Thursday, November 12, 2009

एक ग़ज़ल

मन में ये आज उलझन है क्यूँ
आज ख़ुद से ये अनबन है क्यूँ

पिंजरे में वह तड़पता रहा
मन पंछी आख़िर कैद है क्यूँ

द्वंद्व सा हर वक्त रहता हैं मन में
मन आख़िर इतना कमजोर है क्यूँ

1 comment:

  1. भाव खूबसूरत हैं...बहर में कहीं-कहीं कमी है, ये ठीक हो ही जाएगी. सबसे खास हैं--भाव, वो ममस्पर्शी हैं. उन्हें जीने की कोशिश जारी रखिए. दुआएं.

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