौधा बनाया मुझे

काश! में बेल होती तो

अपने पेड़ से लिपटी होती

शाखा होती ,

पेड़ से जुड़ी होती

फूल होती ,

पेड़ पर खिली होती

किसी भी तरह काश!

में अपने पेड़ की होती

पर अब में दूर हूँ

हीन, क्षुद्र ,

सिर्फ़ एक चोटी पौध हूँ

क्यूँ पौधा बनाया मुझे

काश! में बेल होती ।

इसके आगे भी कुछ पंक्तियाँ लिखी थी मैंने पर जब मैंने अपनी मम्मी को सुनाई तब मम्मी ने अन्तिम पंक्तियाँ सुनकर कहा - ये नई generation की सोच है इसीलिए मैंने वो पंक्तियाँ इस कविता में से हटा दी। मम्मी ने उसे अपने ढंग से देखा पर में चाहती हूँ आप लोग भी उसे पढ़ें ताकि मुझे आपकी राय भी पता चले की कविता अन्तिम पंक्तियों के बिना अच्छी लग रही है या अन्तिम पंक्तियों के साथ। ये रही अन्तिम पंक्तियाँ -

पर कहते हैं जो होता है अच्छे के लिए होता है

में वो डूब तो नही

जो पैरों की मार सहती है

अपमान , दर्द और चोट सहती है

में भले ही एक पौधा हूँ

जो भी हूँ जैसा भी हूँ

उस डूब से तो बेहतर हूँ।

3 comments:

  1. nayee generation ki soch bhale hi nausikhaya lage magar wo sahin hi hoti hain , nahin to ye duniya sthir hoti :)

    a real gud one

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  2. mujhe achhi tarah se samjh mein toh nahin aaye but still a gud effort ... & i liked the comparision between plant & grass... gud one !!!! keep writing!!!!!

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